मध्य प्रदेश के बघेलखंड अंचल का पारंपरिक खानपान अपनी सादगी और मिट्टी से जुड़े अनूठे देसी स्वाद के लिए विशेष पहचान रखता है। ग्रामीण घरों की रसोई में ऐसी कई वनस्पतियों और पत्तों से पौष्टिक व्यंजन बनाए जाते हैं, जिन्हें शहरों में अक्सर व्यर्थ समझकर छोड़ दिया जाता है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में कद्दू की बेल के ताजे और कोमल पत्तों से तैयार होने वाली देसी भाजी शामिल है। ग्रामीण अंचलों में मानसून के आसपास जब खेतों और बाड़ियों में कद्दू की बेलें फैलती हैं, तब इन पत्तों को तोड़कर बनाई गई सूखी सब्जी दोपहर और रात के देसी भोजन का मुख्य आकर्षण बन जाती है।
पत्तों के रेशे साफ करने और बारीक काटने की विधि
इस पारंपरिक भाजी को तैयार करने का तरीका बेहद सीधा और सहज है। सतना निवासी अंजलि चतुर्वेदी के अनुसार, सब्जी के लिए कद्दू की बेल से केवल मुलायम और ताजे पत्तों को ही चुना जाता है। घर लाने के बाद पत्तों के ऊपरी और पिछले हिस्से से रेशे अलग किए जाते हैं और उन्हें पानी से अच्छी तरह धोया जाता है ताकि किसी भी तरह की धूल या मिट्टी साफ हो सके। सफाई के उपरांत पत्तों को बिल्कुल बारीक काट लिया जाता है। बारीक कटे पत्ते न केवल कड़ाही में जल्दी गलते हैं, बल्कि उनका स्वाद भी निखरकर सामने आता है।
सरसों के तेल और लहसुन-मिर्च का पारंपरिक तड़का
इस भाजी को तैयार करने के लिए कड़ाही में सरसों का तेल गर्म किया जाता है। इसके बाद कटे हुए लहसुन, तीखी हरी मिर्च और बारीक प्याज का तड़का लगाया जाता है। जब सरसों के तेल में लहसुन और मिर्च अच्छी तरह पकते हैं, तो रसोई में एक सोंधी देसी महक फैल जाती है। इसके तुरंत बाद बारीक कटी पत्तियों को कड़ाही में डाला जाता है और सामान्य घरेलू पिसे मसाले व स्वादानुसार नमक मिलाकर धीमी आंच पर पकाया जाता है। आंच धीमी रखने से पत्तियां धीरे-धीरे नरम होकर मसालों का अर्क अपने भीतर पूरी तरह सोख लेती हैं।
गर्म रोटी और दाल-चावल के साथ परोसने का रिवाज
बघेलखंड के देहाती इलाकों में यह भाजी किसी उत्सव या विशेष दावत की मोहताज नहीं है, बल्कि यह सामान्य दिनचर्या के घरेलू भोजन का हिस्सा है। चूल्हे से उतरी गरमा-गरम रोटियों के साथ इसका मेल सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त, दोपहर के समय दाल-भात के साथ भी सूखी भाजी के तौर पर इसका सेवन खूब किया जाता है। इस व्यंजन की खासियत यह है कि इसमें किसी महंगे मसाले या बाजार के अतिरिक्त सामान की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि घर और खेत की ताजी चीजों से ही यह तैयार हो जाती है।
आषाढ़ और बारिश के दिनों में बेलों की ताजगी
कद्दू की इस भाजी का सीधा संबंध आषाढ़ के महीने और मानसूनी फुहारों से माना जाता है। इस समय खेतों की मेड़ों और घरों के पिछवाड़े लगी बेलों में नई, कोमल पत्तियां तेजी से फूटती हैं। ग्रामीण परिवार उसी दिन ताजी पत्तियां तोड़कर पकाते हैं, जिससे इसमें बाजार की बासी सब्जियों के मुकाबले खेत की शुद्ध ताजगी मिलती है। पकाने से पहले केवल पत्तों की संपूर्ण सफाई का ध्यान रखना सबसे अहम माना जाता है।

















