भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ दृश्यों का प्रभाव संगीत की वजह से हमेशा के लिए यादगार बन जाता है। चंबल की पृष्ठभूमि पर बनी चर्चित फिल्म बैंडिट क्वीन के एक बेहद मार्मिक प्रसंग के पीछे ऐसा ही एक अनूठा संस्मरण छिपा हुआ है। फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर की रिकॉर्डिंग के समय प्रख्यात कव्वाल और गायक नुसरत फतेह अली खान एक गहरे व्यक्तिगत शोक से जूझ रहे थे। उसी दौर में महान संगीतकार आरडी बर्मन का अप्रत्याशित निधन हुआ था, जिसकी वेदना और आंसुओं का असर सीधे नुसरत फतेह अली खान के गायन में उतर आया था।
रिकॉर्डिंग स्टूडियो में नुसरत की अनूठी गुजारिश
इस ऐतिहासिक क्षण को याद करते हुए निर्देशक शेखर कपूर ने साझा किया कि जब फिल्म के संगीत पर काम चल रहा था, तब नुसरत फतेह अली खान ने उनके सामने एक बेहद अप्रत्याशित शर्त रखी। उन्होंने निर्देशक से कहा कि वे स्क्रीन पर फिल्म का दृश्य देखें जबकि वह खुद सीधे शेखर की आंखों में देखकर अपनी धुन गाएंगे। किसी भी फिल्मकार के लिए यह काम करने का बेहद अलग और हैरान कर देने वाला अनुभव था।
स्टूडियो में जिस दृश्य के लिए बैकग्राउंड स्कोर तैयार किया जा रहा था, वह कहानी का सबसे दिल दहला देने वाला मोड़ था। यह दृश्य बेहमई नरसंहार के तुरंत बाद का था, जिसमें कतारबद्ध जलती चिताओं की लपटें थीं और नदी के तट पर बदहवास महिलाओं के विलाप की गूंज सुनाई दे रही थी। जैसे ही रिकॉर्डिंग का काम शुरू हुआ, गायक ने निर्देशक की आंखों में गहराई से झांकते हुए गाना आरंभ किया। निर्देशक के अनुसार, वह सिर्फ देख नहीं रहे थे बल्कि उस त्रासद दृश्य के दर्द की थाह ले रहे थे।
आरडी बर्मन की याद और दो कलाकारों का भावनात्मक नाता
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे आरडी बर्मन से जुड़ा गहरा लगाव सबसे बड़ी वजह था। नुसरत फतेह अली खान संगीतकार आरडी बर्मन की कला के बहुत बड़े मुरीद थे और उनके चले जाने से भीतर तक आहत थे। वहीं दूसरी तरफ शेखर कपूर का भी आरडी बर्मन के साथ अत्यंत करीबी और आत्मीय नाता था, क्योंकि उन्होंने ही कपूर की पहली फिल्म मासूम का यादगार संगीत तैयार किया था।
आरडी बर्मन की याद ने उस पल दोनों फनकारों के बीच एक मजबूत भावनात्मक पुल तैयार कर दिया था। गायक की आवाज का दर्द और उनकी आंखों का सम्मोहन इतना तीव्र था कि स्टूडियो में मौजूद निर्देशक को ऐसा महसूस होने लगा मानो वे किसी अन्य दुनिया में पहुंच गए हों। उस गायकी ने जीवन और मृत्यु के बीच की लकीर को पूरी तरह मिटा दिया था।
सिनेमाई इतिहास में 1994 की चर्चित कृति
यह संगीतमय जादू जिस फिल्म के लिए रचा गया था, वह साल 1994 में बड़े पर्दे पर रिलीज हुई थी। शेखर कपूर के निर्देशन में बनी बैंडिट क्वीन वास्तविक जीवन की डाकू फूलन देवी के संघर्ष और जिंदगी की घटनाओं पर आधारित थी। इस फिल्म में अभिनेत्री सीमा बिस्वास ने फूलन देवी का केंद्रीय और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया था। देश और दुनिया भर में इस सिनेमाई रचना को जबरदस्त चर्चा और सराहना मिली थी। निर्देशक का कहना है कि जब भी दर्शक इस फिल्म में बेहमई नरसंहार के बाद वाले हिस्से को दोबारा देखें, तो बैकग्राउंड में बजने वाले उस संगीत पर जरूर गौर करें, क्योंकि उसमें दो महान संगीत प्रेमियों का दर्द समाया हुआ है।



















