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गणेश चतुर्थी से पहले हैदराबाद का धूलपेट बना विशाल वर्कशॉप, 20 फीट तक की बप्पा की मूर्तियों की दक्षिण भारत में बढ़ी मांगकल्चर
22 अग॰ 2026, 1:22 pm (67 दिन पहले)· 6

गणेश चतुर्थी से पहले हैदराबाद का धूलपेट बना विशाल वर्कशॉप, 20 फीट तक की बप्पा की मूर्तियों की दक्षिण भारत में बढ़ी मांग

गणेश चतुर्थी से दो-तीन महीने पहले ही हैदराबाद का धूलपेट इलाका एक खुले वर्कशॉप में बदल जाता है। यहां तैयार होने वाली 15 से 20 फीट की विशाल मूर्तियों की मांग तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु तक फैली है।

गणेश चतुर्थी का पर्व आने से काफी पहले ही हैदराबाद का ऐतिहासिक क्षेत्र धूलपेट उत्सव की तैयारियों से सराबोर हो उठता है। त्योहार शुरू होने से लगभग दो से तीन महीने पहले ही इस इलाके का हर कोना, हर गली और हर घर एक विशाल वर्कशॉप का रूप ले लेता है। पूरी धूलपेट बस्ती में सिर्फ भगवान गणेश की मूर्तियों का निर्माण, उन्हें सुखाने का काम और उनकी रंगाई-पुताई नजर आती है। स्थानीय कारीगर दिन-रात मेहनत करके ऐसी मनमोहक प्रतिमाएं तैयार करते हैं जिन्हें देखकर श्रद्धालुओं की नजरें ठिठक जाती हैं।

दक्षिण भारत में मूर्तिकला का प्रमुख केंद्र

धूलपेट केवल हैदराबाद शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे दक्षिण भारत में मूर्तिकला के सबसे बड़े केंद्रों में गिना जाने लगा है। यहां तैयार होने वाले गणपति बप्पा के दर्शन और खरीदारी के लिए दूर-दूर से समितियां और लोग पहुंचते हैं। त्योहार के मौसम में तेलंगाना के अलग-अलग जिलों के साथ-साथ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों से भारी संख्या में गणेश उत्सव कमेटियों के प्रतिनिधि और खरीदार विशेष रूप से धूलपेट आते हैं। यहां मिलने वाली मूर्तियों का दायरा काफी बड़ा है, जिसमें घरों में स्थापित की जाने वाली छोटी प्रतिमाओं से लेकर 15 से 20 फीट तक के विशालकाय बप्पा शामिल हैं।

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कच्ची मिट्टी और ढांचे से भव्य प्रतिमा बनने का सफर

धूलपेट में किसी भी प्रतिमा को अंतिम रूप देना एक लंबी और बेहद बारीक कारीगरी वाली प्रक्रिया है। सबसे पहले लोहे या लकड़ी के मजबूत ढांचे की मदद से मूर्ति का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद मिट्टी की परतों से भगवान गणेश के स्वरूप को उकेरा जाता है। मूर्ति के चेहरे के भावों, आंखों और नैन-नक्श को उकेरने के लिए बहुत ही बारीक नक्काशी की जाती है। सबसे अंतिम चरण में मूर्तियों को चमकीले रंगों, वस्त्रों और आभूषणों की चित्रकारी से सजाया जाता है। बाजार की बदलती मांग के अनुसार कारीगर पारंपरिक रूपों के अलावा आधुनिक और थीम आधारित मूर्तियां भी बनाते हैं। इन प्रतिमाओं की कीमत उनके आकार, नक्काशी की बारीकी, फिनिशिंग और डिजाइन की अवधारणा के आधार पर निर्धारित की जाती है।

पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर और अटूट जन-आस्था

धूलपेट में मूर्तिकला का यह काम महज एक व्यापार नहीं है, बल्कि यह कई पीढ़ियों से चला आ रहा एक सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। परिवार के बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक इस पारंपरिक हुनर को बहुत गर्व और जज्बे के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। जिन मूर्तियों को धूलपेट की संकरी गलियों में तराशा और रंगा जाता है, वे ही आने वाले दिनों में विशाल पंडालों में स्थापित होकर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र बनती हैं। इस प्रकार धूलपेट के ये हुनरमंद कारीगर हर साल अपनी लगन और मेहनत से साधारण मिट्टी को जन-आस्था के अटूट प्रतीक में बदल देते हैं।

सवाल-जवाब

हैदराबाद का धूलपेट इलाका क्यों प्रसिद्ध है?
धूलपेट अपने कुशल कारीगरों और गणेश चतुर्थी के लिए बनाई जाने वाली खूबसूरत और विशालकाय मूर्तियों के लिए पूरे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध है।
धूलपेट में गणेश मूर्तियों का निर्माण कब शुरू होता है?
गणेश चतुर्थी उत्सव शुरू होने से लगभग दो से तीन महीने पहले ही धूलपेट में मूर्तियों का निर्माण और रंगाई शुरू हो जाती है।
धूलपेट में किस आकार की गणेश मूर्तियां बनाई जाती हैं?
यहां घरों के लिए छोटी मूर्तियों से लेकर सार्वजनिक पंडालों के लिए 15 से 20 फीट तक की विशालकाय मूर्तियां तैयार की जाती हैं।
धूलपेट की मूर्तियों के खरीदार कहां-कहां से आते हैं?
तेलंगाना के विभिन्न जिलों के अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु से गणेश उत्सव समितियों के सदस्य और खरीदार यहां मूर्तियां खरीदने आते हैं।
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