जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने 11 छात्राओं द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों की जांच पूरी होने के बाद संबंधित प्रोफेसर को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। विश्वविद्यालय की आंतरिक समिति द्वारा प्रस्तुत जांच निष्कर्षों और सेवा नियमों के तहत यह कड़ा प्रशासनिक कदम उठाया गया है। अधिकारियों ने सभी उपलब्ध साक्ष्यों, बयानों और जांच रिपोर्ट की समीक्षा करने के बाद प्रोफेसर को तत्काल प्रभाव से संस्थान से बाहर का रास्ता दिखाया है।
आंतरिक समिति की जांच और सेवा नियमों के तहत सख्त सिफारिश
छात्राओं की शिकायत पर संस्थान की आंतरिक समिति ने विस्तृत जांच प्रक्रिया संचालित की थी। समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में सेंट्रल सिविल सर्विसेज (क्लासिफिकेशन, कंट्रोल एंड अपील) रूल्स के नियम 11(ix) और विश्वविद्यालय के सर्विस नियमों का हवाला देते हुए आरोपी शिक्षक पर अधिकतम दंड लगाने की सिफारिश की। इस सिफारिश को स्वीकार करते हुए प्रशासन ने कड़ा फैसला लिया, जिससे यह साफ संदेश दिया जा सके कि शैक्षणिक परिसरों में इस तरह के आचरण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मई महीने में दर्ज कराई गई थी शिकायत
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत इसी वर्ष मई महीने में हुई थी, जब संस्थान की 11 छात्राओं ने एक साथ आगे आकर प्रोफेसर के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। छात्राओं ने आंतरिक समिति के समक्ष यौन उत्पीड़न के विशिष्ट आरोप रखे थे। शिकायत दर्ज होने के कुछ ही समय बाद विश्वविद्यालय में लगभग 45 दिनों का ग्रीष्मकालीन अवकाश शुरू हो गया था, जिसके चलते परिसर की नियमित गतिविधियां अस्थायी रूप से थम गई थीं। इसके बाद जुलाई के मध्य में शैक्षणिक सत्र फिर से शुरू हुआ और कक्षाओं का संचालन दोबारा पटरी पर लौटा।
दिल्ली महिला आयोग की निगरानी और रिपोर्ट तलब
इस मामले में दिल्ली महिला आयोग ने भी कड़ा रुख अख्तियार किया था। आयोग ने आरोपों का स्वतः संज्ञान लेते हुए विश्वविद्यालय की कुलपति को नोटिस भेजा था और तीन दिनों के भीतर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था। आयोग ने चिंता जताई थी कि मई में शिकायत दर्ज होने और कार्यवाही शुरू होने के बाद से संस्थान की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक पटल पर नहीं रखी गई थी। इसी कारण महिला आयोग ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम यानी पॉश एक्ट के तहत गठित समिति की कार्यवाही का पूरा ब्योरा तलब किया था, जिसके बाद इस पूरे मामले में अंतिम फैसला सामने आया।






















