कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतों, चमचमाती टाइल्स और आधुनिक बनावट के दौर में भी देश के ग्रामीण आंचल में पारंपरिक जीवन की सौंधी महक जिंदा है. फूस की छत, हाथ से लीपा हुआ आंगन और मिट्टी की सोंधी खुशबू आज भी इंसान को उसकी बुनियादी जड़ों और मानसिक सुकून से जोड़े रखती है. इसी सादगी भरे देसी हुनर और पुरानी जीवनशैली का जीवंत रूप बुजुर्ग कांतम्मा अम्मा की मिट्टी की दहलीज पर साफ झलकता है, जहां उनके हाथों से सजी लोक कला बीते जमाने की खूबसूरत यादों को ताजा कर देती है.
कच्चे ओटले पर मुग्गु और चावल के आटे का जादू
बुजुर्ग कांतम्मा अम्मा अपने मिट्टी के कच्चे मकान की चौखट और ओटले पर चूने तथा चावल के आटे के इस्तेमाल से मुग्गु की मनमोहक डिजाइन बनाती हैं. इस पारंपरिक कला को बारीकी और खूबसूरती से उकेरने के लिए वह एक खास जालीदार रोलर उपकरण की मदद लेती हैं. इस रोलर टूल के भीतर रंगोली या मुग्गु का बारीक सफेद पाउडर भरा जाता है, और जैसे ही इसे जमीन पर सरकाया जाता है, फर्श पर बिल्कुल सीधी, सममित और आकर्षक सफेद रेखाएं अपने आप छप जाती हैं.
साधारण औजार और लोक कला का संरक्षण
हाथ से लीपे गए गीले ओटले की भूरी पृष्ठभूमि पर सफेद धारियों की यह बनावट पूरे घर के प्रवेश द्वार को बेहद मोहक रूप देती है. यह दृश्य ग्रामीण महिलाओं की सौंदर्य दृष्टि और रचनात्मक कौशल का सटीक प्रमाण है. इसके साथ ही यह कला दर्शाती है कि बिना किसी तामझाम या महंगे साधनों के, बेहद सामान्य और पारंपरिक उपकरणों के सहारे भी सदियों पुरानी लोक परंपराओं को सहजता से आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रखा जा सकता है.
सामाजिक जुड़ाव और सामुदायिक संवाद का मंच
गांवों में घर की चौखट या ओटला केवल आने-जाने का रास्ता भर नहीं होता, बल्कि यह पूरे मोहल्ले और परिवार के सामाजिक मेलजोल का मुख्य केंद्र माना जाता है. खासकर तपती गर्मियों के मौसम में, दोपहर ढलने पर और शाम के वक्त बच्चे इसी ठंडी जमीन पर बैठकर खेलकूद करते हैं, जबकि बुजुर्ग आपस में बैठकर दिनभर की बातें और सुख-दुख साझा करते हैं. महानगरों के बंद फ्लैटों और चारदीवारी के आधुनिक माहौल में ऐसा सहज खुलापन, अपनापन और सामुदायिक जुड़ाव अब दुर्लभ हो चला है.
जड़ों और सांस्कृतिक पहचान का अहम संदेश
कांतम्मा अम्मा का यह घर और उनकी सादगी भरी कला समाज को एक जरूरी मानवीय संदेश देती है. कोई व्यक्ति जीवन में कितनी भी आर्थिक समृद्धि हासिल कर ले या आलीशान महलों में बस जाए, उसे उस मिट्टी और सादे परिवेश का आदर कभी नहीं छोड़ना चाहिए जहां से उसकी बुनियाद शुरू हुई थी. उनकी यह दहलीज हमें पुरानी मेहनत, अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं के प्रति कृतज्ञ रहने की प्रेरणा देती है.



















