यूक्रेन के दक्षिणी हिस्से में युद्ध की अग्रिम मोर्चे की सीमा पर स्थित ओलेशकी शहर से सैकड़ों नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया है। रूसी सेना के कब्जे वाले इस इलाके में वर्षों से भारी गोलाबारी, ड्रोन हमलों और भोजन की भारी कमी के बीच फंसे लोगों के लिए शनिवार का दिन नई जिंदगी की शुरुआत जैसा रहा। बेलारूस के रास्ते उत्तरी यूक्रेन के चेर्निहाइव क्षेत्र में पहुंचे इन विस्थापितों ने वहां बिताए अपने बेहद दर्दनाक अनुभवों को साझा किया। लंबे समय बाद अपने परिजनों से मिलकर कई लोगों की आंखें छलक पड़ीं, जबकि कई बुजुर्ग इतने कमजोर थे कि उन्हें स्ट्रेचर पर लाना पड़ा।
लंबे संघर्ष के बाद राहत की खिड़की
फरवरी 2022 में रूस के पूर्ण पैमाने पर किए गए सैन्य आक्रमण के शुरुआती दिनों में ही ओलेशकी पर कब्जा कर लिया गया था। यह शहर भौगोलिक रूप से एक तरफ नीप्रो नदी और दूसरी तरफ रूसी सेना की अग्रिम चौकियों के बीच फंसा हुआ था। इस वजह से यहां रहने वाले नागरिकों के लिए शहर से बाहर निकलना लगभग असंभव बन गया था। हाल के दिनों में खेरसॉन क्षेत्र में अमेरिकी प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप की मध्यस्थता से एक मानवीय संघर्ष विराम लागू हुआ। इस समझौते के तहत क्षेत्र में चार वर्षों के दौरान पहली बार कुछ दिनों की शांति कायम हुई, जिससे नागरिकों को वहां से निकालने का सुरक्षित रास्ता तैयार हो सका।
शुक्रवार को निकासी अभियान के लिए स्थानीय निवासियों को केवल चार घंटे की समय सीमा दी गई थी। इस सीमित अवधि के दौरान लगभग 750 लोगों को निकालने के उद्देश्य से 25 बसों का एक बड़ा काफिला तैनात किया गया था। इसके साथ ही बीमार, बुजुर्ग और चलने-फिरने में असमर्थ नागरिकों के लिए विशेष एम्बुलेंस का भी इंतजाम किया गया था। इन सभी लोगों को रूसी नियंत्रण वाले क्षेत्रों से होते हुए दक्षिणी रूस पहुंचाया गया, जहां से हवाई मार्ग के जरिए उन्हें बेलारूस ले जाया गया और फिर शनिवार को बसों द्वारा चेर्निहाइव में बने एक सैन्य केंद्र में पहुंचाया गया।
भूख, बारूदी सुरंगें और हर दिन का खौफ
ओलेशकी में जीवन किस कदर भयावह हो चुका था, इसका अंदाजा वहां से जान बचाकर निकले परिवारों की आपबीती से लगाया जा सकता है। व्याचेस्लाव अपनी पत्नी ओल्हा और अपने दो वयस्क बच्चों के साथ वहां रह रहे थे। उनके बच्चे तीस से चालीस वर्ष की आयु के हैं। ओल्हा ने उस माहौल को सीधा आतंक करार दिया, जबकि उनके पति ने कहा कि वे साक्षात नर्क से बचकर वापस लौटे हैं। दोनों ने बताया कि चारों ओर लगातार जारी बमबारी के बावजूद वे पहले भागने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे, क्योंकि बाहर निकलने वाले सभी रास्तों पर बारूदी सुरंगें बिछी हुई थीं और आसमान से लगातार ड्रोन हमले हो रहे थे।
शहर के भीतर आवश्यक रसद और राशन पूरी तरह खत्म हो चुका था। भोजन का प्रबंध करने के लिए कुछ लोगों ने हाल ही में बारूदी सुरंगों से भरे मैदानों को पार करने की कोशिश की थी। इस दौरान कई लोग विस्फोटों में अपनी जान गंवा बैठे या गंभीर रूप से घायल होकर हमेशा के लिए अपंग हो गए। जिन लोगों में बाहर जाने का साहस नहीं था, वे जीवित रहने के लिए बगीचों में उगने वाली जंगली घास और खरपतवार उबालकर खाने को मजबूर थे। जब जीवित रहना नामुमकिन लगने लगा, तभी इस अस्थायी युद्धविराम ने उनके लिए बचने का एकमात्र रास्ता खोला।
परिजनों का भावुक मिलन और टूटे हुए आशियाने
चेर्निहाइव में बने स्वागत केंद्र के डामर वाले मैदान पर भावनात्मक दृश्य देखने को मिले। जब मिखाइलो पाली वहां पहुंचे, तो उनकी बेटियां दाशा और आन्या रोते और चीखते हुए उनकी ओर दौड़ीं। इन बेटियों को लंबे समय से डर था कि वे शायद अपने पिता को कभी दोबारा नहीं देख पाएंगी। अपने परिवार को गले लगाने के बाद मिखाइलो ने बताया कि शहर के हालात दिन-प्रतिदिन बदतर होते जा रहे थे। उनके घर के बाथरूम पर मिसाइल हमला हुआ था जिससे उसमें बड़ा छेद हो गया था। उन्होंने बताया कि ड्रोन और मिसाइल हमले रोजमर्रा की बात थे, लेकिन परिवार की चिंता कम करने के लिए उन्होंने कभी इन बातों का जिक्र फोन पर नहीं किया था।
इसी तरह तेतियाना और वोलोदिमिर नाम का एक दंपत्ति अपने साथ एक बिल्ली को सुरक्षित लेकर चेर्निहाइव पहुंचा। उनका अपना घर तीन साल पहले ही आग में जलकर खाक हो चुका था। उसके बाद से वे अपने एक पड़ोसी के खाली पड़े मकान में शरण लिए हुए थे। तेतियाना ने बताया कि उनके बच्चे शादीशुदा हैं और शहर से बाहर रहते हैं, इसलिए वहां उनका कोई रिश्तेदार नहीं बचा था और उन्हें वह जगह छोड़ने का तनिक भी अफसोस नहीं है। हालांकि सुरक्षित निकलने वाले सभी लोगों को इस बात की गहरी चिंता सता रही है कि उनके पीछे कई हजार लोग अभी भी उन्हीं खौफनाक हालात में वहीं फंसे रह गए हैं।
भविष्य संवारने की नई चुनौती
अनुमानों के अनुसार ओलेशकी और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में लगभग 6,000 लोग फंसे हुए थे, जिनमें करीब 200 बच्चे शामिल थे। अकेले मुख्य शहर के भीतर लगभग 1,700 लोग रह रहे थे। अब जब सैकड़ों लोग सुरक्षित क्षेत्र में आ चुके हैं, तो उनके सामने जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने की विकट चुनौती खड़ी है। विस्थापित लोगों के पास न तो अपने घर बचे हैं और न ही आजीविका का कोई निश्चित साधन।
मिखाइलो पाली ने भरोसा जताया कि वे अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए किसी भी तरह का काम करने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि वे गड्ढा खोदने, निराई-गुड़ाई करने, फसल लगाने, मकान बनाने या फिर इमारतें ढहाने का कठिन शारीरिक श्रम भी आसानी से कर सकते हैं। वहीं ओल्हा ने बताया कि यूक्रेन के अन्य इलाकों में उनका कोई सगा संबंधी नहीं है, इसलिए वे कुछ परिचितों के यहां अस्थायी तौर पर ठहरेंगे। उन्होंने हौसला दिखाते हुए कहा कि जो परिवार इतने वर्षों तक नर्क जैसी परिस्थितियों में जिंदा बच गया, वह आगे भी अपनी जिंदगी को दोबारा संवारने में जरूर कामयाब रहेगा।



















