दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी डूसू के चुनावी घमासान का असर इन दिनों इंटरनेट और सोशल मीडिया मंचों पर साफ दिखाई दे रहा है। चारों तरफ रंग-बिरंगे पोस्टर, रील्स, मीम्स और हैशटैग की भरमार देखने को मिल रही है, जिससे ऐसा आभास होता है मानो चुनावी लड़ाई पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है। वास्तविकता यह है कि इस आभासी प्रचार के पीछे कैंपस की जमीनी सियासत बिल्कुल अलग धरातल पर काम करती है। वर्ष 2014 से लेकर 2026 तक के डूसू के चुनावी सफर को देखें, तो छात्रसंघ अध्यक्ष पद की कुर्सी अमूमन दो प्रमुख जातियों जाट और गुर्जर के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। हाई-टेक कैंपेन के इस दौर में भी कैंपस की राजनीति पर इन दो समुदायों की मजबूत पकड़ के पीछे गहरे सामाजिक, भौगोलिक और सांगठनिक कारण छिपे हैं।
कम मतदान और संगठित स्थानीय वोट बैंक का गणित
डूसू से जुड़े 52 कॉलेजों और संस्थानों में करीब 1.5 लाख पंजीकृत छात्र मतदाता हैं। इसके बावजूद मतदान का प्रतिशत अमूमन केवल 40 फीसदी के आसपास ही सिमट कर रह जाता है। इस सीमित मतदान प्रतिशत के बीच दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्थानीय छात्र सबसे निर्णायक शक्ति बनकर उभरते हैं। आम छात्र जहां वोटिंग के दिन को छुट्टी मानकर घर बैठ जाते हैं या कैंपस से दूर रहते हैं, वहीं ये स्थानीय छात्र अपनी बिरादरी, गांव और उम्मीदवार के समर्थन में एकजुट होकर मतदान केंद्रों तक पहुंचते हैं और भारी मतदान सुनिश्चित करते हैं।
कैंपस का भौगोलिक बंटवारा और कॉलेजों की बनावट
यूनिवर्सिटी के कॉलेजों की भौगोलिक अवस्थिति भी इस दबदबे को तय करने में अहम भूमिका निभाती है। बाहरी दिल्ली और नजफगढ़ बेल्ट के कॉलेजों में जाट छात्रों की संख्या काफी ज्यादा रहती है। इसके उलट, साउथ कैंपस और कालकाजी के आसपास के कॉलेजों में गुर्जर छात्रों का मजबूत जनाधार मौजूद है। कॉलेजों का यह भौगोलिक और जनसांख्यिकीय विभाजन दोनों समुदायों को अपने-अपने प्रभाव वाले इलाकों में निर्णायक बढ़त दिलाता है, जिसका सीधा असर अंतिम चुनावी नतीजों पर पड़ता है।
प्रमुख छात्र संगठनों की चुनावी मजबूरी और टिकट वितरण
छात्र राजनीति में भले ही बड़ी-बड़ी वैचारिक बातें की जाती हों, लेकिन टिकट बांटते समय प्रमुख छात्र संगठन जमीनी समीकरणों को ही प्राथमिकता देते हैं। छात्र के काम या योग्यता से कहीं अधिक उसकी जीत की संभावना और जातीय ताकत को देखा जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि एक प्रमुख छात्र संगठन जाट समुदाय से उम्मीदवार उतारता है, तो दूसरा दल तुरंत गुर्जर बिरादरी का मजबूत चेहरा सामने लाकर या उसी जाति का प्रत्याशी देकर मुकाबला साधने की रणनीति अपनाता है।
साधनों की प्रचुरता और भारी-भरकम प्रचार अभियान
डूसू के चुनाव अब देश के सबसे महंगे छात्र चुनावों में तब्दील हो चुके हैं। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संपन्न व जमींदार परिवारों से ताल्लुक रखने वाले प्रत्याशियों के पास आर्थिक संसाधनों की कोई कमी नहीं होती। लग्जरी गाड़ियों के लंबे काफिले, दिल्ली भर में लगाए जाने वाले विशालकाय होर्डिंग्स और महंगे प्रचार अभियानों का खर्च ये संपन्न परिवार आसानी से वहन कर लेते हैं। इस प्रचंड आर्थिक और शारीरिक प्रभाव के सामने साधारण परिवार से आने वाला आम छात्र दौड़ में शामिल होने से पहले ही पिछड़ जाता है।
ग्रामीण ताना-बाना और खाप पंचायतों का समर्थन
इन दोनों समुदायों के पास एक विशिष्ट सामाजिक नेटवर्क मौजूद है, जो अन्य राज्यों या दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों के पास नहीं होता। राष्ट्रीय राजधानी के आसपास के ग्रामीण इलाकों और खाप पंचायतों का मौन अथवा खुला समर्थन इन प्रत्याशियों को मिलता है। गांवों के प्रभावशाली बड़े-बुजुर्ग, स्थानीय प्रधान और सीनियर छात्र इस प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं। वे यूनिवर्सिटी में नया दाखिला लेने वाले अपने क्षेत्र के युवाओं को एकजुट करने और उनके वोट को एकमुश्त दिलाने में सफल रहते हैं।
पीजी और हॉस्टल नेटवर्क पर स्थानीय नियंत्रण
यूनिवर्सिटी कैंपस के आसपास स्थित प्रमुख छात्र बस्तियों जैसे ढाका, मुखर्जी नगर, मौरिस नगर और सत्यनिकेतन में बड़े पैमाने पर पेइंग गेस्ट आवास और निजी हॉस्टल चलते हैं। इनमें से अधिकतर हॉस्टलों का संचालन स्थानीय लोगों के हाथों में है। स्थानीय और बिरादरी के संबंधों के कारण खास उम्मीदवारों को इन हॉस्टलों और रिहायशी क्षेत्रों में सीधे जाने, प्रचार करने और समर्थन जुटाने की विशेष छूट मिल जाती है, जो किसी बाहरी राज्य के उम्मीदवार के लिए जुटा पाना बेहद कठिन होता है।
दैनिक यात्रियों की मौजूदगी और सीधी रेल-सड़क कनेक्टिविटी
दिल्ली विश्वविद्यालय का कैंपस हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमाओं के बेहद करीब है। रोहतक, सोनीपत, झज्जर, बागपत और गाजियाबाद जैसे शहरों से रोजाना हजारों विद्यार्थी लोकल ट्रेनों, मेट्रो और निजी वाहनों के जरिए डीयू पहुंचते हैं। यह रोज आने-जाने वाले छात्रों का ऐसा बड़ा वर्ग है, जो कक्षाएं खत्म होते ही शाम को अपने घर लौट जाता है, लेकिन चुनाव वाले दिन अपने क्षेत्र और जाति से जुड़े प्रत्याशी के पक्ष में पूरी ताकत से मतदान करने पहुंचता है।
दबंग छवि और नए विद्यार्थियों को सुरक्षा का भरोसा
कॉलेज में दाखिला लेने वाले नए विद्यार्थियों के बीच अक्सर जाट और गुर्जर नेताओं की छवि मजबूत, दबंग और मददगार के रूप में पेश की जाती है। एडमिशन के समय फॉर्म भरने से लेकर हॉस्टल दिलाने या स्थानीय स्तर पर किसी विवाद और टकराव की स्थिति में सुरक्षा का भरोसा देकर ये नेता नए छात्रों का विश्वास हासिल कर लेते हैं। शुरुआत में मिला यही सहारा बाद में एक वफादार और भरोसेमंद वोट बैंक में तब्दील हो जाता है।
मुख्यधारा के सियासी दलों की रणनीतिक नजर
देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां डूसू को मुख्यधारा की राजनीति की नर्सरी के रूप में देखती हैं। दिल्ली और हरियाणा के आगामी विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर वे छात्र राजनीति के इन जातीय समीकरणों को पूरा संरक्षण देती हैं। बड़े राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता भी उन्हीं छात्र चेहरों पर समय और संसाधन लगाते हैं, जो आगे चलकर उनकी अपनी जाति के विशाल वोट बैंक को साधने में मददगार साबित हो सकें।
पूर्वांचली छात्रों की संख्या और सांगठनिक बिखराव
संख्या बल के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के भीतर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले पूर्वांचली विद्यार्थियों की तादाद बहुत बड़ी है। इसके बावजूद वे राजनीतिक तौर पर एकजुट होकर कोई मजबूत मोर्चा नहीं बना पाते। किसी एक सर्वमान्य चेहरे का अभाव, स्थानीय संबंधों की कमी तथा वित्तीय और सांगठनिक मजबूती न होने के कारण वे चुनाव के समय बिखर जाते हैं। इस बिखराव का सीधा लाभ संगठित स्थानीय लॉबी को मिलता है और डूसू की सत्ता की चाबी पारंपरिक जातीय गठजोड़ के पास ही बनी रहती है।



















