बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर 3 सितंबर 2026 को आधिकारिक यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे, जिससे भारत और बेल्जियम के बीच द्विपक्षीय संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है। हवाई अड्डे पर भारत के रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने बेल्जियम के प्रधानमंत्री का औपचारिक स्वागत किया। प्रधानमंत्री वेवर के साथ बेल्जियम के रक्षा मंत्री थियो फ्रैंकेन और देश के प्रमुख उद्योगपतियों का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी भारत आया है। करीब दो दशक के लंबे अंतराल के बाद बेल्जियम के किसी प्रधानमंत्री की यह पहली भारत यात्रा है। यह दौरा दोनों देशों के बीच सिर्फ पारंपरिक व्यापारिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे को अधिक मजबूत बनाना है। दोनों देशों के बीच वार्ता के मुख्य एजेंडे में रक्षा सहयोग, हीरा व्यापार, हरित ऊर्जा, आपूर्ति श्रृंखला, समुद्री सुरक्षा और उन्नत तकनीक शामिल हैं।
हीरा कारोबार का मजबूत रिश्ता: एंटवर्प से मुंबई और सूरत तक का सफर
भारत और बेल्जियम के आर्थिक संबंधों की सबसे मजबूत बुनियाद दोनों देशों का हीरा उद्योग है, जहाँ दोनों देश एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करते हैं। बेल्जियम का एंटवर्प शहर दशकों से दुनिया में कच्चे हीरों के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। दुनिया भर की खदानों से निकलने वाले कच्चे हीरों की खरीद-बिक्री और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी आपूर्ति इसी शहर के माध्यम से होती है। इस वैश्विक कारोबार में भारतीय व्यापारियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से गुजरात के पालनपुरी जैन समुदाय के अनेक परिवारों ने एंटवर्प में अपनी मजबूत कारोबारी पहचान बनाई और पीढ़ियों से इस व्यापार को संचालित करते आ रहे हैं। इन भारतीय कारोबारियों ने यूरोप के आपूर्ति नेटवर्क को भारत के विनिर्माण केंद्रों से जोड़कर एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक तंत्र खड़ा किया है।
दूसरी तरफ, भारत में हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग का विशाल औद्योगिक ढांचा मौजूद है, जिसमें गुजरात का सूरत शहर दुनिया का सबसे प्रमुख केंद्र है। एंटवर्प जैसे वैश्विक व्यापारिक केंद्रों से कच्चा हीरा भारत पहुंचता है, जहां भारतीय कारीगर और आधुनिक इकाइयां अपनी दक्षता से उन हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग करती हैं। तैयार होने के बाद ये पॉलिश्ड हीरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात किए जाते हैं। अपने मुंबई दौरे के दौरान बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर भारत डायमंड बोर्स का दौरा करेंगे, जो दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड एक्सचेंज परिसर है। यह दौरा एंटवर्प के कारोबारी हब और भारत की विनिर्माण क्षमता के बीच के गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। दोनों देश हीरा क्षेत्र में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि सहयोगी हैं, और यह पूरा मूल्य नेटवर्क हर साल अरबों डॉलर का व्यापार पैदा करता है और लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
यूरोपीय बाजार में भारत के लिए बेल्जियम की रणनीतिक भूमिका
भौगोलिक दृष्टिकोण से बेल्जियम भले ही यूरोप का एक छोटा देश दिखता हो, लेकिन यूरोपीय संघ के ढांचे में उसकी स्थिति बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक है। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स को यूरोपीय संघ की प्रशासनिक और राजनीतिक राजधानी माना जाता है, जहां से पूरे यूरोप के नीतिगत और व्यापारिक निर्णय संचालित होते हैं। इसके साथ ही, बेल्जियम का एंटवर्प-ब्रूजेस बंदरगाह यूरोप के सबसे बड़े और आधुनिक लॉजिस्टिक्स केंद्रों में से एक है। यह बंदरगाह यूरोपीय महाद्वीप के भीतरी भागों तक माल पहुँचाने का एक प्रमुख प्रवेश द्वार है। भारतीय निर्यातकों और कंपनियों के लिए एंटवर्प बंदरगाह का इस्तेमाल यूरोपीय बाजारों में अपनी आसान और सीधी पहुंच बनाने का एक बहुत बड़ा अवसर प्रदान करता है।
वर्तमान समय में भारत और बेल्जियम के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 13 अरब डॉलर के स्तर पर है। दोनों देशों के बीच यह व्यापारिक रिश्ता केवल हीरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, भारी मशीनरी और इंजीनियरिंग सामानों का बड़ा योगदान है। प्रधानमंत्री बार्ट डे वेवर की इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य इन पारंपरिक व्यापारिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर नए तकनीकी और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है। दोनों देशों के बीच बंदरगाह कनेक्टिविटी, हरित ऊर्जा, टिकाऊ आपूर्ति श्रृंखला और आधुनिक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इन क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ने से भारतीय कंपनियों को पूरे यूरोपीय बाजार में अपने कारोबार और निवेश का विस्तार करने के लिए एक मजबूत प्लेटफॉर्म मिलेगा।
प्रथम विश्व युद्ध का ऐतिहासिक पन्ना: बेल्जियम में भारतीय सैनिकों का बलिदान
भारत और बेल्जियम का रिश्ता केवल व्यापारिक और आर्थिक हितों पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा ऐतिहासिक संबंध भी जुड़ा हुआ है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों की ओर से युद्ध लड़ने के लिए बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों को यूरोप भेजा गया था। इन वीर सैनिकों ने बेल्जियम की धरती पर कई भीषण लड़ाइयों में हिस्सा लिया और अद्वितीय साहस का परिचय दिया। विशेष रूप से बेल्जियम के फ्लैंडर्स और ईपेज शहर के आसपास के युद्ध क्षेत्रों में भारतीय जवानों ने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपनी जान की बाजी लगा दी थी।
बेल्जियम की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर करने वाले हजारों भारतीय सैनिकों के बलिदान को आज भी बेल्जियम में अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है। बेल्जियम में बने स्मारक और युद्ध कब्रिस्तान इस ऐतिहासिक साझी शहादत की गवाही देते हैं। कूटनीतिक वार्ताओं और उच्चस्तरीय मुलाकातों के दौरान दोनों देशों के नेता इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हैं, जो दोनों राष्ट्रों के बीच भावनात्मक और सांस्कृतिक विश्वास को गहरा करता है। यह साझी ऐतिहासिक विरासत आधुनिक दौर में नई दिल्ली और ब्रसेल्स के बीच राजनीतिक विश्वास को और अधिक मजबूती प्रदान करती है।
वैश्विक भू-राजनीति और सुरक्षा की चुनौतियां
वर्तमान समय में जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक और रणनीतिक स्थितियां तेजी से बदल रही हैं, बेल्जियम के प्रधानमंत्री की यह यात्रा अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण समय पर हो रही है। यूरोप के देश अपनी आर्थिक निर्भरता को कम करने और आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने के प्रयास कर रहे हैं। विशेष रूप से चीन जिस तरह से यूरोपीय बाजारों और इंफ्रास्ट्रक्चर में अपनी आर्थिक उपस्थिति बढ़ा रहा है, उसे देखते हुए यूरोपीय देश भारत जैसे मजबूत और भरोसेमंद लोकतांत्रिक साझेदार की ओर रुख कर रहे हैं। बेल्जियम भारत के साथ अपने संबंधों को मजबूत करके अपनी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित और संतुलित बनाना चाहता है।
भारतीय दृष्टिकोण से भी यूरोपीय संघ के बेल्जियम जैसे महत्वपूर्ण सदस्य देश के साथ संबंध मजबूत करना बेहद फायदेमंद है। यह रणनीतिक नजदीकी चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षा और पाकिस्तान द्वारा की जाने वाली रणनीतिक मोर्चेबंदी का जवाब देने में भी सहायक साबित होगी। बेल्जियम के प्रतिनिधिमंडल में रक्षा मंत्री थियो फ्रैंकेन की मौजूदगी यह दर्शाती है कि दोनों देश आने वाले समय में रक्षा उपकरणों के सह-उत्पादन, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सूचनाओं के आदान-प्रदान पर गंभीरता से आगे बढ़ना चाहते हैं। यह यात्रा आर्थिक सहयोग, ऐतिहासिक संबंधों और वैश्विक सुरक्षा के साझा दृष्टिकोण का एक नया ढांचा तैयार करती है।



















