भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई फिल्में आई हैं जिन्होंने कम बजट में अपनी अनूठी कहानी के दम पर बॉक्स ऑफिस पर अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। साल 2022 में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म 'कार्तिकेय 2' इस बात की एक बहुत बड़ी मिसाल है। यह फिल्म दर्शकों को आस्था, विज्ञान, पौराणिक कथाओं और असीमित रोमांच के एक अनोखे सफर पर ले जाती है। कार्तिकेय नाम के एक निडर डॉक्टर के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी भगवान श्रीकृष्ण के द्वापर युग से जुड़े गुप्त रहस्यों को उजागर करती है। दर्शकों को इस फिल्म का थ्रिल और पौराणिक संदर्भ इतना पसंद आया कि तेलुगू के साथ-साथ इसके हिंदी डब्ड वर्जन ने भी सिनेमाघरों में तहलका मचा दिया और यह साल 2022 की सबसे सफल फिल्मों में शुमार हो गई।
15 करोड़ का बजट, 120 करोड़ की कमाई और राष्ट्रीय पुरस्कार
फिल्म 'कार्तिकेय 2' का निर्माण महज 15 करोड़ रुपये के बजट में किया गया था, लेकिन जब यह सिनेमाघरों में उतरी तो दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा। इस फिल्म ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बॉक्स ऑफिस को मिलाकर 120 करोड़ रुपये से भी अधिक का शानदार कारोबार किया। 13 अगस्त 2022 को बड़े पर्दे पर रिलीज हुई इस फिल्म का निर्देशन और लेखन चंदू मोंडेती ने किया था। यह फिल्म दरअसल साल 2014 में आई सुपरहिट फिल्म 'कार्तिकेय' की आधिकारिक सीक्वल थी। फिल्म में मुख्य भूमिकाएं अभिनेता निखिल सिद्धार्थ और अभिनेत्री अनुपमा परमेश्वरन ने निभाई थीं। दोनों के अभिनय, स्क्रीनप्ले और विजुअल इफेक्ट्स को समीक्षकों तथा दर्शकों दोनों ने खूब सराहा। फिल्म को 1981 में आई मशहूर अमेरिकी एडवेंचर फिल्म 'इंडियाना जोन्स: रेडर्स ऑफ द लॉस्ट आर्क' से प्रेरित माना जाता है। अपनी उत्कृष्ट मेकिंग के दम पर इस फिल्म ने 70वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता, जबकि राज्य स्तर पर इसे प्रतिष्ठित 'गद्दार पुरस्कार' की दूसरी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म की ट्रॉफी से सम्मानित किया गया। इस फिल्म की शूटिंग भारत के अलावा स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस जैसे यूरोपीय देशों के आकर्षक स्थानों पर की गई थी।
ग्रीस की लाइब्रेरी और द्वापर युग का गुप्त संदेश
कहानी की शुरुआत एक बेहद दिलचस्प रहस्य से होती है। पुरातत्वविद और प्रोफेसर रंगनाथ राव ग्रीस की एक ऐतिहासिक लाइब्रेरी में शोध कर रहे होते हैं। वहां उन्हें एक प्राचीन पांडुलिपि मिलती है, जिससे एक बड़े राज का पर्दाफाश होता है। पुस्तक के अनुसार, द्वापर युग के समापन से ठीक पहले भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र उद्धव को एक पवित्र पायल सौंपी थी। इस पायल में उन तमाम विनाशकारी संकटों और जटिल समस्याओं का हल छुपा हुआ था, जिनका सामना मानव जाति को कलयुग के दौरान करना पड़ने वाला था। प्रोफेसर रंगनाथ राव को समझ आ जाता है कि यह धरोहर मानवता की रक्षा के लिए बेहद जरूरी है और वह इसकी खोज में जुट जाते हैं।
अस्पताल का विवाद, पारिवारिक मुसीबतें और द्वारका यात्रा
दूसरी तरफ कहानी के मुख्य नायक कार्तिकेय का परिचय होता है, जो पेशे से एक डॉक्टर हैं और केवल तर्क और विज्ञान पर विश्वास करते हैं। कार्तिकेय का सामना एक शहर के मेयर से होता है, जो अपने बीमार बेटे के इलाज के नाम पर अस्पताल के आईसीयू के भीतर यज्ञ कराने की जिद्द कर रहा होता है। कार्तिकेय इसका कड़ा विरोध करते हैं और गुस्से में आकर मेयर को थप्पड़ जड़ देते हैं। इस घटना के बाद उन्हें डॉक्टरी से सस्पेंड कर दिया जाता है। इसी बीच कार्तिकेय के घर में दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। उनके पिता का पैर दुर्घटना में टूट जाता है और उनके घर के बाहर लगे पवित्र तुलसी के पौधे को एक सांड टक्कर मार देता है। कार्तिकेय की मां इन तमाम घटनाओं को एक अशुभ संकेत मानती हैं। उनका मानना है कि परिवार ने पूर्व में भगवान श्रीकृष्ण से एक मन्नत मांगी थी जिसे पूरा न करने की वजह से उन्हें यह सजा मिल रही है। अपनी मां की बात मानकर कार्तिकेय उन्हें गुजरात के द्वारका ले जाने का फैसला करते हैं, जहां उनके चाचा सदानंद रहते हैं। सदानंद भगवान श्रीकृष्ण के बहुत बड़े भक्त हैं।
रात का सस्पेंस, पुलिस की हिरासत और जानलेवा हमला
द्वारका पहुंचने के बाद कार्तिकेय की जिंदगी में अप्रत्याशित मोड़ आते हैं। एक रात उनकी मुलाकात बुरी तरह घायल प्रोफेसर रंगनाथ राव से होती है। प्रोफेसर रंगनाथ राव कार्तिकेय को ग्रीस की पांडुलिपि और कृष्ण की पायल के बारे में कुछ अहम जानकारी देने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी हालत बिगड़ती देख कार्तिकेय उनकी मदद के लिए ऑटो-रिक्शा लेने भागते हैं। जब वह ऑटो लेकर वापस लौटते हैं, तो प्रोफेसर वहां से रहस्यमयी ढंग से गायब हो चुके होते हैं। अगली सुबह कार्तिकेय की मां भी अचानक लापता हो जाती हैं। कार्तिकेय अपने चाचा सदानंद के साथ अपनी मां की तलाश शुरू करते हैं, लेकिन पुलिस उन्हें ही गिरफ्तार कर लेती है। इसी बीच प्रोफेसर रंगनाथ राव की पोती पुलिस हिरासत से कार्तिकेय को सुरक्षित बाहर निकालती है। इसके बाद एक नकाबपोश हमलावर कार्तिकेय की जान लेने के इरादे से उन पर हमला करता है, लेकिन जैसे ही उसकी नजर पास रखी भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति पर पड़ती है, वह हमला रोक देता है। यह रहस्यमयी घटना कार्तिकेय को उस प्राचीन पहेली को सुलझाने के सफर पर निकलने के लिए मजबूर कर देती है।

















