चेक अनादर से जुड़े सात अलग-अलग मुकदमों का सामना कर रहे अभिनेता राजपाल यादव की कानूनी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। देश की शीर्ष अदालत में गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान उस वक्त असहज स्थिति बन गई, जब न्यायिक आदेश के अनुपालन में तैयार कराया गया 1.15 करोड़ रुपये का डिमांड ड्राफ्ट अदालत की रजिस्ट्री में विधिवत दाखिल नहीं किया जा सका। इस प्रक्रियात्मक चूक पर पीठ ने गहरा असंतोष व्यक्त किया और स्पष्ट किया कि समय सीमा समाप्त होने के बाद दी जाने वाली ऐसी दलीलें न्यायिक पटल पर पक्षकार के भरोसे को गहरी ठेस पहुँचाती हैं।
रजिस्ट्री में ड्राफ्ट जमा न होने पर जजों की सख्त टिप्पणी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की संयुक्त पीठ के समक्ष जब यह मामला प्रस्तुत हुआ, तब प्रक्रियागत लापरवाही को लेकर पीठ का रुख बेहद सख्त नजर आया। पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कानूनी प्रक्रिया के संचालन पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहा कि यदि किसी अधिवक्ता को यह सामान्य जानकारी भी नहीं है कि धनराशि किस विशिष्ट अनुभाग में जमा की जानी है, तो यह एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की कार्यप्रणाली के लिहाज से अत्यंत चिंताजनक स्थिति है। इसके पश्चात चीफ जस्टिस ने कानूनी प्रतिनिधि को तत्काल प्रभाव से निर्धारित स्थान पर राशि जमा कराने का आदेश दिया।
विश्वसनीयता और समय सीमा के उल्लंघन पर अदालत का रुख
अदालती कार्यवाही के दौरान जस्टिस वी. मोहना ने समय सीमा के पालन को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने स्मरण कराया कि संबंधित पक्ष को निर्धारित राशि प्रस्तुत करने के लिए पिछली शाम 7 बजे तक की मोहलत प्रदान की गई थी। इसके बावजूद समय सीमा बीत जाने के बाद इस प्रकार के बहाने बनाना उचित नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने स्पष्ट चेतावनी दी कि इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना आचरण अदालत के समक्ष पक्षकार की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
दो करोड़ रुपये के भुगतान की व्यवस्था और पृष्ठभूमि
शीर्ष अदालत ने विवाद के समाधान हेतु राजपाल यादव को कुल 2 करोड़ रुपये जमा कराने का अवसर प्रदान किया था। इस क्रम में 7 अक्टूबर को हुई न्यायिक कार्यवाही के दौरान उनके पक्ष ने अवगत कराया था कि 1 करोड़ 15 लाख रुपये का प्रबंध कर लिया गया है, जबकि शेष 85 लाख रुपये की भरपाई उनकी पैतृक भूमि का क्रय करने वाले व्यक्ति द्वारा की जाएगी। उस दौरान संबंधित खरीदार भी न्यायालय परिसर में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित था। इस प्रस्तावित रूपरेखा को संज्ञान में लेते हुए ही अदालत ने धन जमा करने के लिए अतिरिक्त समय स्वीकृत किया था।
फिल्म 'अता पता लापता' से जुड़ा पुराना वित्तीय विवाद
यह संपूर्ण कानूनी विवाद वर्ष 2010 के दौरान निर्मित फिल्म 'अता पता लापता' के वित्तीय लेन-देन से प्रारंभ हुआ था। इस चलचित्र के निर्माण के उद्देश्य से अभिनेता तथा उनकी पत्नी के स्वामित्व वाली व्यावसायिक इकाई ने मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से लगभग 5 करोड़ रुपये का कोष प्राप्त किया था। फिल्म के निर्माण एवं रिलीज के उपरांत जब धन की वापसी को लेकर गतिरोध उत्पन्न हुआ, तो शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप था कि अदाएगी के एवज में जारी किए गए चेक बैंकों द्वारा अनादृत कर दिए गए। इन्हीं अनादृत चेकों के आधार पर बाद में सात अलग-अलग न्यायिक प्रकरण दर्ज किए गए थे।


















