झारखंड राज्य का देवघर जिला देशभर में अपनी गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। यहां बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में शामिल बाबा बैद्यनाथ का पावन धाम स्थित है, जिसके दर्शन पूजन के लिए पूरे भारत से श्रद्धालु साल भर पहुंचते रहते हैं। लेकिन देवघर की यह शोहरत सिर्फ देवालयों और आध्यात्मिक वातावरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां की गलियों में बसने वाली खान-पान की परंपरा भी बेहद अनूठी है। शहर के अलग-अलग कोनों में मिलने वाले खास पराठे, बेल का मुरब्बा और तरह-तरह के पारंपरिक नमकीन व्यंजन खाने के शौकीनों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। तीर्थाटन के साथ-साथ स्थानीय देसी व्यंजनों का जायका लेना यहां आने वाले लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका है। इसी कड़ी में सत्संग नगर इलाके में मिलने वाला स्वादिष्ट चोप और पकौड़ी दशकों से लोगों के बीच विशेष चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
सत्संग नगर की पुरानी दुकान और शाम की रौनक
सत्संग नगर क्षेत्र में स्थित यह छोटी सी दुकान बाहर से बेहद साधारण नजर आती है, लेकिन इसके पकौड़ों और नमकीन का स्वाद बहुत दूर-दूर तक अपनी पहचान बना चुका है। सूरज ढलने और शाम घिरने के साथ ही यहां गरमा-गरम चटपटे स्नैक्स खाने वालों का जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है। कोई पारंपरिक आलू चोप की तलाश में यहां आता है, तो कई लोग कुरकुरी बैगनी और प्याजी का लुत्फ उठाने पहुंचते हैं। लोहे की बड़ी कढ़ाई में खौलते तेल के बीच से एक के बाद एक ताजा पकौड़े छनकर बाहर आते रहते हैं और खरीदार अपनी पसंद के अनुसार पत्तों या दोनों में इन्हें लेकर चाव से खाते हैं। ग्राहकों की लगातार कतार इस बात की गवाही देती है कि पचास से अधिक सालों बाद भी इस जायके का जादू बरकरार है।
1970 से जारी पारिवारिक परंपरा और शुद्ध सरसों तेल का उपयोग
इस प्रतिष्ठान की सबसे प्रमुख खासियत इसका पकाने का पारंपरिक माध्यम और पुरानी रेसिपी है। दुकान के वर्तमान संचालक प्रांजल कुमार बताते हैं कि इस काम की शुरुआत उनके पिता ने लगभग 1970 के आसपास की थी। उस दौर से लेकर आज तक पकौड़े तलने की प्रक्रिया और स्वाद के मूल स्वरूप में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। आज प्रांजल कुमार दूसरी पीढ़ी के रूप में इस खानदानी कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। इस तरह करीब आधी सदी यानी पांच दशकों से भी ज्यादा समय से यह दुकान देवघर के निवासियों और यात्रियों की जुबान पर अपनी अमिट छाप छोड़ रही है। यहां सभी पकौड़े विशुद्ध सरसों के तेल में तले जाते हैं, जिससे निकलने वाली सोंधी महक दूर से ही राहगीरों को अपनी तरफ खींच लेती है।
बाजार के बदले घर में कुटे मसालों का जादू
आधुनिक समय में जहां अधिकांश दुकानों पर रेडीमेड या पैकेटबंद मसालों का चलन बढ़ चुका है, वहीं प्रांजल कुमार की दुकान पर पुरानी रवायत का ही पालन किया जाता है। दुकान में परोसे जाने वाले चोप, बैगनी और प्याजी में इस्तेमाल होने वाले तमाम मसाले सीधे बाजार से तैयार किए हुए नहीं खरीदे जाते, बल्कि उन्हें परिवार की देखरेख में घर पर ही कूट-पीसकर तैयार किया जाता है। यही घरेलू मसाला मिश्रण इन पकौड़ों को एक ऐसा विशिष्ट स्वाद और तीखापन देता है जो बाजार की सामान्य दुकानों पर मिलना नामुमकिन है। इसके अलावा बैंगन की पतली परतों से बनने वाली बैगनी और कटे प्याज के लच्छों से तैयार होने वाली प्याजी का कुरकुरापन लोगों को सादे बेसन के पारंपरिक नाश्ते का असली अहसास कराता है।
दूर-दराज से खिंचे चले आते हैं कद्रदान
दुकान पर आने वाले पुराने और नए ग्राहकों का मानना है कि यहां का चोप चखते ही गुजरे जमाने के देसीपन की याद ताजा हो जाती है। घर के पिसे मसाले, सरसों तेल का तीखापन और गर्मागर्म तले जाने का मेल इसे पूरे शहर में सबसे जुदा बनाता है। आसपास अन्य कई विकल्प मौजूद होने के बावजूद इस ठिकाने पर ग्राहकों का तांता कभी कम नहीं होता। नियमित ग्राहक गगन कुमार का कहना है कि उन्हें इस दुकान के नमकीन इतने प्रिय हैं कि वे केवल इनका स्वाद लेने के लिए करीब 25 किलोमीटर की दूरी तय करके यहां पहुंचते हैं। उनके अनुसार आसपास खाने की कई दुकानें हैं, लेकिन ऐसा स्वाद अन्यत्र दुर्लभ है। वहीं सत्यम नामक एक अन्य ग्राहक ने बताया कि स्वाद के साथ-साथ यहां साफ-सफाई और शुद्धता पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है, जिससे खाने वालों का भरोसा और गहरा हो जाता है।


















