मानसून के मौसम में गेंदा की खेती करने वाले किसानों के लिए खेत का सही चुनाव सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम है, क्योंकि बारिश में जरा सी लापरवाही पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसी जमीन चुननी चाहिए जहां पानी टिके नहीं, और दोमट या बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे मुफीद मानी जाती है।
मिट्टी और खेत की तैयारी
खेत को अच्छी तरह जोतने के बाद उसमें गोबर की सड़ी हुई खाद मिलानी चाहिए, इससे मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है और पौधों को शुरुआती विकास में मदद मिलती है। इसके बाद खेत में ऊंची क्यारियां बनाकर ही पौधे रोपे जाएं, ताकि तेज बारिश का अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल सके और जड़ों के आसपास पानी जमा न हो।
रोपाई का सही समय और दूरी
मानसून में गेंदा की रोपाई के लिए जुलाई से अगस्त का महीना सबसे उपयुक्त बताया गया है। रोपाई के लिए हमेशा स्वस्थ और रोगमुक्त पौधे ही चुनने चाहिए, क्योंकि कमजोर पौधे बारिश की नमी में जल्दी खराब हो जाते हैं। पौधों के बीच 40 से 45 सेंटीमीटर की दूरी रखना सबसे बेहतर रहता है, इससे पौधों के बीच हवा का आवागमन बना रहता है और फफूंद से होने वाली बीमारियों का खतरा घट जाता है।
खाद और पोषक तत्वों का प्रबंधन
खेत तैयार करते वक्त जैविक खाद का इस्तेमाल गेंदा के पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए जरूरी है। इसके साथ ही मिट्टी की जांच करवाकर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की मात्रा तय करनी चाहिए। नाइट्रोजन एक ही बार में पूरी न देकर दो या तीन बार में देना ज्यादा फायदेमंद होता है, इससे पौधे बेहतर तरीके से बढ़ते हैं और फूलों की संख्या भी बढ़ जाती है।
जलभराव और खरपतवार से बचाव जरूरी
श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग के एचओडी प्रो. अशोक कुमार सिंह के मुताबिक बारिश के दिनों में खेत में पानी जमा होने से पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं, जिसकी वजह से पूरा पौधा खराब हो सकता है। इसलिए खेत में जल निकासी की व्यवस्था हमेशा दुरुस्त रखनी चाहिए। इसके अलावा समय-समय पर खरपतवार निकालते रहना भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि खरपतवार पौधों से पोषक तत्वों की होड़ करते हैं और कई कीट-रोगों के लिए ठिकाना बन जाते हैं।
कीट और रोग नियंत्रण
बरसात में ज्यादा नमी के कारण गेंदा के पौधों में पत्ती धब्बा रोग, जड़ गलन और अन्य फफूंदजनित समस्याएं बढ़ने का खतरा रहता है। इसके अलावा माहू और थ्रिप्स जैसे कीट भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में खेत का नियमित निरीक्षण करते रहना चाहिए और बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखते ही कृषि विशेषज्ञ की सलाह पर जैविक या अनुशंसित दवाओं का छिड़काव करना चाहिए। जो पौधे या पत्तियां संक्रमित हो चुकी हैं, उन्हें तुरंत हटाकर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि बीमारी दूसरे पौधों तक न फैले।
पिंचिंग से बढ़ेगा फूलों का उत्पादन
प्रो. अशोक कुमार सिंह के अनुसार, रोपाई के करीब 30 से 35 दिन बाद पौधों की ऊपरी बढ़वार को पिंच कर देना चाहिए। इस तकनीक से पौधों में ज्यादा शाखाएं निकलती हैं, जिससे फूलों की संख्या में भी बढ़ोतरी होती है। किसानों के बीच पिंचिंग को गेंदा की पैदावार बढ़ाने का बेहद कारगर तरीका माना जाता है।
तुड़ाई का सही तरीका और समय
फूल पूरी तरह खिल जाने के बाद उन्हें सुबह या शाम के वक्त ही तोड़ना चाहिए। ऐसा करने से फूलों की गुणवत्ता बनी रहती है और बाजार में अच्छी कीमत मिलने की संभावना भी बढ़ जाती है। तुड़ाई के बाद फूलों को छायादार जगह पर रखें और जल्द से जल्द मंडी या बाजार तक पहुंचाने की कोशिश करें, ताकि उनकी ताजगी बरकरार रहे।
बारिश में मुनाफा देने वाली किस्में
बरसात के मौसम के लिए गेंदा की जिन किस्मों को सबसे ज्यादा उत्पादन देने वाला माना गया है, उनमें पूसा नारंगी, पूसा बसंती, इंडस टेनिस बॉल (येलो और ऑरेंज दोनों वैरायटी), राशि सुप्रीम येलो और पिरामिड यूकी लेमन शामिल हैं। इनमें से कुछ किस्में तेज बारिश को भी अच्छी तरह झेल लेती हैं और किसानों को अच्छा मुनाफा दिला सकती हैं।




















