गर्मियों में आम का मौसम शुरू होते ही पहाड़ी और ग्रामीण घरों में अमचूर बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है. कुशल गृहणी गीता रावल बताती हैं कि इसके लिए पूरी तरह पके या बड़े आम नहीं, बल्कि करीब 20 से 30 दिन के कच्चे आम सबसे बेहतर माने जाते हैं. इस उम्र में आम का गूदा सख्त रहता है और उसमें हल्की खटास होती है, जो बाद में अचार और चटनी का स्वाद कई गुना बढ़ा देती है. पके या बड़े आम सुखाने पर अच्छे परिणाम नहीं देते, इसलिए शुरुआती अवस्था के छोटे कच्चे आम ही चुने जाते हैं.
सफाई से होती है शुरुआत
अमचूर बनाने का पहला कदम आमों की अच्छी धुलाई है. पेड़ से जमीन पर गिरे आमों में मिट्टी और गंदगी चिपकी रहती है, इसलिए उन्हें साफ पानी से कई बार धोया जाता है. धोने के बाद आमों का अतिरिक्त पानी सूखने दिया जाता है, ताकि सुखाने के दौरान उनमें फफूंदी लगने का खतरा कम हो जाए. ग्रामीण इलाकों में इस चरण को बेहद जरूरी माना जाता है, क्योंकि सही सफाई से तैयार अमचूर लंबे समय तक खराब नहीं होता और उसका स्वाद भी बना रहता है.
गुठली सहित कटाई का तरीका
धुलाई के बाद कच्चे आमों को लंबे आकार में काटा जाता है. खास बात यह है कि इन्हें गुठली सहित ही काटा जाता है, जिससे सूखते समय आम का असली स्वाद और बनावट बरकरार रहती है. कटे हुए टुकड़ों को साफ बर्तन में रखा जाता है और उसके बाद आगे की प्रक्रिया शुरू होती है. पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी कई परिवार यह सारा काम हाथ से करते हैं और पुराने पारंपरिक तरीके को ही तरजीह देते हैं.
हल्दी-नमक और तेज धूप का कमाल
कटे हुए आम के टुकड़ों पर आमतौर पर हल्दी और नमक लगाया जाता है, हालांकि कुछ लोग बिना हल्दी-नमक के भी इन्हें सुखाना पसंद करते हैं. हल्दी और नमक लगाने से स्वाद तो बढ़ता ही है, साथ ही टुकड़े लंबे समय तक सुरक्षित भी रहते हैं. इसके बाद इन टुकड़ों को साफ कपड़े या बांस की टोकरी पर फैलाकर तेज धूप में रखा जाता है. बीच-बीच में टुकड़ों को पलटा भी जाता है, ताकि हर तरफ से समान रूप से सूखें.
कितने दिन में और कैसे पहचानें कि अमचूर तैयार है
मौसम के अनुसार अमचूर तैयार होने में करीब एक सप्ताह का समय लगता है. अगर लगातार अच्छी धूप मिलती रहे तो आम के टुकड़े पूरी तरह सूखकर कड़क हो जाते हैं, और यही कड़कपन अमचूर के तैयार होने की असली पहचान माना जाता है. अगर टुकड़ों में जरा भी नमी रह जाए तो वे जल्दी खराब हो सकते हैं. इसी वजह से ग्रामीण इलाकों में लोग पूरी सावधानी बरतते हैं और तब तक धूप में सुखाते रहते हैं, जब तक टुकड़ों में बिल्कुल भी नमी न रह जाए.
भंडारण का सही तरीका
पूरी तरह सूख जाने के बाद अमचूर को जालीदार कपड़े या साफ सूती थैली में भरकर रखा जाता है, जिससे हवा का आना-जाना बना रहता है और नमी नहीं जमती. कई परिवार इसे कांच या स्टील के डिब्बों में भी रखते हैं, लेकिन गांवों में पहले जालीदार कपड़े में रखने की परंपरा आज भी कायम है. अगर अमचूर को सही ढंग से रखा जाए तो यह कई महीनों तक आसानी से इस्तेमाल में लाया जा सकता है.
चटनी और अचार बनाने की विधि
जब अमचूर का इस्तेमाल करना हो तो उसके चार-पांच टुकड़े करीब एक घंटे पहले पानी में भिगो दिए जाते हैं. नरम होने के बाद इन्हें सिलबट्टे या मिक्सर में पीसा जाता है. इसमें नमक, हरी मिर्च, लहसुन, धनिया और अन्य मसाले मिलाकर स्वादिष्ट चटनी तैयार की जाती है. इसी तरह मसालों के साथ इसका खट्टा अचार भी बनाया जाता है, जिसे पहाड़ों में भोजन के साथ बड़े चाव से खाया जाता है.
सिर्फ स्वाद नहीं, परंपरा और सेहत का भी हिस्सा
अमचूर सिर्फ स्वाद बढ़ाने वाला खाद्य पदार्थ नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का एक अहम हिस्सा भी है. इसकी प्राकृतिक खटास कई व्यंजनों का स्वाद निखार देती है. कच्चे आम में स्वाभाविक रूप से विटामिन-सी और कुछ एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, हालांकि सुखाने की प्रक्रिया के बाद इनकी मात्रा कुछ हद तक कम हो सकती है. इसके बावजूद दाल, सब्जी, चटनी और अचार में खट्टापन लाने के लिए आज भी अमचूर का जमकर इस्तेमाल किया जाता है.













