तीर्थनगरी ऋषिकेश अपनी आध्यात्मिक पहचान, पौराणिक महत्व और अनूठी धरोहरों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस पावन नगरी में कई ऐसे स्थान और दुर्लभ धरोहरें हैं, जिनके बारे में अधिकांश लोगों को बहुत कम जानकारी है। इन्हीं खास धरोहरों में एक ऐसा दिव्य वृक्ष भी शामिल है, जिसे सनातन परंपरा में कल्पवृक्ष कहा जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र पेड़ के समक्ष सच्चे हृदय से प्रार्थना करने पर हर मनोकामना पूरी होती है।
समुद्र मंथन से जुड़ी है इस दिव्य वृक्ष की उत्पत्ति
धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक आख्यानों में कल्पवृक्ष का विशेष वर्णन मिलता है। वन वीर अधिकारी मंजू असवाल के अनुसार, पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, तब क्षीरसागर से चौदह दुर्लभ रत्न प्रकट हुए थे। इन्हीं चौदह रत्नों में कल्पवृक्ष भी एक था। इसे देवलोक का ऐसा चमत्कारी वृक्ष माना गया है, जो साधक और भक्त की सभी सात्विक इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति रखता है। यही कारण है कि इसे इच्छा पूर्ति करने वाला और मनोकामना सिद्ध करने वाला वृक्ष भी कहा जाता है।
प्राचीन काल से ही कल्पवृक्ष को जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता रहा है। हिंदू धर्म में इस पेड़ का बहुत गहरा धार्मिक महत्व है। माना जाता है कि इस वृक्ष की छाया में बैठकर अथवा इसके समीप शांत मन से खड़े होकर जो भी याचना की जाती है, वह अवश्य फलित होती है।
ऋषिकेश में कहाँ स्थित है यह दुर्लभ कल्पवृक्ष
यदि श्रद्धालु अथवा पर्यटक इस दुर्लभ वृक्ष के दर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें ऋषिकेश के मुनि की रेती इलाके का रुख करना होगा। मुनि की रेती क्षेत्र में स्थित प्राचीन भद्रकाली मंदिर के ठीक सामने संजीवनी हर्बल गार्डन बना हुआ है। इसी हर्बल गार्डन परिसर में यह कल्पवृक्ष स्थापित है। इस प्राकृतिक उद्यान में कल्पवृक्ष के अलावा विभिन्न प्रकार के दुर्लभ औषधीय पौधे और वनस्पतियां भी संरक्षित की गई हैं।
इस पावन स्थल का जुड़ाव महान दार्शनिक और संन्यासी स्वामी विवेकानंद से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय परंपरा और मान्यताओं के अनुसार, स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रवास के दौरान इस वृक्ष के नीचे बैठकर गहन ध्यान और साधना की थी, जिससे इस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा और भी खास मानी जाती है।
सौ साल से अधिक पुरानी है इस वृक्ष की आयु
अधिकारियों के मुताबिक, संजीवनी हर्बल गार्डन में स्थित इस कल्पवृक्ष की उम्र 100 वर्ष से भी अधिक आंकी गई है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के मन में इस वृक्ष को लेकर गहरी आस्था दिखाई देती है। दर्शनार्थी अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कुछ लोग वृक्ष का आलिंगन कर सकारात्मक ऊर्जा महसूस करते हैं, तो कई लोग इसकी विधिवत परिक्रमा करते हैं।
श्रद्धा का यह आलम है कि कई आगंतुक अपनी इच्छाओं को कागज पर लिखकर वृक्ष के पास पत्र के रूप में छोड़ जाते हैं। लोगों का दृढ़ विश्वास है कि इस शताब्दी पुराने वृक्ष के नीचे खड़े होकर सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद जरूर पूरी होती है।



















