सनातन परंपरा में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि का अत्यंत पावन महत्व है। इस विशेष दिन को गोवत्स द्वादशी कहा जाता है, जिसे लोक भाषा में बच्छ दुआ, बछ बारस और वसु द्वादशी के नाम से भी पुकारा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, कुछ परंपराओं और मतभेदों के तहत यह पर्व भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर भी मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर मुख्य रूप से गाय माता और उनके बछड़े की विधिवत अर्चना की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से इस दिन व्रत रखने और गौ माता के साथ बछड़े की सेवा-अर्चना करने से घर-परिवार में अपार सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही जीवन के तमाम कष्ट दूर होकर हर प्रकार के सुख की प्राप्ति होती है।
संतान प्राप्ति और पौराणिक मान्यता
धार्मिक दृष्टिकोण से यह पावन व्रत विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है जो संतान सुख की अभिलाषा रखते हैं। संतान की सलामती, दीर्घायु और खुशहाली के लिए भी माताएं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रखती हैं। इस पर्व के पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य के उपरांत माता यशोदा ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की इसी द्वादशी तिथि को पहली बार गौ माता के पावन दर्शन किए थे। इसके पश्चात उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ गौ माता और बछड़े का पूजन संपन्न किया था। इसी पावन परंपरा के चलते इस दिन गाय और बछड़े की उपासना करने से समस्त देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है, और विशेष रूप से जगत के पालनहार भगवान विष्णु की असीम अनुकंपा भक्तों पर बरसती है।
गोवत्स द्वादशी पर गाय-बछड़े की प्रामाणिक पूजा विधि
गोवत्स द्वादशी के दिन पूजा की शुरुआत प्रातःकाल से ही श्रद्धापूर्वक की जाती है। व्रत रखने वाले साधक को सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने के पश्चात पूरे विधि-विधान से व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद गौ माता और उनके नन्हें बछड़े को शुद्ध व स्वच्छ जल से नहलाना चाहिए। स्नान कराने के उपरांत दोनों के शरीर को साफ और सूखे कपड़े से पोंछना चाहिए। फिर आदरपूर्वक दोनों को नवीन वस्त्र ओढ़ाएं और उनके गले में ताजे व सुगंधित फूलों की माला पहनाएं। इसके उपरांत गौ माता और बछड़े के मस्तक पर सिंदूर अथवा चंदन का तिलक लगाएं और उनके दोनों सींगों पर गेरू लगाकर उनका पारंपरिक श्रृंगार करें।
अर्घ्य समर्पण और विशेष मंत्र
गौ माता और बछड़े के श्रृंगार के बाद अर्घ्य देने का विधान आता है। इसके लिए एक स्वच्छ पात्र में जल भरें और उसमें अक्षत, तिल, सुगंधित गंध तथा ताजे पुष्प मिला लें। इसके पश्चात विशेष मंत्र का उच्चारण करते हुए गौ माता और बछड़े के अग्रभाग अर्थात अगले चरणों पर यह पवित्र जल श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
क्षीरोदार्णव सम्भूते सुरासुर नमस्कृते।
सर्वदेवमये मातर् गृहाणार्घ्य नमो नमः॥
इस पावन मंत्र का सरल भावार्थ यह है कि हे समस्त देवताओं के स्वरूप को धारण करने वाली गौ माता, आपका प्राकट्य क्षीर सागर मंथन से हुआ है और देव तथा दानव दोनों ही आपके चरणों में शीश नवाते हैं। मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं, कृपया मेरे द्वारा श्रद्धापूर्वक अर्पित किए गए इस पावन अर्घ्य को स्वीकार करें।
भोग अर्पण, आरती और पारण के नियम
अर्घ्य अर्पित करने के बाद श्रद्धापूर्वक गौ माता और उनके बछड़े को सात्विक भोग लगाएं। इसके बाद शुद्ध देशी घी का दीपक प्रज्वलित कर दोनों की प्रेमपूर्वक आरती उतारें और हाथ जोड़कर उनके चरणों का आशीर्वाद ग्रहण करें। पूजा के समय अपने समूचे परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की कामना करें। विधि-विधान से पूजा संपन्न करने के बाद पूरे दिन का उपवास रखा जाता है। शाम के समय फलाहार ग्रहण करके व्रत का पारण करने की परंपरा है। कुछ श्रद्धालु अपनी विशेष आस्था के तहत फलाहार करते हुए इस उपवास को लगातार तीन दिनों तक भी निभाते हैं।
व्रत में बरतें यह विशेष सावधानी
गोवत्स द्वादशी के पावन दिन पर एक बहुत ही कड़ा नियम पालन किया जाता है। इस दिन किसी भी रूप में गाय के दूध से बनी खाद्य वस्तुओं, जैसे दूध, दही, पनीर, मक्खन या खोया का सेवन पूरी तरह से वर्जित माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गाय के दूध पर केवल और केवल उसके बछड़े का ही पूर्ण अधिकार होता है। इसलिए व्रत रखने वाले सभी साधकों को भूलकर भी इस दिन गाय के दूध अथवा उससे निर्मित उत्पादों का उपयोग अपने भोजन या फलाहार में नहीं करना चाहिए।



















