नागरिकों की रोजमर्रा की सहूलियत और शांतिपूर्ण आंदोलन के संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन कायम करने के मकसद से देश की शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। दस अक्टूबर को राजधानी में प्रस्तावित विभिन्न आंदोलनों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को स्पष्ट हिदायत दी है कि आम यात्रियों के सफर को पूरी तरह बाधित न किया जाए। शहरी जीवन की जीवनरेखा मानी जाने वाली मेट्रो और लंबी दूरी की रेलगाड़ियों को पूर्ण रूप से ठप करने के स्थान पर प्रशासन को नियंत्रित व व्यावहारिक नियमन की व्यवस्था लागू करनी होगी, जिससे दैनिक सफर करने वाले सामान्य लोगों को बेवजह संकट का सामना न करना पड़े।
मेट्रो फाटकों पर पाबंदी और आनुपातिकता का दायरा
राजधानी के सत्तावन प्रमुख भूमिगत व ऊपरी मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश द्वारों को पूरी तरह बंद कर देने की प्रशासनिक कार्ययोजना पर न्यायिक पीठ ने गहरी नाराजगी जाहिर की। सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि कानून व्यवस्था संभालने के नाम पर आम शहरी आबादी की स्वतंत्रता और गतिशीलता को पूरी तरह बंधक नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने संबंधित अधिकारियों को तुरंत सुधारात्मक उपाय अपनाने की नसीहत दी और याद दिलाया कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में आनुपातिकता के बुनियादी सिद्धांत का पालन होना अनिवार्य है। पाबंदियों की रूपरेखा इस प्रकार तय नहीं होनी चाहिए कि वह जरूरत से ज्यादा सख्त और जनविरोधी साबित हो। इसके साथ ही जनता की अनिश्चितता को दूर करने के लिए अदालत ने आदेश दिया कि यात्रा संबंधी जो भी नियम लागू किए जाएं, उनका व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार सुनिश्चित किया जाए ताकि भ्रम की स्थिति न बने।
संवेदनशील इलाकों में कानून व्यवस्था और निगरानी
शनिवार को जंतर मंतर पर सीजेपी द्वारा आयोजित किए जाने वाले मार्च को देखते हुए पुलिस महकमा पूरी तरह सतर्क हो गया है। उत्तर पूर्वी दिल्ली के डीसीपी राहुल अलवाल ने स्थानीय युवाओं से सीधे संवाद करते हुए अपील जारी की है कि वे किसी भी गैर-स्वीकृत स्थल पर एकत्र होकर विरोध प्रदर्शन करने से पूरी तरह परहेज करें। पुलिस अधिकारी ने क्षेत्र के विभिन्न धार्मिक स्थलों, मस्जिदों और मौलवियों से भी संपर्क साधा है ताकि वे अपनी तकरीरों के जरिए युवाओं तक शांति बनाए रखने का पैगाम पहुंचा सकें। प्रशासन का कहना है कि पूर्व अनुमति के बिना सड़कों पर उतरना कानूनी जटिलताएं पैदा कर सकता है, इसलिए दिशा-निर्देशों का हर हाल में सम्मान होना चाहिए।
विपक्षी दलों की तीखी राजनीतिक गोलबंदी
दूसरी तरफ राजधानी के राजनीतिक गलियारों में निर्वाचन व्यवस्था और प्रशासनिक नीतियों को लेकर विरोध की आवाजें और बुलंद हो गई हैं। एसआईआर की प्रक्रिया के विरोध के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग पर अड़े विपक्षी खेमे ने सड़कों पर संघर्ष तेज कर दिया है। इसी मुद्दे पर बोलते हुए कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने स्पष्ट किया कि न्याय की बहाली तक उनका यह अभियान थमने वाला नहीं है। उन्होंने कहा,
संविधान ने हमें आवाज उठाने का अधिकार दिया है।उन्होंने जोर देकर कहा कि रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल उठाना किसी भी नागरिक का मौलिक हक है। उनके अनुसार जब तक सत्तापक्ष वास्तविक जमीनी हकीकत को स्वीकार नहीं करता, तब तक विपक्ष संसद से लेकर सड़क तक हर उपलब्ध लोकतांत्रिक मंच पर अपनी यह लड़ाई लड़ता रहेगा।
रेलवे परिसरों में बहुस्तरीय सुरक्षा चक्र
संभावित हलचल और भीड़ के दबाव को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली के रेल नेटवर्क पर कड़े पहरे का खाका खींचा गया है। रेलवे पुलिस उपायुक्त बी. भरत रेड्डी के अनुसार राजधानी के सात सबसे बड़े टर्मिनल पर चौबीस घंटे का अभेद्य सुरक्षा घेरा तैयार किया गया है। इस सुरक्षा ढांचे में तीन सौ चौंतीस जीआरपी जवान और करीब एक सौ बीस महिला पुलिसकर्मियों की टुकड़ियां सीधे तौर पर मुस्तैद की गई हैं। अतिरिक्त शक्ति के तौर पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की चौदह पूरी कंपनियों को संवेदनशील प्वाइंट्स पर तैनात किया गया है।
विशेष रूप से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और हजरत निजामुद्दीन के आसपास के पूरे इलाके को कड़ी निगरानी में रखा गया है। आधुनिक सीसीटीवी कंट्रोल रूम से एक-एक संदिग्ध गतिविधि और प्लेटफार्मों पर जमावड़े की लगातार ट्रैकिंग की जा रही है। तकनीकी टीम सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर नजर बनाए हुए है ताकि अफवाह फैलाने वालों या माहौल बिगाड़ने वालों को समय रहते रोका जा सके। रेलवे प्रशासन ने साफ किया है कि सामान्य आवागमन पर कोई रोक नहीं है, बशर्ते नियमों का उल्लंघन न हो। हालांकि सुरक्षा रणनीति के तहत शनिवार को सुबह चार बजे से दोपहर दो बजे की समयावधि के लिए नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन आने-जाने वाली कुछ ट्रेनों के परिचालन को निरस्त किया गया है।






















