महाराष्ट्र की पारंपरिक लोककला और क्षेत्रीय सिनेमा को समृद्ध करने वाली वरिष्ठ अदाकार मधु कांबीकर अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 73 वर्ष की उम्र में उन्होंने पुणे के एक अस्पताल में आखिरी सांसें लीं। वह बीते काफी वक्त से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर दिक्कतों का सामना कर रही थीं। अपने कई दशकों के कलात्मक सफर में उन्होंने न केवल फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया, बल्कि पारंपरिक लोकनृत्य लावणी को भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई। उनके देहांत से कला प्रेमियों और समूचे मराठी मनोरंजन संसार में गहरा शोक व्याप्त है।
थिएटर से लेकर बड़े पर्दे तक बनाई मजबूत पहचान
अभिनय जगत में कदम रखने के बाद मधु कांबीकर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने रुपहले पर्दे के साथ-साथ रंगमंच पर भी अपनी सशक्त मौजूदगी दर्ज कराई। नाटकों में उनके जीवंत किरदारों और मंच पर उनके नृत्य कौशल ने दर्शकों को लगातार मंत्रमुग्ध किया। लोककला को जन-जन तक पहुंचाने और उसमें नए प्राण फूंकने के असाधारण योगदान को सम्मान देते हुए साल 2018 में उन्हें प्रतिष्ठित जी चित्र गौरव लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया गया था। यह सम्मान उनके पूरे जीवन की कला साधना का औपचारिक उत्सव था।
स्वास्थ्य संकट और मंच पर ऐतिहासिक वापसी
साल 2016 में उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ आया, जब मुंबई में आयोजित एक लावणी प्रस्तुति समाप्त होने के तत्काल बाद उन्हें पहला स्ट्रोक पड़ा था। अचानक बिगड़ी इस शारीरिक स्थिति के कारण उन्हें एक बेहद लंबे अरसे तक प्रदर्शन कलाओं से पूरी तरह अलग-थलग होना पड़ा। इस अस्वस्थता के चलते वह लगभग 12 वर्षों तक लावणी नृत्य से दूर रहीं। हालांकि, अपने मजबूत हौसले की बदौलत उन्होंने माटुंगा के यशवंत नाट्य मंदिर में सजे एक विशेष समारोह के जरिए मंच पर कदम रखकर शानदार वापसी की थी।
यादगार किरदारों से दर्शकों के दिलों में बनाई जगह
अपने करियर में उन्होंने कई ऐसी फिल्में कीं जो आज भी मराठी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती हैं। उन्होंने हास्य, ड्रामा और संजीदा हर विधा के किरदारों को बेहद सहजता से निभाया। उनके उल्लेखनीय अभिनय से सजी कृतियों में एक होता विदूषक, शापित, झपाटलेला, येऊ का घरात और मला घेऊन चला जैसी प्रसिद्ध फिल्में शामिल हैं। इन फिल्मों में निभाए गए उनके किरदार दर्शकों की स्मृतियों में हमेशा अमर रहेंगे।



















