पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव एक नए और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर गया है। अमेरिकी मध्य कमान यानी CENTCOM ने पुष्टि की है कि अमेरिकी सशस्त्र बलों ने मंगलवार को ईरान के रणनीतिक वायु रक्षा प्रणालियों और नौसैनिक परिसरों पर सिलसिलेवार सैन्य हमले किए हैं। यह कार्रवाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक जहाजों पर हाल ही में हुए हमलों और इस क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य कर्मियों को निशाना बनाकर किए गए ड्रोन व मिसाइल हमलों के सीधे जवाब में की गई है। इस कार्रवाई के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेहरान को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि ईरान ने इन हमलों का जवाब देने या कोई नई सैन्य कार्रवाई करने की कोशिश की, तो उसे और अधिक विनाशकारी हमलों का सामना करना पड़ेगा।
इस जवाबी कार्रवाई के बाद संपूर्ण क्षेत्र में उच्च सुरक्षा अलर्ट जारी कर दिया गया है। होर्मुज के आसपास के समुद्री मार्गों में नौवहन सुरक्षा पर गंभीर संकट पैदा हो गया है, क्योंकि इस जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच शुरू हुआ यह नया हमला और जवाबी हमला वैश्विक ऊर्जा बाजारों को एक बार फिर भारी अनिश्चितता के दौर में धकेल सकता है।
क्षेत्रीय झड़पें और मिसाइल हमले
अमेरिकी हमलों के तुरंत बाद पूरे क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन गतिविधियां तेज़ हो गईं। दक्षिणी जॉर्डन के अक़बा शहर के आसमान में मंगलवार को कई भीषण विस्फोट देखे गए और पूरे क्षेत्र में सायरन की आवाजें गूंज उठीं। अर्द्ध-सरकारी समाचार एजेंसी तसनीम की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने जॉर्डन में स्थित एक अमेरिकी सैन्य अड्डे को निशाना बनाते हुए कई मिसाइलें दागीं। इस बीच, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि इस ताज़ा सैन्य संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसके रणनीतिक नियंत्रण को और अधिक मजबूत कर दिया है।
इस सैन्य संघर्ष का असर पड़ोसी अरब देशों तक भी फैल गया है। संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि उसकी वायु रक्षा प्रणालियों ने अपने क्षेत्रीय जलक्षेत्र के ऊपर एक ईरानी मानव रहित हवाई वाहन यानी ड्रोन को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। इसके अलावा, कुवैती सेना ने भी ईरानी हमले के बाद अपने हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने वाले कई संदिग्ध और शत्रुतापूर्ण ड्रोनों को रोकने के लिए अपनी वायु रक्षा प्रणालियों को सक्रिय किया। क्षेत्र के प्रमुख देशों द्वारा अपनी सीमाओं पर बढ़ाए गए इस रक्षात्मक कदम से स्पष्ट है कि यह संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित न रहकर पूरे खाड़ी क्षेत्र को अपनी चपेट में ले रहा है।
कच्चे तेल का गणित और WTI की भूमिका
मध्य पूर्व में भड़के इस सैन्य संकट का सबसे सीधा और व्यापक असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कारोबार करने वाले कच्चे तेल में वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट यानी WTI एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैश्विक मानक माना जाता है। WTI के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और दुबई क्रूड अन्य दो प्रमुख मानक हैं। WTI को तेल उद्योग में मुख्य रूप से 'लाइट' यानी हल्का और 'स्वीट' यानी मीठा तेल कहा जाता है। इसके कम घनत्व और सल्फर की बेहद कम मात्रा के कारण इसे रिफाइनरियों में आसानी से गैसोलीन और डीजल जैसे उच्च गुणवत्ता वाले पेट्रोलियम उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है।
WTI का मुख्य उत्पादन संयुक्त राज्य अमेरिका के विभिन्न तेल क्षेत्रों में होता है और इसका मुख्य वितरण केंद्र ओकलाहोमा स्थित कशिंग हब है। कशिंग हब को विश्व में पाइपेलाइनों का चौराहा यानी 'द पाइपलाइन क्रॉसरोड्स ऑफ द वर्ल्ड' कहा जाता है। वैश्विक मीडिया और वित्तीय विश्लेषक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव का आकलन करने के लिए रोजाना WTI क्रूड के भाव को ही प्रमुख आधार मानते हैं। यही कारण है कि खाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य उथल-पुथल का सीधा प्रभाव WTI के दामों पर पड़ता है।
बाजार के मुख्य कारक और आपूर्ति-मांग गतिकी
किसी भी अन्य वित्तीय परिसंपत्ति की तरह, WTI क्रूड ऑयल की कीमतें मुख्य रूप से वैश्विक बाजार में आपूर्ति और मांग के संतुलन से निर्धारित होती हैं। जब दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक वृद्धि तेज़ होती है, तो औद्योगिक गतिविधियों और परिवहन के लिए ईंधन की मांग बढ़ती है, जिससे तेल की कीमतें ऊपर जाती हैं। इसके विपरीत, वैश्विक मंदी या धीमी आर्थिक वृद्धि के समय मांग घटने से कीमतों में गिरावट आती है। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में राजनीतिक अस्थिरता, सैन्य युद्ध और व्यापारिक प्रतिबंध आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करने वाले सबसे बड़े कारक बनकर उभरे हैं।
इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर का मूल्य भी WTI क्रूड की कीमतों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का अधिकांश कारोबार अमेरिकी डॉलर में ही किया जाता है, इसलिए जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, तो गैर-डॉलर वाली मुद्राओं का इस्तेमाल करने वाले देशों के लिए तेल खरीदना महंगा हो जाता है। इसके विपरीत, डॉलर कमजोर होने पर अन्य देशों के लिए तेल अधिक किफायती हो जाता है, जिससे वैश्विक स्तर पर इसकी मांग में बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
ओपेक नीतियां और इन्वेंट्री रिपोर्ट का प्रभाव
कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति को नियंत्रित करने में पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन यानी ओपेक (OPEC) की भूमिका बेहद निर्णायक होती है। ओपेक 12 प्रमुख तेल उत्पादक देशों का एक समूह है, जो साल में दो बार औपचारिक बैठकें आयोजित कर अपने सदस्य देशों के लिए उत्पादन कोटा तय करता है। जब ओपेक बाजार में आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिए उत्पादन कटौती का निर्णय लेता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता कम हो जाती है और कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके विपरीत, उत्पादन बढ़ाने के फैसले से कीमतें नीचे आती हैं। ओपेक के अलावा 'ओपेक प्लस' (OPEC+) नाम से एक विस्तृत समूह भी सक्रिय है, जिसमें 10 गैर-ओपेक उत्पादक देश शामिल हैं, जिनमें रूस सबसे प्रमुख भागीदार है।
तेल बाजार के अल्पकालिक रुझानों को समझने के लिए अमेरिका द्वारा हर हफ्ते जारी की जाने वाली व्यावसायिक तेल भंडार यानी इन्वेंट्री रिपोर्टों पर निवेशकों की पैनी नजर रहती है। अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट यानी API प्रत्येक मंगलवार को अपनी साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्ट प्रकाशित करता है, जबकि अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी EIA बुधवार को अपनी आधिकारिक सरकारी रिपोर्ट जारी करता है। यदि इन आंकड़ों में कच्चे तेल के भंडार में कमी दिखाई देती है, तो यह मजबूत मांग का संकेत होता है और कीमतें बढ़ती हैं। भंडार में बढ़ोतरी आपूर्ति आधिक्य का संकेत देती है। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, API और EIA के निष्कर्ष 75 प्रतिशत मामलों में एक-दूसरे के 1 प्रतिशत के दायरे में रहते हैं, लेकिन EIA की रिपोर्ट एक सरकारी एजेंसी द्वारा जारी होने के कारण अधिक विश्वसनीय मानी जाती है।
वैश्विक वित्तीय बाजारों पर असर और मुद्रा हलचल
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े इस सैन्य तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार यानी फॉरेक्स मार्केट में भारी हलचल देखने को मिल रही है। निवेशक जोखिम भरी परिसंपत्तियों से निकलकर सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की ओर रुख कर रहे हैं। इस कारण मंगलवार को ब्रिटिश पाउंड यानी GBP/USD में भारी गिरावट दर्ज की गई और यह गिरकर 1.3500 के निचले स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले दो हफ्तों का सबसे निचला स्तर है।
इसी तरह, यूरोपीय साझा मुद्रा यूरो भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई है। EUR/USD की विनिमय दर में गिरावट तेज़ हो गई है और यह 1.1600 के प्रमुख मनोवैज्ञानिक समर्थन स्तर से नीचे चला गया है। वहीं दूसरी ओर, सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में भी सुधार देखा गया है। भू-राजनीतिक संकट के बावजूद, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर बढ़ती प्रतिफल दरों के दबाव में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना प्रति ट्रॉय औंस 4,300 डॉलर के स्तर की ओर नीचे खिसकता नजर आया।
बॉन्ड बाज़ार में बिकवाली और डीजल क्रैक स्प्रेड में रिकॉर्ड
नये महीने की शुरुआत के साथ ही वैश्विक सरकारी बॉन्ड बाजारों में व्यापक बिकवाली का माहौल देखा गया। इस बिकवाली का सबसे ज्यादा असर यूनाइटेड किंगडम के बॉन्ड बाजार पर पड़ा। मंगलवार को कारोबार के दौरान यूके के 2-वर्षीय और 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में एक समय 10 बेसिस पॉइंट्स तक का उछाल दर्ज किया गया। बाद में ये क्रमशः 7 बेसिस पॉइंट्स और 8 बेसिस पॉइंट्स की बढ़त पर कारोबार करते नजर आए।
हालांकि कच्चे तेल का मुख्य बाजार शुरुआती झटकों के बाद तुलनात्मक रूप से स्थिर दिखता है, लेकिन रिफाइंड ईंधन बाजार, विशेष रूप से डीजल, से बेहद चिंताजनक संकेत मिल रहे हैं। अमेरिकी डीजल क्रैक स्प्रेड यानी WTI कच्चे तेल के मुकाबले अल्ट्रा-लो सल्फर डीजल फ्यूचर्स के प्रीमियम ने इतिहास में पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर लिया है। कारोबार के दौरान यह 102.00 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्च स्तर तक पहुंच गया। डीजल क्रैक स्प्रेड में यह रिकॉर्ड उछाल इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक स्तर पर रिफाइंड डीजल ईंधन की उपलब्धता बेहद तंग हो गई है, जिससे आने वाले दिनों में माल ढुलाई और परिवहन लागत में भारी वृद्धि हो सकती है।


















