आने वाले समय में हवाई संघर्षों का स्वरूप पूरी तरह बदलने जा रहा है, जहां मानवरहित और ऑटोमेटेड तकनीक युद्ध के मैदान में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरेंगी। इसी बदलाव को स्वीकार करते हुए भारतीय वायुसेना ने अपनी आक्रमण क्षमता को नए आयाम देने की दिशा में गंभीर कदम उठाए हैं। वायुसेना ने मानवरहित प्रणालियों और आधुनिक ऑटोनॉमस गैजेट्स को लेकर अपना महत्वाकांक्षी खाका देश के घरेलू रक्षा उद्योग के सामने पेश कर दिया है। इस विस्तृत योजना के अंतर्गत कुल 16 तरह की उन्नत ड्रोन प्रणालियों को जगह दी गई है, जिन्हें जरूरत और उपयोग के आधार पर चार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में इस सिलसिले में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई थी, जिसमें रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ 100 से ज्यादा औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य देश की अपनी घरेलू क्षमताओं को मजबूत करना और विदेशों पर निर्भरता को कम करना है। वायुसेना अब पारंपरिक लड़ाकू विमानों के बेड़े के साथ आधुनिक ड्रोनों की ताकत को मिलाकर एक ऐसी मजबूत रक्षा पंक्ति तैयार करना चाहती है जिसे भेद पाना दुश्मन के लिए असंभव हो।
ड्रोन प्रणालियों का वर्गीकरण और पोखरण कनेक्शन
युद्ध के बदलते तौर-तरीकों को देखते हुए केवल पारंपरिक जेट विमानों के सहारे जीत हासिल करना अब मुमकिन नहीं रह गया है। इसी जमीनी हकीकत को समझते हुए वायुसेना ने अपनी प्राथमिकताओं का दायरा काफी व्यापक कर दिया है। नई रूपरेखा में जिन 16 तरह की प्रणालियों को चिन्हित किया गया है, उन्हें रणनीतिक, अभियानगत, सामरिक और किफायती श्रेणियों में बांटा गया है। यह पूरा खाका असल में 14 सितंबर 2026 को पोखरण में संपन्न हुए ड्रोनाथॉन आयोजन का ही अगला और उन्नत चरण है। अब इस पूरी कार्ययोजना को एक विशेष पुस्तिका के रूप में देश के छोटे उद्योगों, एमएसएमई और स्टार्टअप्स तक औपचारिक रूप से पहुंचा दिया गया है। इसके जरिए युवा रचनाकारों और तकनीकी विशेषज्ञों को स्पष्ट संकेत दे दिए गए हैं कि आने वाले दिनों में सेना को किस तरह के अत्याधुनिक उपकरणों की आवश्यकता होगी ताकि वे उसी दिशा में अनुसंधान कर सकें।
मानवयुक्त और मानवरहित विमानों की साझा उड़ान
भविष्य के हवाई अभियानों की रूपरेखा कुछ इस तरह तैयार की जा रही है कि मानवयुक्त लड़ाकू विमान और मानवरहित ड्रोन एक साथ मिलकर शत्रु पर हमला बोल सकें। वायुसेना की यह योजना एक ऐसे एकीकृत नेटवर्क पर आधारित है जहां फाइटर जेट सीधे तौर पर ड्रोनों के झुंड को नियंत्रित और निर्देशित कर सकेंगे। इस तकनीक के इस्तेमाल से सीमा के उस पार बैठे विरोधी खेमे के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को आसानी से गच्चा दिया जा सकता है। विज्ञान भवन में हुई इस कार्यशाला के दौरान उद्योग जगत के दिग्गजों को यह भी समझाया गया कि देश को इस समय स्वदेशी प्रोपल्शन तकनीक और ऑटोनॉमस सॉफ्टवेयर की सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि ये सभी तकनीकें देश के भीतर ही विकसित कर ली जाती हैं, तो किसी भी बाहरी आपूर्तिकर्ता देश के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि किसी भी विकट या आपात परिस्थिति में हमारी हथियारों और उपकरणों की आपूर्ति श्रृंखला पर कभी कोई आंच न आए।
आत्मनिर्भरता और समय पर तकनीक मिलने का संदेश
वायुसेना मुख्यालय में वेपन सिस्टम्स के महानिदेशक एयर मार्शल प्रेमकुमार कृष्णस्वामी ने इस पूरी रणनीति का खाका देश के सामने विस्तार से रखा। उन्होंने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा कि ड्रोन और ऑटोनॉमस सिस्टम्स के मामले में आत्मनिर्भर होना अब केवल एक वैकल्पिक विचार नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी सीधी ऑपरेशनल मजबूरी बन चुका है। एयर मार्शल ने यह भी रेखांकित किया कि देश की वायु शक्ति अब तीव्र गति से पूरी तरह ऑटोमेशन की तरफ बढ़ रही है। उन्होंने देश की सभी रक्षा निर्माण कंपनियों और प्रमुख अनुसंधान संस्थानों से पुरजोर अपील की है कि वे अपने कामकाज की रफ्तार को और तेज करें। उनका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रयोगशालाओं में तैयार होने वाला हर एक नया नवाचार जल्द से जल्द मैदानी सैन्य अभियानों का व्यावहारिक हिस्सा बन सके। जब सही तकनीक तय समय पर सीधे सैनिकों और पायलटों के हाथ लगेगी, तभी देश की भौगोलिक सीमाएं पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो पाएंगी।



















