प्लास्टिक और स्टील के बर्तनों के इस दौर में पाली जिले के ग्रामीण इलाके एक ऐसी परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं, जो पर्यावरण के साथ चलती है और जेब पर भी भारी नहीं पड़ती। बीते जमाने में जब हर चीज की कमी थी, तब घर के बुजुर्ग पुराने कागज और रद्दी से ही रोजमर्रा के काम आने वाले बर्तन गढ़ लेते थे। आज भी पाली की कई जागरूक महिलाएं इस विरासत को संभाले हुए हैं और कबाड़ से जुगाड़ का यह अनोखा तरीका अपनी अगली पीढ़ी को सिखा रही हैं।
शुरुआत होती है फेंकी हुई रद्दी से
इस पूरे काम की बुनियाद वही पुराने और फटे अखबार हैं, जिन्हें आम तौर पर हम रद्दी में बेच देते हैं। सबसे पहले इन अखबारों को छोटे-छोटे टुकड़ों में अच्छी तरह फाड़ लिया जाता है। इसके बाद इन टुकड़ों को एक बड़ी बाल्टी में पानी भरकर कई दिनों तक भिगोया जाता है, ताकि कागज के रेशे पूरी तरह नरम पड़ जाएं। जब कागज ढंग से गल जाता है, तो उसे ओखली में डालकर खूब कूटा जाता है। इस मेहनत के बाद कागज एक गाढ़ी लुगदी यानी 'मेल्ट' का रूप ले लेता है — और यही बर्तन बनाने का पहला कदम है।
लुगदी को जोड़ने वाला 'मेट'
कागज की लुगदी तैयार होने के बाद बारी आती है उसे आपस में बांधने की। इसके लिए 'मेट' काम आता है। महिलाएं ओखली में मेट को बारीक पीसती हैं और जरूरत के मुताबिक पानी मिलाकर उसे एकदम तरल या गाढ़े घोल में बदल देती हैं। इस घोल को पहले से तैयार कागज के मेल्ट के साथ मिलाकर अच्छी तरह गूंथा जाता है। इससे मिश्रण इतना मजबूत और लचीला हो जाता है कि उसे मनचाहा आकार दिया जा सके।
मिट्टी के पुराने बर्तन बनते हैं सांचा
जब कागज और मेट का मिश्रण पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसके छोटे-छोटे गोले बना लिए जाते हैं। बर्तन को सही शक्ल देने के लिए मटका या हांडी जैसे पुराने मिट्टी के बर्तनों को सांचे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मिश्रण को मिट्टी के बर्तन के चारों ओर एक समान परत में फैलाया जाता है। जिस तरह का बर्तन बनाना हो, उसी मिट्टी के पात्र पर उसका आकार उतार लिया जाता है।
फिनिशिंग और धूप में सुखाई
आकार पूरी तरह ढल जाने के बाद बर्तन को थोड़ा सख्त होने दिया जाता है। फिर एक तेज चाकू की मदद से किनारों की फिनिशिंग की जाती है और अतिरिक्त हिस्से को सावधानी से काट दिया जाता है। कटाई के बाद इन बर्तनों को कड़ी धूप में सूखने के लिए रख दिया जाता है। सूखने के बाद कागज के ये बर्तन इतने मजबूत हो जाते हैं कि इनमें अनाज, मसाले या दूसरा घरेलू सामान आराम से रखा जा सकता है। यह कला बताती है कि हमारी पारंपरिक पद्धतियां आज भी जीरो बजट में लोगों को बढ़िया सामान दे सकती हैं।













