चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित करते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली ने सुपर माइक्रोसर्जरी की अत्याधुनिक कार्यप्रणाली को व्यवहार में उतारना शुरू कर दिया है। संस्थान के बर्न एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग द्वारा आयोजित एक विशेष व्यावहारिक कार्यशाला के जरिए सर्जनों को उन अति सूक्ष्म शारीरिक संरचनाओं के ऑपरेशन की बारीकियां समझाई गईं, जिन्हें सामान्य आंखों से देख पाना लगभग असंभव होता है।
रक्त वाहिकाओं को जोड़ने का नया तकनीकी दायरा
विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मनीष सिंघल ने इस प्रक्रिया के तकनीकी अंतर को स्पष्ट किया। पारंपरिक माइक्रोसर्जिकल विधियों में सर्जन आमतौर पर कुछ मिलीमीटर व्यास वाली रक्त वाहिकाओं का संधान करते हैं। इसके विपरीत, सुपर माइक्रोसर्जरी प्रणाली 0.8 मिलीमीटर से कम व्यास वाली बेहद महीन नलिकाओं पर केंद्रित होती है, जिसमें 0.3 से लेकर 0.5 मिलीमीटर तक की सूक्ष्म धमनियों और नसों को आपस में जोड़ा जाता है।
इन जटिल ऑपरेशनों को अंजाम देने के लिए अत्यधिक क्षमता वाले विशेष सर्जिकल माइक्रोस्कोप के साथ-साथ अत्यंत बारीक सर्जिकल उपकरणों की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया में जिन टांकों का प्रयोग किया जाता है, उनकी मोटाई इंसान के बाल के एक रेशे के मुकाबले तीन से पांच गुना तक कम होती है। साधारण सूक्ष्मदर्शी उपकरणों की मदद से इस स्तर की सूक्ष्म शल्यक्रिया कर पाना संभव नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की मौजूदगी में छह सफल ऑपरेशन
इस शैक्षणिक और व्यावहारिक आयोजन में सुपर माइक्रोसर्जरी एवं लिंफैटिक पुनर्निर्माण के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ दक्षिण कोरिया के प्रोफेसर जून पियो (जे.पी.) हांग मुख्य रूप से शामिल हुए। उनके साथ ही कोयंबटूर स्थित गंगा अस्पताल से डॉ. हरि वेंकटरमणी तथा कासरगोड के एस्टर अस्पताल से डॉ. समरीन जाफर ने भी अपने नैदानिक अनुभव साझा किए।
इस सत्र के दौरान कुल छह जटिल शल्यक्रियाएं सफलतापूर्वक संपन्न की गईं। इनमें फाइलेरियासिस के मरीजों में लसीका तंत्र की रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, स्तन कैंसर के उपचार के उपरांत बांह में होने वाली गंभीर सूजन का निवारण तथा मधुमेह की वजह से पैरों में पड़ने वाले पुराने अल्सर को ठीक करने के लिए अति पतले स्किन फ्लैप का प्रयोग शामिल था।
मैपिंग की नई विधाएं और भविष्य की दिशा
कार्यशाला के मंच पर देश में पहली बार ऐसी उन्नत नैदानिक विधियों का प्रदर्शन किया गया जो अधिकांश भारतीय चिकित्सा केंद्रों में अभी सुलभ नहीं हैं। इनमें इंडोसायनाइन ग्रीन (आईसीजी) इन्फ्रारेड मैपिंग और हाई फ्रिक्वेंसी अल्ट्रासाउंड मैपिंग प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन तकनीकों के जरिए ऑपरेशन से पूर्व ही सूक्ष्म नलिकाओं के प्रवाह का सटीक खाका तैयार कर लिया जाता है।
एम्स नई दिल्ली पहले से ही सालाना 300 से अधिक पारंपरिक माइक्रोसर्जिकल प्रक्रियाएं संपन्न करता रहा है। संस्थान अब वैश्विक स्तर के शीर्ष सुपर माइक्रोसर्जिकल केंद्रों की कतार में शामिल होने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। यह प्रगति कैंसर से जुड़ी विकृतियों, लिम्फोएडेमा और डायबिटिक फुट अल्सर के साथ-साथ डिमेंशिया एवं माइग्रेन के सर्जिकल समाधान के नए रास्ते तैयार करेगी।























