बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गांव से निकलकर सिनेमा जगत में बड़ा मुकाम हासिल करने वाले अभिनेता पंकज त्रिपाठी का शुरुआती जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा है। उनका जन्म 5 सितंबर 1976 को हुआ था और उनके पिता एक किसान के साथ-साथ पुजारी भी थे। एक साधारण परिवेश में पले-बढ़े होने के बावजूद उनके भीतर कला के प्रति गहरी रुचि बचपन से ही जाग उठी थी। गांव के पारंपरिक उत्सवों और मेलों के दौरान होने वाले नाटकों में वे अक्सर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। पटना शहर में स्कूल के दिनों के दौरान जब उन्होंने एक लाइव नाटक देखा, तो उस मंचन ने उनके दिलोदिमाग पर गहरा प्रभाव छोड़ा। वहां एक कलाकार की दमदार प्रस्तुति देखकर उनकी आंखें भर आईं, जिसके बाद उनका झुकाव पूरी तरह से अभिनय की ओर हो गया और वे लगातार नाटक देखने पटना जाने लगे।
कड़ा संघर्ष और होटल की रसोई में नाइट शिफ्ट
अपने सपने को जिंदा रखने के लिए उन्होंने साल 1996 से खुद भी सक्रिय रूप से थिएटर करना शुरू कर दिया था। हालांकि केवल अभिनय के जरिए आजीविका चलाना उस वक्त मुसंभव नहीं था, इसलिए उन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए नौकरी का सहारा लेना पड़ा। उनके जीवन का वह कठिन दौर भी आया जब वे रात के वक्त एक होटल की रसोई में काम करते थे और दिन के समय अभिनय का रियाज और थिएटर करते थे। इस तरह की दिनचर्या उन्होंने लगभग दो साल तक लगातार निभाई। रातभर होटल की थकान भरी ड्यूटी करने के बाद कुछ घंटे आराम करना और फिर सीधे थिएटर के अभ्यास के लिए पहुंच जाना उनकी रोज की आदत बन गई थी। शाम तक नाटकों की रिहर्सल पूरी करने के बाद वे दोबारा अपनी नाइट शिफ्ट पर लौट जाते थे, जिससे उनका जीवन अत्यधिक व्यस्त और श्रमसाध्य हो गया था।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में चयन और मुंबई का सफर
आर्थिक तंगी के कारण उनके पास किसी महंगे और प्रतिष्ठित एक्टिंग स्कूल की भारी-भरकम फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उनका मुख्य लक्ष्य प्रतिष्ठित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रवेश पाना था। कई बार असफलता मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार साल 2001 में उनका चयन इस संस्थान के लिए हो गया। वहां से अपनी पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद वे अपनी किस्मत आजमाने 16 अक्टूबर 2004 को मुंबई पहुंचे। उस वक्त उनकी जेब में महज 46 हजार रुपए की शुरुआती पूंजी थी, लेकिन महानगर के महंगे खर्चों के चलते कुछ ही समय के भीतर उनके पास केवल 10 रुपए ही शेष रह गए थे। ऐसे संकट के दिनों में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स की तलाश जारी रखी।
सिनेमा जगत में पहचान और सफलता का मुकाम
मुंबई आने के शुरुआती दिनों में उन्हें फिल्मों में बहुत ही छोटे और मामूली किरदार मिले, जिन्हें उन्होंने पूरी शिद्दत से निभाया। ‘रन’, ‘अपहरण’, ‘ओमकारा’, ‘शौर्य’, ‘रावण’ और ‘अग्निपथ’ जैसी फिल्मों में उनके छोटे अभिनय ने धीरे-धीरे लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया। फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने टेलीविजन की दुनिया का भी रुख किया और कई लोकप्रिय धारावाहिकों का हिस्सा बने। साल 2012 में आई फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जिसने उन्हें रातोंरात एक अलग पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने ‘फुकरे’, ‘मसान’, ‘निल बट्टे सन्नाटा’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘स्त्री’ और ‘लूडो’ जैसी फिल्मों में एक से बढ़कर एक यादगार भूमिकाएं निभाईं। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुई वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ और ‘क्रिमिनल जस्टिस’ ने उनकी लोकप्रियता को देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया। आज वे अपनी बहुमुखी प्रतिभा के दम पर दो बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं और हर तरह के किरदार में जान फूंकने के लिए जाने जाते हैं।


















