थिएटर से लेकर होटल की नाइट शिफ्ट तक, संघर्ष के बूते बॉलीवुड के शिखर पर पहुंचे पंकज त्रिपाठीमेक्सिकन पेसो में जोरदार तेजी, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले दो साल के सबसे निचले स्तर पर फिसला USD/MXNटीसीएल आरएम9एल रिव्यू (2026): एक बेहतरीन फ्लैगशिप टीवी जो कीमत और परफॉर्मेंस में क्या कमाल दिखाता हैब्याज दरें स्थिर रखते हुए भी महंगाई को लेकर सतर्क हुआ मलेशिया का केंद्रीय बैंक, कॉमर्जबैंक का आकलनअमेरिकी रोजगार आंकड़ों के बाद यूएसडी/एसएचएफ में उतार-चढ़ाव, 0.8100 के करीब बना बाजारसेवा क्षेत्र में उम्मीद से बेहतर तेजी के बावजूद चीन का केंद्रीय बैंक फिलहाल राहत के मूड में नहींओसीबीसी के अनुसार विदेशी मुद्रा प्रवाह घटने से भारतीय रुपये की चाल हो सकती है धीमी, USD/INR 94.50 के आसपास स्थिरबालों के झड़ने से हैं परेशान? डाइट में कद्दू के बीज शामिल करने के फायदे और सही तरीकारायगढ़ के कोतरा रोड थाने में रातभर हंगामा, विधायक उमेश पटेल और ग्रामीण धरने पर बैठेकमोडिटी फ्यूचर्स ट्रेडिंग कमीशन रिपोर्ट: ऑयल में तेजी और बाकी पोजिशनिंग में कमजोरी
थिएटर से लेकर होटल की नाइट शिफ्ट तक, संघर्ष के बूते बॉलीवुड के शिखर पर पहुंचे पंकज त्रिपाठीमनोरंजन
5 सित॰ 2026, 4:33 am (15 मिनट पहले)· 2

थिएटर से लेकर होटल की नाइट शिफ्ट तक, संघर्ष के बूते बॉलीवुड के शिखर पर पहुंचे पंकज त्रिपाठी

बिहार के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाले पंकज त्रिपाठी ने बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के मायानगरी मुंबई में अपनी खास जगह बनाई है। उनकी अभिनय यात्रा में खेती, नुक्कड़ नाटक, होटल की नाइट शिफ्ट और सालों का कड़ा संघर्ष शामिल रहा है।

बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गांव से निकलकर सिनेमा जगत में बड़ा मुकाम हासिल करने वाले अभिनेता पंकज त्रिपाठी का शुरुआती जीवन काफी संघर्षों से भरा रहा है। उनका जन्म 5 सितंबर 1976 को हुआ था और उनके पिता एक किसान के साथ-साथ पुजारी भी थे। एक साधारण परिवेश में पले-बढ़े होने के बावजूद उनके भीतर कला के प्रति गहरी रुचि बचपन से ही जाग उठी थी। गांव के पारंपरिक उत्सवों और मेलों के दौरान होने वाले नाटकों में वे अक्सर बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। पटना शहर में स्कूल के दिनों के दौरान जब उन्होंने एक लाइव नाटक देखा, तो उस मंचन ने उनके दिलोदिमाग पर गहरा प्रभाव छोड़ा। वहां एक कलाकार की दमदार प्रस्तुति देखकर उनकी आंखें भर आईं, जिसके बाद उनका झुकाव पूरी तरह से अभिनय की ओर हो गया और वे लगातार नाटक देखने पटना जाने लगे।

कड़ा संघर्ष और होटल की रसोई में नाइट शिफ्ट

अपने सपने को जिंदा रखने के लिए उन्होंने साल 1996 से खुद भी सक्रिय रूप से थिएटर करना शुरू कर दिया था। हालांकि केवल अभिनय के जरिए आजीविका चलाना उस वक्त मुसंभव नहीं था, इसलिए उन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए नौकरी का सहारा लेना पड़ा। उनके जीवन का वह कठिन दौर भी आया जब वे रात के वक्त एक होटल की रसोई में काम करते थे और दिन के समय अभिनय का रियाज और थिएटर करते थे। इस तरह की दिनचर्या उन्होंने लगभग दो साल तक लगातार निभाई। रातभर होटल की थकान भरी ड्यूटी करने के बाद कुछ घंटे आराम करना और फिर सीधे थिएटर के अभ्यास के लिए पहुंच जाना उनकी रोज की आदत बन गई थी। शाम तक नाटकों की रिहर्सल पूरी करने के बाद वे दोबारा अपनी नाइट शिफ्ट पर लौट जाते थे, जिससे उनका जीवन अत्यधिक व्यस्त और श्रमसाध्य हो गया था।

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नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में चयन और मुंबई का सफर

आर्थिक तंगी के कारण उनके पास किसी महंगे और प्रतिष्ठित एक्टिंग स्कूल की भारी-भरकम फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए उनका मुख्य लक्ष्य प्रतिष्ठित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रवेश पाना था। कई बार असफलता मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार साल 2001 में उनका चयन इस संस्थान के लिए हो गया। वहां से अपनी पढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी करने के बाद वे अपनी किस्मत आजमाने 16 अक्टूबर 2004 को मुंबई पहुंचे। उस वक्त उनकी जेब में महज 46 हजार रुपए की शुरुआती पूंजी थी, लेकिन महानगर के महंगे खर्चों के चलते कुछ ही समय के भीतर उनके पास केवल 10 रुपए ही शेष रह गए थे। ऐसे संकट के दिनों में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स की तलाश जारी रखी।

सिनेमा जगत में पहचान और सफलता का मुकाम

मुंबई आने के शुरुआती दिनों में उन्हें फिल्मों में बहुत ही छोटे और मामूली किरदार मिले, जिन्हें उन्होंने पूरी शिद्दत से निभाया। ‘रन’, ‘अपहरण’, ‘ओमकारा’, ‘शौर्य’, ‘रावण’ और ‘अग्निपथ’ जैसी फिल्मों में उनके छोटे अभिनय ने धीरे-धीरे लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया। फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने टेलीविजन की दुनिया का भी रुख किया और कई लोकप्रिय धारावाहिकों का हिस्सा बने। साल 2012 में आई फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जिसने उन्हें रातोंरात एक अलग पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने ‘फुकरे’, ‘मसान’, ‘निल बट्टे सन्नाटा’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘स्त्री’ और ‘लूडो’ जैसी फिल्मों में एक से बढ़कर एक यादगार भूमिकाएं निभाईं। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुई वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ और ‘क्रिमिनल जस्टिस’ ने उनकी लोकप्रियता को देश के कोने-कोने तक पहुंचा दिया। आज वे अपनी बहुमुखी प्रतिभा के दम पर दो बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड अपने नाम कर चुके हैं और हर तरह के किरदार में जान फूंकने के लिए जाने जाते हैं।

सवाल-जवाब

पंकज त्रिपाठी का जन्म कब और कहां हुआ था?
पंकज त्रिपाठी का जन्म 5 सितंबर 1976 को बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गांव में हुआ था।
पंकज त्रिपाठी ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में कब प्रवेश लिया था?
उन्होंने कई बार परीक्षा देने के बाद आखिरकार साल 2001 में एनएसडी में प्रवेश पाया था।
पंकज त्रिपाठी किस तारीख को मुंबई पहुंचे थे और उनके पास कितने पैसे थे?
वे 16 अक्टूबर 2004 को मुंबई पहुंचे थे और उस वक्त उनके पास लगभग 46 हजार रुपए थे।
पंकज त्रिपाठी को किस फिल्म से बड़ी पहचान मिली थी?
साल 2012 में रिलीज हुई फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ ने उन्हें बॉलीवुड में बड़ी पहचान दिलाई थी।
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