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कर्नाटक संगीत के शिखर पुरुष लालगुडी जयरामन, जिन्होंने वायलिन के तारों में घोल दी थी मानवीय गायकी की रूहकल्चर
19 सित॰ 2026, 7:15 pm (39 दिन पहले)· 0

कर्नाटक संगीत के शिखर पुरुष लालगुडी जयरामन, जिन्होंने वायलिन के तारों में घोल दी थी मानवीय गायकी की रूह

रेडियो के अभाव में दूर जाकर धुनें याद करने से लेकर अपनी खास 'लालगुडी बानी' स्थापित करने तक, लालगुडी जयरामन ने वायलिन को गायन जैसा सजीव बना दिया।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में लालगुडी जयरामन एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने वायलिन वादन की पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी। उनका जन्म 17 सितंबर 1930 को एक ऐसे घराने में हुआ था, जिसकी कई पीढ़ियां कर्नाटक संगीत की समृद्ध परंपरा से जुड़ी हुई थीं। उनके पिता लालगुडी वी.आर. गोपाला अय्यर केवल एक ख्यातिप्राप्त संगीतकार ही नहीं थे, बल्कि वे जयरामन के पहले गुरु भी बने। पिता ने बालक जयरामन की असाधारण प्रतिभा को पहचानकर उन्हें बहुत छोटी उम्र से ही कड़ा प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया था। इस शुरुआती तालीम का असर यह रहा कि वायलिन केवल उनके हाथ का एक साजिंदा यंत्र नहीं रहा, बल्कि उनके दैनिक जीवन का सबसे अभिन्न अंग बन गया।

रेडियो की कमी और धुनें याद करने की अनोखी लगन

बचपन के दिनों में लालगुडी जयरामन का परिवार तमिलनाडु के लालगुडी क्षेत्र में रहता था। उस दौर में उनके अपने घर में रेडियो जैसा बुनियादी साधन भी मौजूद नहीं था। संगीत के प्रति उनका आकर्षण इतना तीव्र था कि ऑल इंडिया रेडियो पर शाम को प्रसारित होने वाले संगीत कार्यक्रमों को सुनने के लिए वे पड़ोसियों के घर या फिर सार्वजनिक स्थानों पर लगे लाउडस्पीकरों के पास पहुंच जाते थे। यह उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने की एक कठिन साधना थी। जो भी रचना या बंदिश वे वहां सुनते, उसे बहुत एकाग्रता के साथ अपने मन में दर्ज कर लेते थे। इसके बाद वे तेजी से अपने घर लौटते और बिना समय गंवाए वायलिन उठाकर उन धुनों को हूबहू तारों पर उतारने में जुट जाते थे।

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गांव का शांत वातावरण और देर रात तक कठोर रियाज

जयरामन के अनुसार अगर कोई संगीत कार्यक्रम रात करीब 9 बजे समाप्त होता, तो वे तेजी से अपने घर का रुख करते और फिर आधी रात तक वायलिन पर उस सुनी हुई धुन का बार-बार अभ्यास करते थे। उनके गांव का शांत और कोलाहल मुक्त वातावरण इस साधना में बहुत मददगार साबित हुआ। वहां किसी तरह का शहरी शोर नहीं था, जिसके चलते वे कई-कई घंटों तक बिना किसी व्यवधान के रियाज में डूबे रहते थे। संगीत को सीखने और प्रत्यक्ष सुनने का जुनून इस कदर हावी था कि मात्र 10 वर्ष की कोमल आयु में वे अकेले ही रेलगाड़ी में बैठकर संगीत समारोहों में पहुंच जाया करते थे।

महान दिग्गजों की संगत और 'लालगुडी बानी' का उदय

अपनी असाधारण पकड़ के चलते जयरामन ने अत्यंत कम उम्र में ही कर्नाटक संगीत के मूर्धन्य कलाकारों के साथ मंच साझा करना शुरू कर दिया था। उन्होंने मदुरै मणि अय्यर और जीएन बालासुब्रमण्यम जैसे शीर्ष गायकों के साथ संगत की। बचपन से ही गायकी की बारीक समझ रखने के कारण उन्हें मुख्य गायकों की शैली, उनके राग विस्तार और रचनाओं के मर्म को पकड़ने में कभी कठिनाई नहीं हुई। आगे चलकर उन्होंने वायलिन वादन की एक पूरी तरह से मौलिक और विशिष्ट शैली विकसित की, जिसे संगीत जगत में 'लालगुडी बानी' का नाम दिया गया। इस शैली का सबसे अनूठा पहलू यह था कि वायलिन के तारों से निकलने वाली धुन बिल्कुल किसी कुशल गायक के कंठ से फूटने वाले स्वरों जैसी सजीव और भावपूर्ण प्रतीत होती थी। वे राग, ताल और गीतों के साहित्यिक भाव को इस नफासत से पेश करते थे कि सुनने वाले को संगीत के भीतर एक पूरी कहानी तैरती हुई महसूस होती थी।

कालजयी रचनाएं, शिक्षक के रूप में योगदान और राष्ट्रीय सम्मान

लालगुडी जयरामन की रचनात्मकता सिर्फ एक वादक के रूप में सीमित नहीं थी, बल्कि वे एक उच्च कोटि के संगीतकार और रचनाकार भी थे। उन्होंने कई वर्णम, तिल्लाना और 'सुलादी सप्त ताल रामायण' जैसी जटिल एवं भव्य शास्त्रीय रचनाओं का सृजन किया। एक समर्पित गुरु के रूप में उन्होंने अनेक शिष्यों को तराशा और अपनी विरासत को आगे बढ़ाया। उनके सुपुत्र लालगुडी जी.जे.आर. कृष्णन और सुपुत्री लालगुडी विजयलक्ष्मी ने भी अपने पिता की इस वायलिन परंपरा को आगे ले जाने का दायित्व बखूबी निभाया। कला जगत में उनके अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1972 में पद्म श्री और 2001 में पद्म भूषण से अलंकृत किया। उन्हें 1978 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया और 2009 में वे संगीत नाटक अकादमी के फेलो चुने गए। इसके अलावा 2008 में म्यूजिक अकादमी, मद्रास द्वारा उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान से भी नवाजा गया। वर्ष 2006 में स्ट्रोक का आघात लगने के बाद उन्होंने सार्वजनिक मंचों से दूरी बना ली, लेकिन एक संगीतकार और शिक्षक के रूप में वे लगातार सक्रिय रहे। अंततः 22 अप्रैल 2013 को 82 वर्ष की आयु में इस महान संगीत मनीषी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

सवाल-जवाब

लालगुडी जयरामन का जन्म कब और कहां हुआ था?
लालगुडी जयरामन का जन्म 17 सितंबर 1930 को हुआ था और उनका बचपन तमिलनाडु के लालगुडी क्षेत्र में बीता।
बचपन में घर पर रेडियो न होने पर वे संगीत कैसे सीखते थे?
वे पड़ोसियों के घर या सार्वजनिक स्थानों पर रेडियो प्रसारण सुनते थे और घर लौटकर उन धुनों को वायलिन पर निकालते थे।
लालगुडी जयरामन के वायलिन वादन की शैली को किस नाम से जाना जाता है?
उनकी वायलिन वादन शैली को 'लालगुडी बानी' के नाम से जाना जाता है, जिसमें वायलिन से गायकी जैसा भाव सुनाई देता है।
लालगुडी जयरामन ने किन प्रमुख गायकों के साथ वायलिन की संगत की?
उन्होंने मदुरै मणि अय्यर और जीएन बालासुब्रमण्यम जैसे दिग्गज कर्नाटक गायकों के साथ संगत की थी।
लालगुडी जयरामन को भारत सरकार से कौन-कौन से सम्मान मिले?
उन्हें 1972 में पद्म श्री और 2001 में पद्म भूषण सम्मान से अलंकृत किया गया था।
लालगुडी जयरामन का निधन किस उम्र में और कब हुआ?
उनका निधन 22 अप्रैल 2013 को 82 वर्ष की आयु में हुआ था।
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