गणेश चतुर्थी का पर्व आने से काफी पहले ही हैदराबाद का ऐतिहासिक क्षेत्र धूलपेट उत्सव की तैयारियों से सराबोर हो उठता है। त्योहार शुरू होने से लगभग दो से तीन महीने पहले ही इस इलाके का हर कोना, हर गली और हर घर एक विशाल वर्कशॉप का रूप ले लेता है। पूरी धूलपेट बस्ती में सिर्फ भगवान गणेश की मूर्तियों का निर्माण, उन्हें सुखाने का काम और उनकी रंगाई-पुताई नजर आती है। स्थानीय कारीगर दिन-रात मेहनत करके ऐसी मनमोहक प्रतिमाएं तैयार करते हैं जिन्हें देखकर श्रद्धालुओं की नजरें ठिठक जाती हैं।
दक्षिण भारत में मूर्तिकला का प्रमुख केंद्र
धूलपेट केवल हैदराबाद शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे दक्षिण भारत में मूर्तिकला के सबसे बड़े केंद्रों में गिना जाने लगा है। यहां तैयार होने वाले गणपति बप्पा के दर्शन और खरीदारी के लिए दूर-दूर से समितियां और लोग पहुंचते हैं। त्योहार के मौसम में तेलंगाना के अलग-अलग जिलों के साथ-साथ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों से भारी संख्या में गणेश उत्सव कमेटियों के प्रतिनिधि और खरीदार विशेष रूप से धूलपेट आते हैं। यहां मिलने वाली मूर्तियों का दायरा काफी बड़ा है, जिसमें घरों में स्थापित की जाने वाली छोटी प्रतिमाओं से लेकर 15 से 20 फीट तक के विशालकाय बप्पा शामिल हैं।
कच्ची मिट्टी और ढांचे से भव्य प्रतिमा बनने का सफर
धूलपेट में किसी भी प्रतिमा को अंतिम रूप देना एक लंबी और बेहद बारीक कारीगरी वाली प्रक्रिया है। सबसे पहले लोहे या लकड़ी के मजबूत ढांचे की मदद से मूर्ति का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद मिट्टी की परतों से भगवान गणेश के स्वरूप को उकेरा जाता है। मूर्ति के चेहरे के भावों, आंखों और नैन-नक्श को उकेरने के लिए बहुत ही बारीक नक्काशी की जाती है। सबसे अंतिम चरण में मूर्तियों को चमकीले रंगों, वस्त्रों और आभूषणों की चित्रकारी से सजाया जाता है। बाजार की बदलती मांग के अनुसार कारीगर पारंपरिक रूपों के अलावा आधुनिक और थीम आधारित मूर्तियां भी बनाते हैं। इन प्रतिमाओं की कीमत उनके आकार, नक्काशी की बारीकी, फिनिशिंग और डिजाइन की अवधारणा के आधार पर निर्धारित की जाती है।
पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर और अटूट जन-आस्था
धूलपेट में मूर्तिकला का यह काम महज एक व्यापार नहीं है, बल्कि यह कई पीढ़ियों से चला आ रहा एक सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। परिवार के बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक इस पारंपरिक हुनर को बहुत गर्व और जज्बे के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। जिन मूर्तियों को धूलपेट की संकरी गलियों में तराशा और रंगा जाता है, वे ही आने वाले दिनों में विशाल पंडालों में स्थापित होकर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र बनती हैं। इस प्रकार धूलपेट के ये हुनरमंद कारीगर हर साल अपनी लगन और मेहनत से साधारण मिट्टी को जन-आस्था के अटूट प्रतीक में बदल देते हैं।



















