भारतीय शास्त्रीय संगीत के समृद्ध इतिहास में राग, लय और बंदिश की शुद्धता को सहेजने वाले संगीत साधकों में पंडित राम चतुर मलिक का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। 5 अक्टूबर 1902 को जन्मे इस महान गायक ने अपना पूरा जीवन गायकी की प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने और उन्हें अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने में समर्पित कर दिया। उनका जन्म एक ऐसे प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था जहां संगीत केवल शौक नहीं बल्कि जीवनशैली का अभिन्न अंग था। उनके पिता पंडित राजित राम मलिक दरभंगा महाराज की रियासत के विख्यात संगीतज्ञ थे। पिता न केवल ध्रुपद गायन में महारत रखते थे, बल्कि वे संस्कृत के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट कवि भी थे। घर में गूंजने वाले सुरों और सांगीतिक वातावरण ने बचपन में ही राम चतुर मलिक के भीतर सुर और ताल की गहरी समझ विकसित कर दी थी।
घर के इसी सांगीतिक माहौल में उनकी शुरुआती तालीम शुरू हुई। उनकी असाधारण प्रतिभा और लयकारी पर पकड़ इतनी प्रखर थी कि उन्होंने महज 15 वर्ष की उम्र में अपनी पहली सार्वजनिक संगीत प्रस्तुति देकर श्रोताओं और आलोचकों को चौंका दिया था। इस शुरुआती मंच प्रदर्शन के बाद उनकी संगीत यात्रा ने एक नई रफ्तार पकड़ी और उनका रियाज तथा गायन लगातार नए आयाम छूता चला गया।
दरभंगा दरबार के राजगायक और गायकी की चारों वाणियों पर पकड़
पंडित राम चतुर मलिक के जीवन और संगीत यात्रा में सबसे अहम मोड़ साल 1924 में आया, जब दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने उनकी विलक्षण योग्यता को पहचानते हुए उन्हें अपने दरबार का राजगायक नियुक्त कर दिया। उस दौर में दरभंगा राजदरबार देश भर में शास्त्रीय संगीत और कला के सबसे बड़े तथा प्रभावशाली केंद्रों में से एक माना जाता था। राजदरबार में मिले संरक्षण और सम्मान ने उन्हें अपनी कला को निखारने तथा विभिन्न बंदिशों को साधने का खुला अवसर प्रदान किया।
उनकी मुख्य पहचान ध्रुपद और धमार गायन शैली के एक बेजोड़ प्रतिनिधि के रूप में स्थापित हुई। ध्रुपद संगीत परंपरा की चार प्रमुख वाणियों यानी गौहर, डागर, खंडार और नौहर पर उनका असाधारण अधिकार था। उनकी प्रस्तुति का अंदाज, गंभीर आवाज और कठिन लयकारियां उन्हें अपने समकालीन अन्य ध्रुपद गायकों की तुलना में बिल्कुल विशिष्ट बनाती थीं। इसके साथ ही, उनकी संगीत साधना केवल ध्रुपद और धमार तक ही सीमित नहीं रही। उन्हें ख्याल गायकी, ठुमरी के भावपूर्ण अंगों और अपनी लोक जड़ों से जुड़े मैथिली लोकगीतों की भी व्यापक और सूक्ष्म समझ थी। इसी बहुआयामी दृष्टि के कारण उनकी गायकी का दायरा बेहद विस्तृत और समृद्ध बना रहा।
साल 1937 में यूरोप यात्रा और यूनेस्को का अंतरराष्ट्रीय सम्मान
पंडित राम चतुर मलिक की ख्याति केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने विदेशी श्रोताओं के बीच भी भारतीय शास्त्रीय संगीत का परचम लहराया। साल 1937 में वह दरभंगा महाराज के छोटे भाई कुमार विश्वेश्वर सिंह के साथ इंग्लैंड और फ्रांस की ऐतिहासिक यात्रा पर गए थे। उस जमाने में किसी भी भारतीय शास्त्रीय गायक का पश्चिमी देशों में जाकर मंच पर प्रस्तुति देना एक अत्यंत दुर्लभ और बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने यूरोपीय मंचों पर अपनी गंभीर गायकी से वहां के श्रोताओं को भारतीय संगीत की आध्यात्मिक गहराई और शास्त्रीय भव्यता से परिचित कराया।
बाद के वर्षों में भी उनकी कला को वैश्विक स्तर पर सराहा गया। साल 1976 में फ्रांस सरकार ने उनकी ध्रुपद और धमार की दुर्लभ रिकॉर्डिंग को यूनेस्को के विशेष अंतरराष्ट्रीय प्रसारण के लिए चुना। इस ऐतिहासिक कदम ने भारतीय शास्त्रीय परंपरा और दरभंगा घराने के ध्रुपद को अंतरराष्ट्रीय फलक पर स्थाई मान्यता दिला दी।
बिना ऑडिशन शीर्ष ग्रेड, पद्मश्री और 'ध्रुपद सम्राट' की उपाधि
सार्वजनिक प्रसारक आकाशवाणी के इतिहास में पंडित राम चतुर मलिक के नाम एक दुर्लभ और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज है। संगीत जगत में उनके बेजोड़ कद और कलात्मक प्रतिष्ठा को देखते हुए आकाशवाणी ने उन्हें बिना किसी पारंपरिक ऑडिशन के सीधे सर्वोच्च 'टॉप ग्रेड' कलाकार का दर्जा प्रदान किया था। यह सम्मान शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उनके अद्वितीय प्रभाव का प्रमाण था।
भारतीय कला और संगीत में उनके अमूल्य योगदान के सम्मान में उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। साल 1964 में उन्हें देश की प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया। इसके बाद साल 1974 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया। संगीत जगत में उन्हें पूरे आदर के साथ 'ध्रुपद सम्राट' के नाम से जाना जाने लगा। साल 1990 में उनका देहावसान हो गया, लेकिन उनके द्वारा गाई गई ध्रुपद और धमार की दुर्लभ रिकॉर्डिंग आज भी कला के कद्रदानों के लिए अनमोल धरोहर हैं और भारतीय शास्त्रीय संगीत की गौरवशाली विरासत का स्मरण कराती हैं।





















