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मेवाड़ में भील कलाकारों की 40 दिनी कठिन गवरी साधना, हरी सब्जियों और घर से दूरी का अनूठा नियमकल्चर
1 अक्तू॰ 2026, 12:58 pm (27 दिन पहले)· 3

मेवाड़ में भील कलाकारों की 40 दिनी कठिन गवरी साधना, हरी सब्जियों और घर से दूरी का अनूठा नियम

मेवाड़ के लोक जीवन में भील समाज का 40 दिवसीय गवरी पर्व शुरू होते ही कलाकार घर-परिवार से दूर रहकर और हरी सब्जियों का त्याग कर कठिन साधना के साथ गांव-गांव मंचन करते हैं.

मेवाड़ की समृद्ध लोक विरासत में गवरी नृत्यनाट्य को महज एक पारंपरिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि त्याग, सामूहिक आस्था और कड़े अनुशासन का प्रतीक माना जाता है. भील समुदाय की ओर से आयोजित होने वाला यह लोक उत्सव लगभग 40 दिनों तक निरंतर चलता है. इस अवधि में गवरी के पात्र निभाने वाले कलाकार अत्यंत कठोर नियमों और मर्यादाओं में बंधकर अपना जीवन बिताते हैं. अपने घरों और पारिवारिक सुविधाओं से पूरी तरह दूर रहकर ये कलाकार विभिन्न ग्रामीण इलाकों में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, जो इसे सामान्य लोकनाट्यों की तुलना में कहीं अधिक विलक्षण बना देता है.

आस्था और सामूहिक जीवन से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा

इतिहासविद् श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार, मेवाड़ अंचल के भील समुदाय में गवरी की परंपरा पीढ़ियों और सदियों से निरंतर प्रवाहित हो रही है. इसे कभी भी सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं समझा गया, बल्कि यह गहरी धार्मिक निष्ठा और सामाजिक एकजुटता का पावन माध्यम है. जैसे ही गवरी का अनुष्ठानिक समय शुरू होता है, कलाकार पूरे 40 दिनों के लिए अपने निजी परिवारों से पूरी तरह अलग हो जाते हैं. इस पूरी अवधि में वे पूर्वजों और परंपरा द्वारा तय किए गए आचार-विचार का पालन करते हुए सामूहिक रूप से जीवन व्यतीत करते हैं.

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हरी सब्जियों का त्याग और गांव-गांव पड़ाव

इस साधना काल के दौरान पालन किए जाने वाले नियमों में सबसे प्रमुख नियम हरी सब्जियों का पूर्ण त्याग है. मान्यता और पारंपरिक विश्वास के चलते कलाकार इन 40 दिनों तक किसी भी तरह की हरी सब्जी का सेवन नहीं करते हैं. इसके अलावा, गवरी दल में शामिल किसी भी सदस्य का अपने घर लौटना वर्जित होता है. कलाकार अपने साथी कलाकारों के जत्थे के साथ ही रहते हैं. दल जिस गांव में अपनी प्रस्तुति देने पहुंचता है, वहीं पर उनके विश्राम, भोजन और दैनिक आवश्यकताओं की व्यवस्थाएं जुटाई जाती हैं.

नंगे पैर सफर और सादगी भरा रहन-सहन

गवरी के दिनों में कलाकारों की जीवनशैली सामान्य दिनों की अपेक्षा पूरी तरह बदल जाती है. कई कलाकार इन 40 दिनों तक जूते-चप्पल तक का इस्तेमाल नहीं करते और नंगे पैर ही रहते हैं. चाहे तेज गर्मी का असर हो या फिर बारिश का मौसम, कलाकार नंगे पांव ही एक गांव से दूसरे गांव का फासला तय करते हैं. यह शारीरिक तपस्या उनकी भक्ति और कला के प्रति समर्पण का सीधा प्रमाण मानी जाती है.

लोककथाओं का सजीव मंचन और दर्शकों से जुड़ाव

गवरी के मंचन में विभिन्न पात्र लोककथाओं, देवी-देवताओं और सामाजिक जीवन के ताने-बाने से जुड़े प्रसंगों को मंच पर साकार करते हैं. नृत्य की लय, प्रभावशाली संवाद और अभिनय के माध्यम से प्राचीन आख्यानों को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है. जब किसी भी गांव में गवरी का दल कदम रखता है, तो पूरा गांव उत्सव के रंग में रंग जाता है. कलाकार और दर्शकों के बीच एक आत्मीय और जीवंत संवाद देखने को मिलता है, जहां पूरा समाज मिलकर इस कला का स्वागत करता है.

कला और अनुशासन का अनूठा संगम

इतिहासविद् श्रीकृष्ण जुगनू का मानना है कि गवरी की सबसे अनूठी विशेषता कला के भीतर अनुशासन और आध्यात्मिक आस्था का यह संतुलन ही है. लगभग 40 दिनों तक अपने सांसारिक सुखों और निजी जीवन को पीछे छोड़कर कलाकार इस लोक धरोहर को जीवंत रखते हैं. वर्तमान आधुनिक दौर में भी यह समर्पण मेवाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति और भील समुदाय की पहचान को अक्षुण्ण बनाए हुए है.

सवाल-जवाब

गवरी लोकनाट्य का आयोजन कितने दिनों तक चलता है?
गवरी का आयोजन मेवाड़ क्षेत्र में लगभग 40 दिनों तक निरंतर चलता है, जिसमें कलाकार विभिन्न गांवों में जाकर मंचन करते हैं.
गवरी का मंचन मुख्य रूप से किस समाज द्वारा किया जाता है?
यह अनूठी लोक परंपरा मेवाड़ अंचल के भील समाज द्वारा सदियों से निभाई जा रही है.
गवरी कलाकारों के लिए खान-पान से जुड़ा कौन सा नियम सबसे कठिन माना जाता है?
कलाकार 40 दिनों की इस पूरी साधना अवधि के दौरान किसी भी प्रकार की हरी सब्जी का सेवन पूरी तरह छोड़ देते हैं.
क्या कलाकार मंचन के दिनों में अपने घर जा सकते हैं?
नहीं, गवरी के 40 दिनों के दौरान कलाकारों का अपने घर लौटना वर्जित होता है और वे अपने दल के साथ ही प्रवास करते हैं.
कलाकार गांव-गांव किस तरह यात्रा करते हैं?
कलाकार सादगी भरा जीवन जीते हैं और कई कलाकार गर्मी या बारिश की परवाह किए बिना 40 दिनों तक नंगे पैर ही यात्रा करते हैं.
गवरी नाटकों में किस तरह की कथाओं का मंचन किया जाता है?
इसमें देवी-देवताओं, पौराणिक लोककथाओं और सामाजिक जीवन से जुड़े विविध प्रसंगों को नृत्य, अभिनय और संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है.
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