सूफी संगीत के संगीतप्रेमियों के बीच उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की रचनाओं का स्थान बेहद खास है। उनकी कई कव्वालियां दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं, लेकिन प्रेम की तड़प और जुदाई के दर्द से सराबोर कव्वाली 'बीबा साडा दिल मोड़ दे' का आकर्षण आज भी वैसा ही बना हुआ है। इसकी लय, पंक्तियां और सुरीली तान हर सुनने वाले को गहराई तक छू लेती हैं। कई बार लोग इस कव्वाली को गुनगुनाते तो हैं, लेकिन इसके मुखड़े में बार-बार दोहराए जाने वाले शब्द 'बीबा' के सही मतलब से अनजान रहते हैं। वास्तव में, इस एक शब्द और पूरी कव्वाली के भीतर मोहब्बत, अटूट विश्वास, बिछड़ने की टीस और दिल टूटने की पूरी दास्तान छिपी हुई है।
प्रेम में भरोसा और जुदाई का अहसास
जब कोई इंसान किसी से सच्चा प्यार करता है, तो वह बिना किसी शर्त के अपना दिल और भावनाएं सामने वाले को सौंप देता है। लेकिन जब वही प्रेमी आंखों से दूर हो जाता है, तो उस खालीपन की वजह से मन में एक गहरी शिकायत पैदा होती है। यह शिकायत सामने वाले के जाने से ज्यादा खुद के उस दिल से होती है जो प्रेमी के पास ही रह गया है। नुसरत फतेह अली खान की यह रचना इसी उधेड़बुन और बिखराव को बड़े ही मार्मिक ढंग से पेश करती है। प्रेमी अपने साथी को जाने से तो नहीं रोक पाता, पर अपने बेबस दिल को भी शांत नहीं कर पाता।
'बीबा' शब्द का वास्तविक अर्थ और पहली पंक्ति की भावना
कव्वाली का पहला ही बोल पूरे भावनात्मक दर्द को उजागर कर देता है। इसमें प्रेमी कहता है कि यदि तुम मेरी आंखों के सामने नहीं रहना चाहते और मेरे साथ जीवन बिताना तुम्हें मंजूर नहीं है, तो कम से कम मेरा दिल मुझे वापस लौटा दो। यहां 'बीबा' शब्द का प्रयोग अत्यंत प्रेम, दुलार, अपनेपन और प्यार के संबोधन के रूप में किया गया है। पंजाबी भाषा में 'बीबा' का अर्थ प्रियतमा, प्यारा या महबूब होता है। इस पंक्ति में 'दिल' केवल शरीर का अंग या कोई साधारण भावना नहीं है, बल्कि उस गहरे रिश्ते की निशानी है जिसे आशिक ने पूरी निष्ठा के साथ अपने साजन को सौंप दिया था।
भरोसा टूटने का दर्द और आंसुओं की वजह
कव्वाली आगे बढ़ते ही शिकायत के भाव को और अधिक गहरा बना देती है। प्रेमी अपने साजन को याद दिलाता है कि उसने उसकी हर बात पर सच्चा भरोसा किया था और उसके प्यार को ही अपनी दुनिया माना था। लेकिन उसी अंधे भरोसे का नतीजा यह निकला कि आज उसकी आंखों में केवल आंसू बचे हैं। पंक्तियों के जरिए यह बताया गया है कि जब प्यार में अटूट ऐतबार टूटता है, तो केवल रिश्ता ही खत्म नहीं होता, बल्कि इंसान का स्वयं के फैसलों और अपनी समझ से भी विश्वास उठ जाता है। यह स्थिति प्रेमी के मन को भीतर तक झझकोर कर रख देती है।
रोज-रोज के बिछड़ने से इनकार और निरंतर इंतजार
सच्चे प्यार की खासियत यही है कि चाहकर भी किसी को भुलाया नहीं जा सकता। कव्वाली में उस दर्द का जिक्र है जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके प्रेमी को तड़पाता है। इसमें स्पष्ट कहा गया है कि अब रोज-रोज का यह बिछड़ना और जुदाई सहना संभव नहीं है। यह कोई अस्थायी गुस्सा या एक दिन की नाराजगी नहीं है, बल्कि उस अनवरत इंतजार की पीड़ा है जिसमें हर पल अपने प्रिय की कमी महसूस होती है। इसी घुटन से तंग आकर प्रेमी दोबारा अपने प्रिय 'बीबा' से गुहार लगाता है कि अगर साथ रहना संभव नहीं, तो उसका दिल वापस कर दिया जाए।
मासूम उम्मीद, मन का न मानना और राज साझा करने की चाह
कव्वाली के अगले भाग में एक बहुत ही कोमल और खूबसूरत भाव सामने आता है। इसमें कहा जाता है कि यह छोटा सा दिल प्रेमी की एक भी बात मानने को तैयार नहीं है। इसके बावजूद आशिक के मन में एक छोटी सी उम्मीद कायम रहती है। उसे लगता है कि अगर वह अपने 'बीबा' को एक बार पुकारेगा, तो शायद पहले जैसी कड़वाहट खत्म हो जाएगी। इसी उम्मीद में प्रेमी चाहता है कि दोनों के बीच कोई पर्दा, झिझक या छिपाव न रहे। वह अपने प्रिय से आग्रह करता है कि वह अपने सारे डर और राज खोल दे, क्योंकि वह भी अपने दिल में दबे हर सुख-दुख को उसके सामने उड़ेल देना चाहता है।
पास न बैठने का गिला और अंतिम समर्पण
आगे की पंक्तियों में मोहब्बत और शिकायत का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है। प्रेमी इस बात से दुखी है कि जिस इंसान के साथ वह अपने दिल की सारी बातें साझा करना चाहता है, वही इंसान उसके पास दो पल बैठने को भी तैयार नहीं है। इसके बाद कव्वाली अपने सबसे बड़े त्याग और समर्पण के मोड़ पर पहुंचती है। प्रेमी स्पष्ट कहता है कि अगर उसकी मर्जी अलग होने की ही है, तो वह इस फैसले को भी स्वीकार करने के लिए तैयार है। हालांकि, वह अपनी कमजोरी भी कबूल करता है कि उसकी पूरी दुनिया उसी इंसान के इर्द-गिर्द घूमती है। वह शारीरिक रूप से भले ही अलग हो जाए, लेकिन दिल से उस प्रिय को निकाल पाना उसके लिए नामुमकिन है।
पुकार में बची मोहब्बत और नुसरत फतेह अली खान की गायकी का जादू
यही कारण है कि कव्वाली में बार-बार वही पुरानी फरियाद लौटकर आती है कि मेरा दिल मुझे लौटा दो। 'बीबा' शब्द में शिकायत के साथ-साथ अपार स्नेह बचा रहता है। रिश्ता टूट रहा है और भरोसा घायल है, लेकिन पुकारने वाले के लहजे में कोई कड़वाहट या कठोरता नहीं है। नुसरत फतेह अली खान की आवाज इस एहसास को नई ऊंचाइयों पर ले जाती है। उनकी गायकी में दर्द धीरे-धीरे गहराता है, और बार-बार दोहराया जाने वाला मुखड़ा ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई टूटने की कगार पर खड़ा इंसान अपनी आखिरी उम्मीद के साथ अपने प्यार के सामने गुहार लगा रहा हो।
बिना नफरत की जुदाई और कव्वाली की असली खूबसूरती
इस कव्वाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जुदाई के बाद भी रंजिश या नफरत का कोई स्थान नहीं है। प्रेमी अपने साथी को जबरदस्ती रोकने की कोशिश नहीं करता और न ही उस पर कोई आरोप लगाता है। उसकी सीधी और सरल बात बस इतनी है कि यदि जिंदगी में साथ नहीं रहना है तो ठीक है, लेकिन जो दिल तुम्हें चाहते-चाहते तुम्हारा हो चुका था, उसे कम से कम वापस लौटा दिया जाए। यही निष्कलंक प्रेम इस कव्वाली को अमर बनाता है।



















