सिनेमा प्रेमियों के बीच जब भी राजस्थान के राजसी वैभव और हिंदी फिल्मों के खूबसूरत दृश्यों की चर्चा होती है, तो झीलों की नगरी का नाम स्वाभाविक रूप से सबसे ऊपर आ जाता है। विश्व बॉलीवुड दिवस के खास अवसर पर हिंदी सिनेमा की समृद्ध विरासत, यादगार संगीत और सुनहरी यादों को याद किया जाता है। ऐसे में उदयपुर और बॉलीवुड का गहरा नाता एक बार फिर ध्यान खींचता है। यह संबंध किसी एक दौर का नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से लगातार मजबूत बना हुआ है। शहर के शांत जलस्रोत, संगमरमरी महल, जीवंत घाट, पारंपरिक हवेलियां और संकरी ऐतिहासिक गलियां दशकों से देश के दिग्गज फिल्मकारों को अपनी ओर आकर्षित करती रही हैं।
क्लासिक सिनेमा में उदयपुर का ऐतिहासिक सफर
उदयपुर में रूपहले पर्दे के लिए दृश्यों को कैमरे में कैद करने की परंपरा काफी पुरानी है। जब भी शहर की सिनेमाई पहचान की बात उठती है, तो अभिनेता देव आनंद की कालजयी कृति 'गाइड' का उल्लेख सबसे पहले किया जाता है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार, इस क्लासिक फिल्म के कई महत्वपूर्ण हिस्से इसी शहर की धरती पर फिल्माए गए थे। सूरजपोल और हाथीपोल के ऐतिहासिक इलाके, फतेहसागर झील का विहंगम दृश्य तथा पुराने शहर की पारंपरिक गलियों ने इस फिल्म के दृश्यों को बेहद जीवंत बना दिया था। इसके साथ ही विख्यात सिटी पैलेस के प्रांगण में भी इस फिल्म के चुनिंदा दृश्य कैमरे में उतारे गए थे, जिसने शहर की भव्यता को वैश्विक पहचान दिलाई।
दशकों तक अनवरत जारी रहा शूटिंग का सिलसिला
शुरुआती दौर की सफलता के बाद निर्माताओं के लिए यह शहर एक पसंदीदा ठिकाना बन गया। साठ और सत्तर के दशक से लेकर नब्बे के दशक तक कई लोकप्रिय फिल्मों में यहां की विविधतापूर्ण जगहों को दर्शाया गया। 'मेरा साया', 'फूल बने अंगारे', 'कच्चे धागे' और 'मेरा गांव मेरा देश' जैसी यादगार प्रस्तुतियों में इस शहर की वादियों का भरपूर उपयोग हुआ। इसके अतिरिक्त 'जलमहल', 'यादें', 'धमाल', 'फिजा', 'खुदा गवाह', 'हम हैं राही प्यार के' तथा 'एकलव्य: द रॉयल गार्ड' जैसी फिल्मों ने भी स्थानीय लोकेशंस को पर्दे पर उतारा। यह लंबा सिलसिला इस बात को साबित करता है कि बदलते दौर और बदलती तकनीक के बावजूद निर्देशकों का इस शहर पर भरोसा कभी कम नहीं हुआ।
आधुनिक दौर के ब्लॉकबस्टर्स में दिखा शहर का आकर्षण
नई सदी के सिनेमा में भी इस ऐतिहासिक शहर का जादू बदस्तूर जारी रहा। युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय फिल्म 'ये जवानी है दीवानी' में गणगौर घाट और सिटी पैलेस के शाही नजारों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं प्रख्यात निर्देशक संजय लीला भंसाली की भव्य फिल्म 'गोलियों की रासलीला राम-लीला' के भी कई नाटकीय दृश्य उदयपुर पैलेस और गणगौर घाट के किनारे ही फिल्माए गए थे। राजस्थान पर्यटन विभाग भी दोनों फिल्मों में गणगौर घाट और सिटी पैलेस की प्रमुख उपस्थिति को पर्यटन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानता है।
कहानियों में जब पृष्ठभूमि ही बन गई मुख्य किरदार
सिनेमाई यात्रा आगे बढ़ते हुए 'प्रेम रतन धन पायो', 'धड़क', 'मिर्ज्या', 'पटाखा' और 'अंग्रेजी मीडियम' तक पहुंची। सलमान खान अभिनीत 'प्रेम रतन धन पायो' में उदयपुर के शाही महलों के साथ राजस्थान के कई वैभवशाली स्थलों को भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया। वहीं इरफान खान की भावनात्मक फिल्म 'अंग्रेजी मीडियम' की मूल कहानी ही उदयपुर की पृष्ठभूमि और उसके परिवेश के इर्द-गिर्द बुनी गई थी।
फिल्मकारों की पहली पसंद बनने के पीछे के कारण
इस शहर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि निर्देशकों को एक ही दायरे के भीतर विविध प्रकार के परिदृश्य मिल जाते हैं। पिछोला और फतेहसागर जैसी विशाल झीलें, सिटी पैलेस जैसी नक्काशीदार इमारतें, पुराने घाट और प्राचीन बाजार हर किस्म की कहानी को एक स्वाभाविक और विश्वसनीय माहौल उपलब्ध कराते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग भी महलों, ऐतिहासिक रास्तों और प्राकृतिक दृश्यों के इसी अनूठे संगम को शूटिंग के लिए सबसे बड़ा आकर्षण मानता है। पर्दे पर इन खूबसूरत जगहों को देखने के बाद यहां आने वाले पर्यटकों में भी इन लोकेशंस को खुद जाकर देखने की गहरी ललक पैदा होती है। दर्शक जब इन गलियों में कदम रखते हैं, तो वे उन जगहों को तलाशते हैं जिन्हें उन्होंने स्क्रीन पर देखा था। इस तरह यह शहर सिर्फ फिल्मों का बैकग्राउंड बनकर नहीं रहा, बल्कि कई कहानियों में खुद एक जीवंत किरदार बनकर उभरा है।



















