हजारों वर्ष पुरानी भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध विरासत का मूल सामवेद और प्राचीन वेदों में रचा-बसा है। विश्व की इस सबसे प्राचीन संगीत विधा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में कई अमर फनकारों ने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी। इन्हीं महान विभूतियों में एक चमकता नाम उस्ताद फैयाज खां का है, जिन्होंने बीसवीं सदी के दौरान हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख विधाओं, ख्याल और ध्रुपद, को अपनी विशिष्ट शैली से सजाकर जन-जन तक पहुंचाया।
सिकंदरा में जन्म और नाना की सरपरस्ती में संगीत साधना
फैयाज खां का जन्म 8 फरवरी 1886 को उत्तर प्रदेश में आगरा के निकट स्थित सिकंदरा में एक प्रतिष्ठित संगीतकार घराने में हुआ था। उनके जन्म से कुछ महीने पहले ही उनके पिता सफदर हुसैन खां का देहांत हो गया था। पिता के साये से महरूम होने के बाद बालक फैयाज की परवरिश और संगीत की प्रारंभिक शिक्षा उनके नाना की देखरेख में शुरू हुई। जीवन के 25 वर्षों तक उनके नाना ही उनके मुख्य संरक्षक और संगीत गुरु की भूमिका निभाते रहे, जिन्होंने उनके भीतर शास्त्रीय सुरों की गहरी समझ विकसित की।
पहलवान का रौब और रूह को छू लेने वाली गायकी
मंच पर जब फैयाज खां कदम रखते थे, तो उनका व्यक्तित्व एक पारंपरिक गायक से काफी अलग नजर आता था। लंबे-चौड़े और मजबूत कद-काठी के कारण वे पहली नजर में किसी अखाड़े के पहलवान की तरह प्रतीत होते थे। बड़ी-बड़ी मूंछें, पारंपरिक शेरवानी और सिर पर साफा उनके शाही अंदाज को और प्रभावशाली बना देता था। मगर इस कड़क शारीरिक बनावट के एकदम विपरीत, जब वे गाना शुरू करते थे तो उनकी आवाज बेहद गहरी, गूंजती हुई, सुरीली और सम्मोहक साबित होती थी, जो श्रोताओं को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर देती थी।
'प्रेम प्रिया' की छाप, निजी त्याग और राज दरबारों के सम्मान
फैयाज खां का निजी जीवन गहराइयों और व्यक्तिगत वियोग से भरा रहा। विवाह के थोड़े ही दिनों बाद उनकी धर्मपत्नी का देहांत हो गया, जिसके बाद उन्होंने कभी दूसरा निकाह नहीं किया और पूरी जिंदगी निसंतान रहते हुए संगीत को ही समर्पित कर दी। अपनी बंदिशों और संगीत रचनाओं में वे उपनाम के तौर पर 'प्रेम प्रिया' का उपयोग किया करते थे।
वे एक लंबे अरसे तक बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय की रियासत में राजगायक के गरिमामयी पद पर आसीन रहे। बड़ौदा राजदरबार की ओर से उन्हें 'ज्ञान रत्न' के मानद खिताब से नवाजा गया। इसके साथ ही, उनकी असाधारण संगीत प्रतिभा का लोहा मानते हुए मैसूर के महाराजा ने उन्हें 'आफताब-ए-मौसिकी' की ऐतिहासिक उपाधि प्रदान की। 5 नवंबर 1950 को बड़ौदा में इस महान गायक ने अपनी अंतिम सांस ली। एक बेजोड़ फनकार होने के साथ-साथ वे एक समर्पित गुरु भी थे, जिनकी छोड़ी गई संगीत की विरासत आज भी नई पीढ़ी के संगीत साधकों का मार्गदर्शन कर रही है।



















