तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में पुराने शहर के गोशामहल स्थित एग्जिबिशन ग्राउंड की नजदीकी गलियों में हस्तशिल्प की एक अनूठी परंपरा बनी हुई है. आधुनिक समय की भागदौड़ के बीच आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से आए कई परिवार सड़क किनारे बैठकर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं. ये कारीगर नारियल के ताजे हरे पत्तों और बांस की पतली खपच्चियों का उपयोग करके सुंदर टोकरियां, मजबूत चटाइयां, पारंपरिक वस्तुएं और सजावटी उत्पाद तैयार करते हैं. पिछले 15 वर्षों से हैदराबाद को अपना ठिकाना बना चुके इन परिवारों के जीवन का मुख्य आधार नारियल के पत्ते और उनकी यह पारंपरिक कला ही है.
15 साल का सफर और पारिवारिक सहयोग
इन कारीगर परिवारों के लिए यह काम केवल समय बिताने का साधन नहीं बल्कि परिवार के पालन-पोषण का इकलौता जरिया है. घर के बुजुर्गों से लेकर महिलाएं और युवा पीढ़ी के सदस्य मिलकर हर सुबह काम में जुट जाते हैं. सुबह से शाम तक पत्तियों को छीलने, उन्हें व्यवस्थित तरीके से तराशने और अलग-अलग आकारों में बुनने का काम सामूहिक रूप से किया जाता है. हाथ के पारंपरिक औजारों और बरसों के अनुभव के बल पर ये लोग साधारण पत्तों को टिकाऊ और कलात्मक वस्तुओं में बदल देते हैं.
उत्पादों को तैयार करने में लगने वाला समय और मेहनत
कारीगरों के अनुसार किसी साधारण वस्तु या छोटी टोकरी को तैयार करने में करीब दो से तीन घंटे की कड़ी मेहनत लगती है. वहीं अगर शादी-ब्याह या बड़े आयोजनों के लिए कोई जटिल सजावटी ढांचा बनाना हो, तो उसमें पूरा दिन लग जाता है. इन कारीगरों की उंगलियों की सफाई और पारंपरिक कारीगरी के कारण इन प्राकृतिक उत्पादों में खास मजबूती और निखार देखने को मिलता है.
प्लास्टिक के दौर में प्राकृतिक विकल्प की अहमियत
आजकल विभिन्न समारोहों और त्योहारों में थर्माकोल व प्लास्टिक की सजावट का चलन काफी बढ़ गया है. इसके बावजूद पारंपरिक कला में लगे इन कारीगरों का भरोसा डगमगाया नहीं है. उनका मानना है कि कृत्रिम सजावट की तुलना में प्राकृतिक पत्तियों से बनी वस्तुओं की सुंदरता और ताजगी अलग ही नजर आती है. धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और शुभ कार्यों में लोग आज भी इको-फ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक वस्तुओं को प्राथमिकता देते हैं. कठिन परिश्रम और सीमित साधनों के बाद भी ये लोग अपनी कला से संतुष्ट हैं. स्थानीय स्तर पर ऐसी हस्तकला को प्रोत्साहन मिलने से न केवल पर्यावरण संरक्षण को मदद मिलेगी, बल्कि प्लास्टिक मुक्त वातावरण तैयार करने की दिशा में भी बड़ा योगदान मिलेगा.



















