गुरुग्राम से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पटौदी पैलेस भारतीय इतिहास और भव्य नवाबी विरासत का एक नायाब नमूना है। करीब 10 एकड़ के विशाल भूभाग में फैली इस ऐतिहासिक इमारत का निर्माण वर्ष 1935 में कराया गया था। पटौदी रियासत के आखिरी नवाब इफ्तिखार अली खान ने अपनी बेगम के लिए इस खूबसूरत महल की नींव रखी थी। कई दशकों तक शाही शान का प्रतीक रही यह संपत्ति वर्ष 2005 में एक व्यावसायिक समझौते के तहत नीमराना होटल्स ग्रुप को लीज पर दे दी गई थी। अपने वालिद नवाब मंसूर अली खान पटौदी के इंतकाल के बाद सैफ अली खान ने अपनी पुश्तैनी जायदाद को 800 करोड़ रुपये की बड़ी रकम अदा करके वापस अपने अधिकार में लिया।
150 कमरों की भव्यता और शाही बनावट
इस आलीशान हवेली के भीतर लगभग 150 कमरे मौजूद हैं, जो इसके राजसी मिजाज को बयां करते हैं। इन कमरों में 7 विशेष बेडरूम, 7 ड्रेसिंग रूम और 7 बिलियर्ड रूम तैयार किए गए हैं। इसके साथ ही बेहद खुले और विशाल डाइनिंग रूम तथा ड्रॉइंग रूम महल के प्रमुख आकर्षण हैं। प्रसिद्ध वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल ने इस ऐतिहासिक महल के डिजाइन और रूपरेखा को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने भवन की बनावट में ज्यामितीय पैटर्नों का खूबसूरत इस्तेमाल किया, जो यूरोपीय नियोक्लासिकल शैली की झलक प्रस्तुत करते हैं। महल की दीवारों पर की गई फूलों की नक्काशी भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को उजागर करती है, जबकि खानदान की दुर्लभ पुरानी तस्वीरें इसके इंटीरियर को एक व्यक्तिगत और पारिवारिक पहचान देती हैं।
संगमरमर के गलियारे और कलात्मक इंटीरियर
महल के चौड़े और लंबे गलियारों में काले तथा सफेद संगमरमर की चेकर्ड फर्श बिछाई गई है, जो कदम रखते ही विंटेज अहसास कराती है। दीवारों के रंग संयोजन के लिए पीले, सफेद, क्रीम और हल्के पेस्टल शेड्स का चयन किया गया है, जिससे कमरों में शांत माहौल बना रहता है। पैलेस के भीतर एक समृद्ध विंटेज लाइब्रेरी भी मौजूद है, जिसमें दुर्लभ किताबों का संकलन सहेजा गया है। भोजन कक्ष में लगे खूबसूरत क्रिस्टल झूमर, सजावटी लैंप, कलात्मक फूलदान और धीमी गर्म रोशनी पूरे माहौल को सम्मोहक बनाती है। हर कोने में करीने से रखे गए इनडोर पौधे इस जगह को जीवंतता प्रदान करते हैं।
सांची स्तूप से प्रेरित गुंबद और प्राचीन कारीगरी
शयनकक्षों में उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी की फ्लोरिंग की गई है, जिसके साथ क्लासिक एंटीक वस्तुएं और हाथों से तराशा गया लकड़ी का फर्नीचर सजाया गया है। महल की सबसे खास वास्तुकला विशेषताओं में खंभों पर टिका एक भव्य गुंबद शामिल है, जिसकी प्रेरणा सांची स्तूप से ली गई है। इसके अलावा ऊंची छतों वाले लंबे बरामदे, पारंपरिक काठ का काम और दुर्लभ गुलाबी वेनेशियन झूमर इसकी शिल्पकला को बेमिसाल बनाते हैं।
सैफ अली खान का तीन दशकों का फिल्मी सफर
नवाबी शान के साथ ही सैफ अली खान का सिनेमाई सफर भी बेहद रोचक रहा है। वर्ष 1993 में फिल्म परंपरा से उन्होंने अभिनय की दुनिया में पहला कदम रखा था। इसके बाद आई फिल्म आशिक आवारा से उन्हें दर्शकों के बीच पहचान हासिल हुई। शुरुआती दौर में नब्बे के दशक के दौरान उन्हें लगातार बड़ी सफलताएं नहीं मिल सकी थीं, हालांकि अक्षय कुमार के साथ उनकी फिल्म मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी टिकट खिड़की पर खासी लोकप्रिय साबित हुई। हाल के दिनों में भी वह अक्षय कुमार के साथ फिल्म हैवान में पर्दे पर नजर आ चुके हैं।
पारिवारिक ड्रामा फिल्म हम साथ साथ हैं में उनके सहज अभिनय को दर्शकों और समीक्षकों ने खूब सराहा। इसके बाद आई फिल्म दिल चाहता है और कल हो न हो ने बॉलीवुड में उनकी छवि को पूरी तरह नया रूप दिया। रोमांटिक कॉमेडी फिल्म हम तुम में उनके किरदार को अपार लोकप्रियता मिली, जबकि विशाल भारद्वाज की फिल्म ओंकारा उनके पूरे करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई, जिसने एक सशक्त अभिनेता के रूप में उनकी पहचान को हमेशा के लिए स्थापित कर दिया।




















