पटना के अशोक राजपथ पर पिछले 40 सालों से चल रहे एक चना भाजी के स्टॉल ने शहर के खाने के शौकीनों के बीच ऐसी पहचान बना ली है कि एक दौर में लोग टोकन लेकर आधे-आधे घंटे तक लाइन में खड़े रहते थे, तब कहीं जाकर उन्हें एक प्लेट चना भाजी नसीब होती थी। सगुना मोड़ से लेकर पटना सिटी तक इस स्टॉल जैसा स्वाद कहीं और नहीं मिलता, ऐसा मानने वालों में लोहानीपुर के कुमार विवेकानंद भी शामिल हैं, जो पिछले 15 सालों से यहां चना भाजी का स्वाद लेने पहुंच रहे हैं। कुछ साल पहले अपनी मां का इलाज कराने पटना आईं नगमा ने भी पहली बार इसी स्टॉल पर चना भाजी चखी थी और पहले ही निवाले में इसकी ऐसी मुरीद हुईं कि तब से लगातार यहीं आती हैं। यह पूरा किस्सा बताता है कि सड़क किनारे लगने वाला एक मामूली सा ठेला भी अपने स्वाद और मेहनत के दम पर पूरे शहर की पहचान बन सकता है।
गया-गोह के नाम से मशहूर हुआ स्टॉल
यह स्टॉल औरंगाबाद जिले के गोह इलाके के रहने वाले ललन प्रसाद का है, जिन्होंने अपने ठेले को गया-गोह का स्वादिष्ट चना भाजी नाम दिया, यानी अपने पैतृक इलाके की पहचान को ही अपने कारोबार का ब्रांड बना दिया। पटना में इस चना भाजी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विवेकानंद और नगमा जैसे सैकड़ों लोग हर दिन इसका स्वाद चखने पहुंचते हैं। एक दौर में ललन प्रसाद के पटना में कुल पांच स्टॉल एक साथ चलते थे और करीब दस स्टाफ उनके साथ काम करते थे। बाद में इनमें से कई कर्मचारियों ने उत्साहित होकर अपनी अलग-अलग दुकानें खोल लीं, लेकिन कोई भी ललन प्रसाद जैसा स्वाद तैयार नहीं कर पाया, और आखिरकार उन्हें अपनी वे दुकानें बंद करनी पड़ीं। इससे यह भी साफ होता है कि उनकी सफलता के पीछे सिर्फ जगह या मौका नहीं, बल्कि बरसों से आजमाई गई एक खास रेसिपी काम करती है।
पांच तरह की भाजी और दो खास चटनी का कमाल
ललन प्रसाद की चना भाजी का असली राज़ इसे बनाने के पूरे तरीके में छिपा है। वे सबसे पहले उबले हुए चने को प्याज, गाजर, चुकंदर, खीरा और पत्तागोभी, यानी पांच तरह की भाजी के साथ अच्छी तरह मिलाते हैं। इसके बाद इसमें आलू, टमाटर, नींबू और मिर्च डाला जाता है, जिससे चना भाजी में एक तीखा और चटपटा स्वाद आ जाता है। स्वाद को और खास बनाने के लिए वे अपने हाथों से बनाई दो तरह की चटनी का इस्तेमाल करते हैं। पहली चटनी गुड़, चुकंदर और बादाम से तैयार होती है, जिसमें एक हल्की मिठास घुली रहती है, जबकि दूसरी चटनी आंवला, नींबू और हरी मिर्च से बनती है, जो स्वाद में तीखापन और खटास दोनों जोड़ती है। दोनों चटनियों को आपस में मिलाकर चना भाजी में डाला जाता है और फिर इसे प्लेट में सजाकर ऊपर से मकई के चिप्स और सेव नमकीन डालकर परोसा जाता है, जिससे हर प्लेट में एक अलग तरह की कुरकुराहट भी शामिल हो जाती है। इतनी मेहनत और इतनी सारी चीजों से तैयार एक प्लेट चना भाजी की कीमत महज 15 रुपये है, जो इसे आम लोगों की पहुंच में भी बनाए रखती है।
स्वाद में एक और परत जोड़ता है ललन प्रसाद का खुद तैयार किया हुआ खास नमक और मसाला। साधारण नमक की जगह वे काला नमक, सेंधा नमक, जीरा, गोलकी और सफेद नमक को मिलाकर एक खास नमक बनाते हैं। इसके अलावा जीरा पाउडर, धनिया पाउडर और पांच तरह के दूसरे मसालों को मिलाकर उन्होंने अपना अलग मसाला तैयार किया है, जिसकी बनावट और अनुपात वे किसी और को नहीं बताते। दो तरह की चटनी और इस खास मसाले का यही अनोखा मेल उनके चना भाजी को शहर के बाकी सभी ठेलों से अलग बनाता है, और यही वजह है कि लोग इतने बरसों से इसी स्टॉल पर लौटकर आते हैं।
नौकरी छोड़कर शुरू किया था यह सफर
ललन प्रसाद ने साल 1988-89 में अपनी ग्रेजुएशन पूरी की थी और इसके बाद उन्हें एक नौकरी भी मिल गई थी, लेकिन उनका मन उस नौकरी में बिल्कुल नहीं रमा। उस दौर में उनके पिता खुद पर्यटन विभाग में काम करते थे, फिर भी ललन प्रसाद ने नौकरी छोड़ने का बड़ा फैसला किया और साल 1990 में अशोक राजपथ पर चना भाजी का अपना स्टॉल शुरू कर दिया। शुरुआत में वे खुद तीन स्टाफ के साथ स्टॉल संभालते थे और हर दिन मेहनत से अपने हाथों की बनाई भाजी बेचते थे। धीरे-धीरे उनके हाथों की इस चना भाजी का स्वाद पटना में मशहूर होने लगा और मांग लगातार बढ़ने लगी।
स्वाद की इसी बढ़ती लोकप्रियता के दम पर उन्होंने रूपक, वैशाली, उमा, अप्सरा और मोना सिनेमा के बाहर भी अपने स्टॉल लगाने शुरू कर दिए, जिससे शहर के अलग-अलग हिस्सों में उनके ग्राहक बनने लगे। हर स्टॉल पर करीब दो-दो स्टाफ काम करते थे और एक समय ऐसा भी आया जब कुल दस लोगों का स्टाफ ललन प्रसाद के साथ जुड़ा हुआ था। साल 1990 से 2026 तक का यह सफर अब करीब 36 साल का हो चुका है। इन 36 सालों में शहर बहुत कुछ बदल गया, सड़कें बदलीं, आधुनिक निर्माण हुए, लेकिन ललन प्रसाद के चना भाजी का स्वाद आज भी वैसा ही बना हुआ है, जैसा शुरुआती दिनों में था।
परिवार और स्टाफ के लिए भी बना रोजगार का जरिया
ललन प्रसाद के इस छोटे से कारोबार की तरक्की देखकर उनके रिश्तेदारों और साथ काम कर चुके स्टाफ ने भी इसी राह पर अपनी किस्मत आजमाई। गांधी मैदान के पास उनके भाई ने अपना स्टॉल खोला, जबकि उनके साले और साढ़ू भी अलग-अलग जगहों पर चना भाजी का कारोबार करते हैं। इसके अलावा उनके साथ काम कर चुके कई कर्मचारियों ने भी समय के साथ अपने खुद के स्टॉल खोल लिए। हालांकि ललन प्रसाद का दावा है कि इतने सालों में उनके साथ काम कर चुका या उनसे जुड़ा कोई भी शख्स उनके जैसा स्वाद तैयार नहीं कर पाया। वे इसे किसी जादू का नतीजा नहीं मानते, बल्कि इसे पूरी तरह अपनी बरसों की मेहनत की कमाई बताते हैं। इसी छोटे से चना भाजी के स्टॉल की आमदनी से उन्होंने अपने पूरे परिवार को संभाला और अपनी तीनों बेटियों की शादी भी बखूबी निभाई, जो यह दिखाता है कि सड़क किनारे का यह छोटा कारोबार उनके लिए जीवनभर की कमाई का मुख्य जरिया रहा है।
कभी टोकन लेकर मिलती थी चना भाजी की प्लेट
ललन प्रसाद बताते हैं कि करीब दो साल पहले तक उनके स्टॉल पर चना भाजी खाने के लिए टोकन व्यवस्था लागू थी। ग्राहक को जो नंबर मिलता था, उसी क्रम में उसकी बारी आने पर उसे चना भाजी की प्लेट दी जाती थी। उस दौर में एक प्लेट की कीमत सिर्फ 10 रुपये हुआ करती थी, फिर भी हर दिन करीब 500 से 600 प्लेट चना भाजी बिक जाती थी। भीड़ का आलम यह था कि लोग अपनी बारी के लिए आधे-आधे घंटे तक लाइन में खड़े रहते थे और पूरे दिन स्टॉल पर ग्राहकों का तांता लगा रहता था, जो इस बात का सबूत है कि इतनी कम कीमत में भी यह ठेला रोज हजारों रुपये का कारोबार कर लेता था।
हालांकि बाद में मेट्रो और डबल डेकर पुल के निर्माण कार्य ने उनके कारोबार पर सीधा असर डाला, क्योंकि इलाके में खुदाई और निर्माण की वजह से ग्राहकों की आवाजाही घट गई। निर्माण कार्य के दौरान कुछ समय के लिए ललन प्रसाद को अपना स्टॉल पूरी तरह बंद भी करना पड़ा। अब ललन प्रसाद ने दोबारा अपना स्टॉल शुरू कर दिया है और पुराने ग्राहक फिर से यहां का स्वाद लेने पहुंचने लगे हैं। आज भी उनके स्टॉल पर हर दिन करीब पांच हजार रुपये की बिक्री हो जाती है, हालांकि बढ़ती महंगाई के चलते पहले के मुकाबले अब उनकी बचत कुछ कम हो गई है। अशोक राजपथ पर पिलर नंबर 46-47 के बीच लगने वाला यह स्टॉल आज भी पटना के स्वाद के नक्शे पर एक अलग और अनोखी पहचान रखता है।











