जहानाबाद में आज तकनीक और संचार साधनों की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। اکیسवीं सदी के इस दौर में फिफ्टीजी इंटरनेट और स्मार्टफोन ने इंसानी जीवन की रफ्तार को काफी तेज कर दिया है। मनोरंजन के तौर-तरीके भी बदल चुके हैं और रेडियो अब हर घर में गूंजता नजर नहीं आता। हालांकि एक समय ऐसा भी था जब न तो मोबाइल फोन हुआ करते थे और न ही इंटरनेट की कोई सुविधा थी। उस दौर में मनोरंजन के साधन बेहद सीमित हुआ करते थे, जिसमें रेडियो और टेलीविजन का अपना एक खास मुकाम था। किसी परिवार के घर में टेलीविजन आ जाना पूरे इलाके के लिए किसी बड़े त्योहार से कम नहीं होता था। कोई भी लोकप्रिय धारावाहिक शुरू होते ही आस-पड़ोस के लोग एक ही छत के नीचे इकट्ठा हो जाते थे। फिल्म और क्रिकेट मुकाबले देखने के लिए लोग घंटों तक टीवी के सामने टिके रहते थे। जहानाबाद की रहने वाली रानी देवी जब उस बीते हुए दौर को याद करती हैं, तो उनकी पुरानी स्मृतियां ताजा हो जाती हैं।
जहानाबाद जिले के घोसी की रहने वाली रानी देवी वर्ष 1987 से इसी इलाके में निवास कर रही हैं। बारहवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त कर चुकीं रानी देवी अपनी पुरानी यादों के पन्ने पलटते हुए बताती हैं कि उनका विवाह वर्ष 1987 में हुआ था। शादी के बाद जब वह अपने ससुराल पहुंचीं, तब घोसी का बाजार आज के मुकाबले बेहद अलग और कम विकसित था। आसपास इक्का-दुक्का घर ही हुआ करती थीं। उनके ससुर संस्कृत विद्यालय, घोसी में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। कुछ समय बीतने के बाद उनका पूरा परिवार घोसी बाजार के प्रखंड कॉलोनी मोहल्ले में आकर बस गया। इसी दौरान वर्ष 1993 में उनके देवर का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के उपहार के रूप में परिवार को एक सादा टेलीविजन प्राप्त हुआ और यहीं से उस इलाके में मनोरंजन के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।
टेलीविजन आते ही जुट जाती थी लोगों की भीड़
रानी देवी बताती हैं कि मोहल्ले में जब पहली बार टेलीविजन आया, तो आसपास के लोगों में उसको लेकर गजब की दीवानगी और उत्सुकता थी। स्क्रीन पर कार्यक्रम देखने के लिए केवल घर के सदस्य ही नहीं बल्कि पड़ोसी भी बड़ी संख्या में उनके घर पहुंच जाया करते थे। उस समय दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक जैसे रामायण, महाभारत और चंद्रकांता लोगों के दिलों पर राज करते थे। हर हफ्ते शनिवार और रविवार के दिन का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे, क्योंकि इन छुट्टियों के दिनों में टेलीविजन पर फिल्में प्रसारित की जाती थीं। फिल्म शुरू होने से काफी वक्त पहले ही लोग घर में आकर अपनी जगह बना लेते थे और करीब तीन घंटे तक पूरे आनंद के साथ फिल्म का लुत्फ उठाते थे।
क्रिकेट मुकाबलों के लिए एक हफ्ते पहले की तैयारी
रानी देवी के संस्मरणों के मुताबिक उस समय क्रिकेट के खेल को देखना सबसे ज्यादा रोमांचक और उत्सुकता से भरा अनुभव हुआ करता था। उस दौर में बिजली की आंख-मिचौली आम बात थी और कई बार घंटों तक बिजली गायब रहती थी। ऐसी स्थिति में किसी बड़े क्रिकेट मैच का लुत्फ उठाने के लिए लोगों को बहुत पहले से अपनी तैयारियां शुरू करनी पड़ती थीं। वह बताती हैं कि मैच के दिन निर्बाध रूप से टीवी चलाने के लिए बैटरी की सख्त जरूरत होती थी। इसके लिए लोग मैच से करीब एक सप्ताह पहले ही बैटरी की दुकान पर जाकर एडवांस बुकिंग करा लेते थे, ताकि प्रसारण के दौरान किसी भी वजह से टीवी बंद न हो जाए। वनडे क्रिकेट के मुकाबले काफी लंबे समय तक चलते थे और दर्शक बिना अपनी जगह छोड़े लगातार घंटों टीवी के सामने जमे रहते थे।
कई बार ऐसा भी होता था कि टेलीविजन का सिग्नल कमजोर होने पर तस्वीर साफ नहीं आती थी या फिर स्क्रीन बार-बार टिमटिमाती थी, लेकिन इसके बावजूद दर्शकों का उत्साह कभी कम नहीं होता था। स्क्रीन पर धुंधली सी तस्वीर दिखने पर भी लोग खिलाड़ियों को पहचानने और मैच देखने के लिए घंटों बैठे रहते थे। आज के आधुनिक मोबाइल और इंटरनेट के इस दौर में भले ही मनोरंजन के तमाम साधन और विकल्प उपलब्ध हो चुके हों, लेकिन रानी देवी जैसे लोगों के दिलों में उस पुराने दौर की यादें आज भी एक ऐसी साझा खुशी के रूप में बसी हुई हैं जब एक छोटा सा टेलीविजन पूरे मोहल्ले को एक साथ जोड़कर बैठा दिया करता था।


















