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कोडरमा के गांवों में अंगारे की भाप से बनती है लाजवाब टमाटर चटनी, जानें देसी स्मोकी तरीकाखानपान
20 सित॰ 2026, 1:39 am (40 दिन पहले)· 2

कोडरमा के गांवों में अंगारे की भाप से बनती है लाजवाब टमाटर चटनी, जानें देसी स्मोकी तरीका

झारखंड के कोडरमा के ग्रामीण अंचल में टमाटर, लहसुन और मिर्च की चटनी को लकड़ी के दहकते कोयले व सरसों तेल से खास देसी स्मोकी स्वाद दिया जाता है।

झारखंड के कोडरमा जिले के ग्रामीण इलाकों में सादे खान-पान को बेहद अनोखे देसी तौर-तरीकों से बेहद लजीज बना दिया जाता है। वहां की रसोई में तैयार होने वाले पकवान अपनी खास महक और मिट्टी से जुड़े स्वाद के लिए पहचाने जाते हैं। इसी पारंपरिक खान-पान का एक नायाब नमूना है लकड़ी के कोयले की मदद से तैयार की जाने वाली खास स्मोकी टमाटर की चटनी। गांव-देहात में बनने वाली यह चटनी अपनी सोंधी खुशबू, सरसों के कच्चे तेल के तीखेपन और कोयले के धुएं के चलते खाने की थाली का आकर्षण बन जाती है।

धीमी आंच पर टमाटर भूनने की पारंपरिक तकनीक

इस अनूठी चटनी को बनाने का तरीका काफी सरल मगर बेहद सधा हुआ है। स्थानीय गृहणी राधिका प्रजापति के अनुसार, इसकी शुरुआत ताजे और पके हुए टमाटर को पानी से अच्छी तरह धोने से होती है। साफ करने के उपरांत टमाटर को धीमी आंच पर सीधे पकाया जाता है। भूनते वक्त टमाटर को लगातार उलटते-पलटते रहना बेहद जरूरी होता है, ताकि उसकी बाहरी परत जले बिना चारों तरफ से एकसमान सिक जाए और टमाटर अंदर तक पूरी तरह गलकर नरम हो जाए।

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लहसुन और हरी मिर्च के साथ देसी मिलान

जब टमाटर भुनकर पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसे आंच से उतारकर एक बर्तन में थोड़ी देर ठंडा होने के लिए रखा जाता है। सामान्य तापमान पर आने के बाद उसकी जली हुई ऊपरी परत यानी छिलका बेहद आसानी से अलग हो जाता है। छिलका उतारने के बाद टमाटर को मैश किया जाता है और उसमें लहसुन की कलियां तथा बारीक हरी मिर्च मिलाई जाती हैं। राधिका प्रजापति ने बताया कि इन सभी चीजों को हाथ या चम्मच से एकसार मिलाया जाता है और ऊपर से स्वादानुसार साधारण नमक डाला जाता है। इस स्तर तक यह एक साधारण टमाटर का चोखा या चटनी जैसी दिखती है, लेकिन अगला कदम इसे बिल्कुल असाधारण बना देता है।

दहकते अंगारे और सरसों तेल का धुआंधार तड़का

चटनी में असली देहाती सोंधापन लाने के लिए लकड़ी के कोयले का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए लकड़ी के एक टुकड़े को आंच पर तब तक सुलगाया जाता है जब तक कि वह लाल अंगारे में तब्दील न हो जाए। पूरी तरह दहक जाने के बाद उस गर्म कोयले को बहुत सावधानी से एक चम्मच की सहायता से चटनी वाले बर्तन के ठीक बीच में रख दिया जाता है। इसके फौरन बाद उस लाल अंगारे के ऊपर थोड़ा सा शुद्ध सरसों का तेल डाला जाता है।

गर्म कोयले के संपर्क में आते ही सरसों का तेल घना धुआं छोड़ने लगता है। इस उठते हुए धुएं को चटनी के बर्तन के भीतर ही रोककर रखा जाता है, जिससे धुएं का पूरा अर्क और सरसों के तेल की भीनी महक चटनी के रेशे-रेशे में समा जाए। कुछ समय तक धुएं का असर जमने देने के बाद कोयले को बाहर निकाल दिया जाता है। इसके बाद पूरी चटनी को एक बार फिर अच्छी तरह मिला दिया जाता है, जिससे एक लाजवाब सोंधे स्वाद वाली देसी चटनी बनकर तैयार होती है।

बिना किसी तड़क-भड़क के बेमिसाल ग्रामीण जायका

राधिका प्रजापति ने स्पष्ट किया कि इस बेहतरीन चटनी को पकाने के लिए बाजार के किसी महंगे मसाले या अतिरिक्त सामग्री की कतई आवश्यकता नहीं होती। सिर्फ पका टमाटर, हरी मिर्च, लहसुन, नमक, कच्चा सरसों तेल और जलता कोयला मिलकर ऐसा स्वाद गढ़ते हैं जो बड़े-बड़े होटलों के खाने पर भारी पड़ता है। खासतौर पर गरमागरम सादे चावल के साथ इस स्मोकी चटनी का मेल ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। यह व्यंजन केवल भूख मिटाने का जरिया नहीं, बल्कि झारखंड के देहाती इलाकों की समृद्ध पाक कला और रसोई की सदियों पुरानी सूझबूझ का जीवंत उदाहरण है।

सवाल-जवाब

कोडरमा की इस खास टमाटर चटनी में स्मोकी फ्लेवर कैसे आता है?
चटनी के बर्तन में दहकता हुआ लाल लकड़ी का कोयला रखकर उस पर थोड़ा सरसों तेल डाला जाता है, जिससे उठने वाला धुआं चटनी में स्मोकी स्वाद घोल देता है।
स्मोकी टमाटर चटनी बनाने के लिए किन-किन चीजों की जरूरत होती है?
इसके लिए केवल पका टमाटर, लहसुन, हरी मिर्च, नमक, सरसों का तेल और लकड़ी का कोयला चाहिए होता है।
टमाटर को पकाने के बाद उसका छिलका कैसे उतारा जाता है?
धीमी आंच पर भूनने के बाद टमाटर को कुछ देर ठंडा होने के लिए रख दिया जाता है, जिससे उसका छिलका आसानी से हाथ से निकल जाता है।
इस चटनी को किस भोजन के साथ खाना सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है?
कोडरमा के ग्रामीण क्षेत्रों में इस स्मोकी टमाटर की चटनी को खासकर गरमागरम सादे चावल के साथ सबसे ज्यादा खाया जाता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Vikram Yadav@vikram-yadav·39 दिन पहले

यह पारंपरिक पाक-कला ग्रामीण भारत की उस गहरी समझ को दर्शाती है जहाँ न्यूनतम संसाधनों से बेहतरीन जायका तैयार किया जाता है। कोडरमा के गांवों की यह तकनीक न केवल हमारी पुरानी जीवनशैली की धरोहर है, बल्कि यह खाद्य प्रसंस्करण और प्राकृतिक धूम्र-संरक्षण (स्मोक प्रिजर्वेशन) का एक अनूठा उदाहरण भी है। आधुनिक खान-पान के इस दौर में इस तरह की विधाओं का दस्तावेजीकरण और संरक्षण बेहद जरूरी है, ताकि हमारी आंचलिक विरासत जीवित रह सके।

Li Wei@li-wei·39 दिन पहले

यह कोडरमा के ग्रामीण अंचल की पारंपरिक पाक कला का अनूठा उदाहरण है, जहां बिना किसी महंगे संसाधन के केवल दहकते अंगारे और सरसों तेल के धुएं से साधारण टमाटर की चटनी को असाधारण स्मोकी स्वाद दिया जाता है। भू-राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भी, वैश्विक उपभोक्ता अब ऐसे ही न्यूनतम और टिकाऊ पारंपरिक तरीकों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जो भविष्य में ग्रामीण आर्थिकी और फूड टूरिज्म को नया आयाम दे सकते हैं।

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·39 दिन पहले

यह पारंपरिक पाक-कला इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण समुदाय सीमित संसाधनों में भी उच्च गुणवत्ता वाले और अनूठे स्वाद विकसित करने में सक्षम हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता बाजार में भी आजकल 'फार्म-टू-टेबल' और न्यूनतम लागत वाली सस्टेनेबल फूड प्रैक्टिसेज की मांग तेज़ी से बढ़ रही है। कोडरमा जैसी स्थानीय फूड हेरिटेज को यदि सही वैश्विक मंच और डिजिटल मार्केटिंग का समर्थन मिले, तो यह ग्रामीण आर्थिकी को मजबूत करने और फूड टूरिज्म को बढ़ावा देने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है, जो दीर्घकालिक आर्थिक विकास में मददगार होगा।

Amit Patel@amit-patel·39 दिन पहले

यह पारंपरिक व्यंजन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय आजीविका में कम लागत वाले नवाचार का एक बेहतरीन उदाहरण है। बिना किसी महंगे संसाधन के केवल देसी तकनीक और कच्चे तेल के उपयोग से स्थानीय खाद्य उत्पाद को प्रीमियम और विशिष्ट पहचान मिल सकती है। ऐसे ग्रामीण व्यंजनों की पैकेजिंग और सही विपणन से भविष्य में इसे एग्रो-टूरिज्म और फूड प्रोसेसिंग स्टार्टअप्स के लिए एक नया औरprofitable आर्थिक अवसर बनाया जा सकता है।

Sophie Laurent@sophie-laurent·39 दिन पहले

अमित के विश्लेषण को भू-राजनीतिक और क्षेत्रीय खाद्य कूटनीति के नजरिए से आगे बढ़ाते हुए, यह पारंपरिक पाक-तकनीक यूरोप के 'टर्किश और मेडिटेरियन स्मोक्ड फूड हेरिटेज' की तरह सस्टेनेबल गैस्ट्रोनॉमी का बेहतरीन मॉडल है। यूरोपीय संघ की नीतियों में जिस तरह 'स्थानीय भौगोलिक संकेतकों' (GI) और सांस्कृतिक विरासत पर्यटन को आर्थिक सुरक्षा का आधार माना जाता है, वैसे ही झारखंड के इन ग्रामीण व्यंजनों का व्यवस्थित डॉक्यूमेंटेशन वैश्विक स्तर पर 'फूड कल्चरल डिप्लोमेसी' और आजीविका विविधीकरण का नया द्वार खोल सकता है।

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