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शाही विरासत छोड़कर धुनों की दुनिया में उतरे एसडी बर्मन, लोकसंगीत से संवारा बॉलीवुड का सुनहरा दौरमनोरंजन
31 अक्तू॰ 2026, 5:38 am (2 घंटे पहले)· 0

शाही विरासत छोड़कर धुनों की दुनिया में उतरे एसडी बर्मन, लोकसंगीत से संवारा बॉलीवुड का सुनहरा दौर

त्रिपुरा और मणिपुर के राजघरानों से ताल्लुक रखने वाले सचिन देव बर्मन ने ऐशो-आराम त्यागकर भारतीय संगीत में अपनी अमिट पहचान बनाई। 31 अक्टूबर 1975 को दुनिया को अलविदा कहने वाले इस महान संगीतकार ने गायकों की आवाज के मिजाज को समझकर कालजयी धुनें रचीं।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में सचिन देव बर्मन एक ऐसे फनकार रहे, जिनकी बनाई धुनों में मिट्टी की सोंधी महक और शास्त्रीय संगीत का गहरा अनुशासन एक साथ महसूस होता है। दुनिया भर में एसडी बर्मन के नाम से मशहूर इस संगीतकार का निधन 31 अक्टूबर 1975 को मुंबई में हुआ था। दशकों बीत जाने के बाद भी उनकी धुनों की ताजगी कम नहीं हुई है। ‘गाइड’, ‘आराधना’, ‘प्यासा’ और ‘बंदिनी’ जैसी ऐतिहासिक फिल्मों में उनका दिया संगीत आज भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। उनका पूरा सफरनामा यह साबित करता है कि सच्ची कला किसी शाही सुख-सुविधा की मोहताज नहीं होती, बल्कि वह समर्पण और लगन से तराशी जाती है।

राजसी ठाठ-बाट में जन्म और संगीत के लिए पढ़ाई छोड़ना

एसडी बर्मन का जन्म 1 अक्टूबर 1906 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के कोमिल्ला (जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है) में हुआ था। उनका पारिवारिक ताल्लुक बेहद रसूखदार राजघरानों से था। उनके पिता नबद्वीपचंद्र देव बर्मन त्रिपुरा के शाही परिवार से थे, जबकि उनकी मां निर्मला देवी मणिपुर के राजपरिवार की राजकुमारी थीं। घर में तमाम सुख-सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन उनका मन हमेशा सुरों की तलाश में ही रमता रहा।

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शुरुआती स्कूली तालीम कोमिल्ला में पूरी करने के बाद उन्होंने संगीत को ही अपना सर्वस्व मान लिया। संगीत के प्रति उनका जुनून इस कदर हावी हुआ कि उन्होंने अपनी सामान्य औपचारिक पढ़ाई बीच में ही अधूरी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा हासिल करने की राह चुनी। उन्होंने केसी डे, भीष्मदेव चट्टोपाध्याय और उस्ताद अलाउद्दीन खान जैसी महान संगीत विभूतियों के सानिध्य में रहकर शास्त्रीय संगीत और लोकधुनों की बारीकियों को गहराई से आत्मसात किया।

कोलकाता रेडियो से मुंबई के सफर तक

अपने पेशेवर सफर की शुरुआत में एसडी बर्मन ने बंगाली लोकसंगीत और शास्त्रीय रचनाओं पर ध्यान केंद्रित किया। 1930 के दशक में वह कोलकाता रेडियो से जुड़े, जहां उन्होंने एक गायक और संगीतकार के तौर पर अपनी आवाज का जादू बिखेरना शुरू किया। साल 1932 में उनका पहला ग्रामोफोन रिकॉर्ड रिलीज हुआ, जिसने उन्हें श्रोताओं के बीच एक नई पहचान दी। बंगाली फिल्मों में संगीत देने के बाद उन्होंने अपनी रचनात्मक उड़ान को बड़ा फलक देने का फैसला किया और साल 1944 में वह मुंबई पहुंच गए।

गायकों के मिजाज के अनुरूप धुनें गढ़ने का हुनर

मुंबई आने के बाद उन्हें सबसे बड़ी कामयाबी साल 1947 में रिलीज हुई फिल्म ‘दो भाई’ के मशहूर गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया’ से मिली। इस एक गीत ने उन्हें हिंदी फिल्म जगत में स्थापित कर दिया और इसके बाद उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा। आने वाले वर्षों में उन्होंने ‘बाजी’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘देवदास’, ‘प्यासा’, ‘गाइड’ और ‘आराधना’ जैसी अनगिनत फिल्मों में शानदार संगीत देकर लोकप्रियता के नए कीर्तिमान रचे।

एसडी बर्मन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह हर गायक की स्वाभाविक आवाज, रेंज और मिजाज को ध्यान में रखकर धुनें तैयार करते थे। किशोर कुमार के साथ उनकी जुगलबंदी ने भारतीय संगीत को कई यादगार नग्मे दिए। विशेष रूप से फिल्म ‘आराधना’ के गानों ने किशोर कुमार के करियर को अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। इसके साथ ही उन्होंने आशा भोसले के साथ भी कई सुपरहिट गाने तैयार किए, जबकि लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाज में रिकॉर्ड कराए गए उनके गीत आज भी संगीतप्रेमियों की पहली पसंद बने हुए हैं। 31 अक्टूबर 1975 को भले ही वह इस फानी दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनके अमर सुर हमेशा गूंजते रहेंगे।

सवाल-जवाब

एसडी बर्मन का जन्म कब और कहां हुआ था?
उनका जन्म 1 अक्टूबर 1906 को तत्कालीन पूर्वी बंगाल के कोमिल्ला (अब बांग्लादेश) में हुआ था।
एसडी बर्मन का पारिवारिक ताल्लुक किन राजघरानों से था?
उनके पिता नबद्वीपचंद्र देव बर्मन त्रिपुरा के शाही परिवार से थे, जबकि उनकी मां निर्मला देवी मणिपुर के राजपरिवार की राजकुमारी थीं।
एसडी बर्मन ने किन गुरुओं से संगीत की शिक्षा ली थी?
उन्होंने केसी डे, भीष्मदेव चट्टोपाध्याय और उस्ताद अलाउद्दीन खान से संगीत की औपचारिक बारीकियां सीखी थीं।
एसडी बर्मन का पहला ग्रामोफोन रिकॉर्ड कब आया था?
उनका पहला रिकॉर्ड साल 1932 में रिलीज हुआ था।
हिंदी सिनेमा में एसडी बर्मन को किस गाने से पहचान मिली?
साल 1947 में आई फिल्म ‘दो भाई’ के गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया’ से उन्हें बड़ी पहचान मिली।
एसडी बर्मन का निधन कब और कहां हुआ?
उनका निधन 31 अक्टूबर 1975 को मुंबई में हुआ था।
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