उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर आगरा अपने विशिष्ट खानपान और पारंपरिक स्वादों के लिए मशहूर है। सर्दियों का दौर शुरू होते ही शहर की रसोईयों में सरसों के साग की भीनी महक घुलने लगती है। ग्रामीण परिवेश का पारंपरिक देसी स्वाद पसंद करने वाले लोग इसे अपने घरों में बहुत ही सरल तरीके से तैयार कर सकते हैं। मौसमी सब्जियों का यह पारंपरिक मेल ठंड के दिनों में भोजन की थाली को खास बना देता है।
मंडियों में नवंबर से दस्तक और जरूरी सामग्री
आगरा की फूड मेकर सुधा शर्मा के अनुसार, सरसों का साग मूल रूप से शीतकालीन मौसम का विशेष व्यंजन है। नवंबर महीने की शुरुआत के साथ ही स्थानीय सब्जी मंडियों में ताजी सरसों की भरपूर आवक शुरू हो जाती है, जिसके साथ ही बाजारों में इसकी खरीदारी और मांग में जोरदार उछाल देखने को मिलता है। एक बेहतरीन साग तैयार करने के लिए सामग्री का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है।
पारंपरिक विधि से साग बनाने के लिए ताजी हरी सरसों, कुटा हुआ अदरक, लहसुन की कलियां, तीखी हरी मिर्च, लाल पके ताजा टमाटर और शुद्ध देसी घी की मुख्य रूप से आवश्यकता पड़ती है। इन बुनियादी सामग्रियों का सटीक संतुलन ही साग के नैसर्गिक स्वाद को निखारता है।
उबालने और दरदरा घोंटने की विधि
साग पकाने की शुरुआत में सबसे पहले ताजी सरसों की पत्तियों को अच्छी तरह छांटकर साफ पानी से धोना जरूरी है, ताकि उसमें लगी मिट्टी पूरी तरह निकल जाए। इसके बाद कटी हुई सरसों को प्रेशर कुकर में डाला जाता है। कुकर के अंदर सरसों के साथ एक गिलास पानी, बारीक कुटा हुआ अदरक, कटे हुए टमाटर और हरी मिर्च मिलाई जाती है। इसके बाद कुकर का ढक्कन अच्छी तरह बंद कर दिया जाता है।
सुधा शर्मा बताती हैं कि कुकर को गैस पर रखकर धीमी आंच पर लगभग 45 मिनट तक पकाना चाहिए। इस तय समय में धीमी आंच पर पकने से सरसों के पत्ते और डंठल पूरी तरह गल जाते हैं और सभी मसालों का अर्क आपस में मिल जाता है। जब समय पूरा हो जाए, तब कुकर खोलकर साग को मथनी, किसी भारी बर्तन या मिक्सर की मदद से दरदरा पीस या घोंट लेना चाहिए। इसे एकदम महीन पेस्ट बनाने के बजाय हल्का दरदरा रखना पारंपरिक बनावट के लिए आवश्यक है।
देसी घी और लहसुन के तड़के का कमाल
साग को मथने के बाद असली स्वाद उसके बघार यानी तड़के से आता है। इसके लिए एक कड़ाही में शुद्ध देसी घी को अच्छी तरह गर्म किया जाता है। जब घी गर्म हो जाए, तब उसमें बारीक कटा लहसुन और घरेलू मसाले डालकर तड़का लगाया जाता है। लहसुन के भुनते ही घोंटा हुआ साग कड़ाही में पलट दिया जाता है और कुछ समय तक धीमी आंच पर घी के साथ पकने दिया जाता है। तड़के का यह देसी घी साग के हर हिस्से में समाकर उसे लाजवाब बना देता है।
रोटी, मक्खन और अचार के साथ पारंपरिक परोस
सुधा शर्मा का कहना है कि सरसों के साग का वास्तविक देसी आनंद पारंपरिक चूल्हे पर तैयार की गई गर्मागर्म मक्के या बाजरे की रोटी के साथ ही मिलता है। स्वाद को कई गुना बढ़ाने में शुद्ध देसी घी की केंद्रीय भूमिका होती है। यदि साग और रोटी दोनों में पर्याप्त मात्रा में देसी घी न डाला जाए, तो वह क्लासिक स्वाद नहीं उभर पाता जिसके लिए यह उत्तर भारतीय व्यंजन जाना जाता है।
घी की उदार मात्रा और गर्मागर्म रोटी पर पिघलता मक्खन भोजन के स्तर को अलग ही मुकाम पर ले जाते हैं। सर्दियों की दोपहर में इस थाली के साथ ताजी कटी मूली और तीखा मिर्च का अचार शामिल करने से यह पारंपरिक भोजन संपूर्ण हो जाता है और गांव की घरेलू रसोई की याद ताजा कर देता है।



















