उत्तराखंड के गांवों में आज भी लोहे की कढ़ाई में क्यों पकाई जाती है पोटा-कलेजीखानपान
2 घंटे पहले· 2

उत्तराखंड के गांवों में आज भी लोहे की कढ़ाई में क्यों पकाई जाती है पोटा-कलेजी

उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पोटा-कलेजी आज भी लोहे की कढ़ाई में जाखिया, जंबू और पहाड़ी लहसुन के तड़के के साथ पारंपरिक तरीके से बनाई जाती है। गृहिणी किरन पांडे और डॉ ऐजल पटेल इसके स्वाद, पोषण और सेहत से जुड़ी सावधानियों के बारे में बताते हैं।

उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में पोटा-कलेजी एक ऐसा व्यंजन है, जिसे स्थानीय मुर्गी के पोटे और कलेजी से तैयार किया जाता है। यह वहां की रसोई परंपरा का अहम हिस्सा माना जाता है और स्वाद के साथ-साथ पौष्टिकता के लिहाज से भी इसे खास माना जाता है। आज भी कई पहाड़ी घरों में इसे बनाने का तरीका पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है, और इसे बनाने के पीछे कुछ खास तरकीबें छिपी हैं, जो इसका असली स्वाद तय करती हैं।

पोटा-कलेजी बनाने की पारंपरिक विधि

इसे बनाने के लिए सबसे पहले पोटा और कलेजी को अच्छी तरह से साफ किया जाता है। इसके बाद हल्दी, नमक और थोड़ा लहसुन-अदरक लगाकर इसे कुछ देर के लिए मेरिनेट कर दिया जाता है, जिससे मसाले अंदर तक पहुंच जाएं। पकाने के लिए लोहे की कढ़ाई का इस्तेमाल होता है, जिसमें पहले सरसों का तेल गर्म किया जाता है। तेल गर्म होने पर उसमें जाखिया या जीरा डाला जाता है और फिर प्याज, टमाटर, लहसुन और अदरक को सुनहरा होने तक भूना जाता है। इसके बाद मसालों में हल्दी, धनिया और लाल मिर्च मिलाकर पोटा-कलेजी डाल दिया जाता है और अच्छी तरह से चलाया जाता है। थोड़ा पानी डालकर इसे धीमी आंच पर पकने दिया जाता है, ताकि मसाला अच्छी तरह चढ़ जाए। आखिर में ऊपर से हरा धनिया डालकर इसे उतार लिया जाता है। यह व्यंजन मंडुवे की रोटी या चावल के साथ परोसे जाने पर सबसे ज्यादा स्वादिष्ट लगता है।

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लोहे की कढ़ाई से क्यों निखरता है असली स्वाद

गृहिणी किरन पांडे के मुताबिक, पहाड़ के कई घरों में आज भी लोहे की कढ़ाई में खाना पकाने की पुरानी परंपरा कायम है। उनका कहना है कि पोटा-कलेजी को लोहे की कढ़ाई में पकाने से इसका स्वाद ज्यादा गहरा और देसी लगता है। दरअसल, लोहे की कढ़ाई गर्मी को लंबे समय तक अपने अंदर बनाए रखती है, जिससे मसाले धीरे-धीरे पकते हैं और उनका स्वाद व्यंजन में अच्छी तरह घुल जाता है। इसके अलावा लोहे के बर्तनों में खाना पकाने से भोजन में थोड़ी मात्रा में आयरन भी शामिल हो सकता है, जिसे ग्रामीण इलाकों में सेहत के लिहाज से फायदेमंद माना जाता है। लोहे की कढ़ाई में तैयार पोटा-कलेजी का रंग और खुशबू भी अलग तरह से आकर्षक बनती है। किरन पांडे यह भी बताती हैं कि सही तरीके से इस्तेमाल और देखभाल की जाए तो यह कढ़ाई वर्षों तक चल सकती है।

जाखिया, जंबू और पहाड़ी लहसुन का जायका

उत्तराखंड के पारंपरिक खानपान में जाखिया, जंबू और स्थानीय लहसुन का विशेष स्थान है। पोटा-कलेजी बनाते समय जाखिया का तड़का लगाने से इसमें एक अलग ही तरह की खुशबू और स्वाद घुल जाता है। वहीं जंबू को हल्का भूनकर डालने पर व्यंजन का जायका और बढ़ जाता है। पहाड़ी लहसुन को सामान्य लहसुन के मुकाबले ज्यादा सुगंधित माना जाता है, इसलिए इसका इस्तेमाल खासतौर पर किया जाता है। ये मसाले पहाड़ी रसोई में सदियों से इस्तेमाल होते आ रहे हैं। ये न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाते हैं, बल्कि पाचन में भी मदद करते हैं। यही वजह है कि पोटा-कलेजी जैसे पारंपरिक व्यंजनों में आज भी इनका खुलकर इस्तेमाल किया जाता है।

पोषण के लिहाज से कितना फायदेमंद है यह व्यंजन

पोटा और कलेजी को पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसमें प्रोटीन, आयरन, विटामिन बी-12 और कई जरूरी खनिज पाए जाते हैं। कलेजी में आयरन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है, इसलिए इसे ऊर्जा देने वाला खाद्य पदार्थ माना जाता है। वहीं प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों के विकास और उनकी मरम्मत में मदद करता है। विटामिन बी-12 को शरीर में रक्त कोशिकाओं के निर्माण और तंत्रिका तंत्र के लिए जरूरी माना जाता है। यही वजह है कि पहाड़ी क्षेत्रों में मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग इसे ताकत देने वाले भोजन के तौर पर भी देखते हैं। हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका सेवन भी संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए, ताकि शरीर को जरूरी पोषण मिल सके और कोई नुकसान न हो।

किन लोगों को बरतनी चाहिए सावधानी

डॉ ऐजल पटेल के मुताबिक, पोटा-कलेजी भले ही पौष्टिक हो, लेकिन इसका सेवन संतुलित मात्रा में करना ही बेहतर माना जाता है। उनका कहना है कि जिन लोगों को कोलेस्ट्रॉल, दिल से जुड़ी समस्याएं या कुछ खास चिकित्सीय स्थितियां हैं, उन्हें कलेजी का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए। किसी भी भोजन का अधिक मात्रा में सेवन सेहत पर उल्टा असर डाल सकता है, इसलिए इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर ही खाना बेहतर रहता है। बच्चों, बुजुर्गों और अन्य लोगों के लिए भी मात्रा का खास ध्यान रखना जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति को कोई खास स्वास्थ्य समस्या है, तो उसे डॉक्टर की सलाह के मुताबिक ही इसका सेवन करना चाहिए। संतुलित भोजन के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि भी स्वस्थ जीवनशैली के लिए उतनी ही जरूरी मानी जाती है।

लोहे की कढ़ाई की देखभाल कैसे करें

लोहे की कढ़ाई की सही देखभाल उसकी उम्र काफी बढ़ा देती है। पोटा-कलेजी बनाने के बाद कढ़ाई को हल्के गर्म पानी से साफ करना चाहिए और उसे अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए। अगर कढ़ाई में नमी रह जाए तो उस पर जंग लगने का खतरा बना रहता है। कई ग्रामीण परिवार सफाई के बाद उसमें हल्का सरसों का तेल लगाकर रखते हैं, जिससे कढ़ाई सुरक्षित बनी रहती है। साबुन का ज्यादा इस्तेमाल करने के बजाय सामान्य तरीके से सफाई करना ही बेहतर माना जाता है। समय-समय पर कढ़ाई को गर्म करके उस पर तेल लगाने से उसकी सतह मजबूत बनी रहती है। अगर लोहे की कढ़ाई को अच्छी तरह संभालकर रखा जाए, तो यह वर्षों तक इस्तेमाल में लाई जा सकती है और भोजन को पारंपरिक स्वाद देने में मदद करती रहती है।

मंडुवे की रोटी से लेकर भांग की चटनी तक, परोसने का पारंपरिक अंदाज

उत्तराखंड में पोटा-कलेजी को अक्सर मंडुवे की रोटी, गेहूं की रोटी या झंगोरे के भात के साथ परोसा जाता है। मंडुवा पहाड़ का पारंपरिक अनाज है, जो अपनी पौष्टिकता के लिए जाना जाता है। जब गर्मागर्म पोटा-कलेजी को मंडुवे की रोटी के साथ खाया जाता है, तो इसका स्वाद और भी निखर जाता है। कई लोग इसके साथ पहाड़ी मूली, हरी मिर्च और भांग की चटनी भी परोसते हैं, जो इस व्यंजन के स्वाद को और बढ़ा देती है। यह संयोजन स्थानीय खानपान की पहचान माना जाता है। पर्वतीय इलाकों में पारिवारिक समारोहों और खास मौकों पर भी यह व्यंजन खासतौर पर बनाया जाता है। स्थानीय खाद्य परंपराओं को पसंद करने वाले लोगों के बीच यह आज भी उतना ही लोकप्रिय बना हुआ है।

स्वादिष्ट पोटा-कलेजी बनाने के लिए जरूरी टिप्स

अगर आप घर पर स्वादिष्ट पोटा-कलेजी बनाना चाहते हैं, तो कुछ बातों का खास ध्यान रखना जरूरी है। हमेशा ताजा पोटा और कलेजी का इस्तेमाल करें और उसे अच्छी तरह साफ करें। मसालों को धीमी आंच पर भूनने से उनका स्वाद बेहतर तरीके से बाहर निकलकर आता है। लोहे की कढ़ाई में पकाने पर मसाले और मांस दोनों अच्छी तरह गल जाते हैं। ज्यादा पानी डालने से स्वाद हल्का पड़ सकता है, इसलिए जरूरत के हिसाब से ही पानी मिलाएं। पकने के बाद ऊपर से हरा धनिया और हरी मिर्च डालने पर स्वाद और बढ़ जाता है। अगर उपलब्ध हो तो जाखिया और जंबू जैसे स्थानीय मसालों का इस्तेमाल जरूर करें। सही सामग्री और थोड़े धैर्य के साथ बनाया गया पोटा-कलेजी हर किसी को अपना दीवाना बना सकता है।

सवाल-जवाब

पोटा-कलेजी क्या है?
यह उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बनने वाला एक पारंपरिक व्यंजन है, जो मुर्गी के पोटे और कलेजी से तैयार किया जाता है।
पोटा-कलेजी को किस बर्तन में पकाना बेहतर माना जाता है?
इसे लोहे की कढ़ाई में पकाने से इसका स्वाद ज्यादा गहरा और देसी लगता है, क्योंकि लोहे की कढ़ाई गर्मी को लंबे समय तक बनाए रखती है।
इसमें कौन-कौन से मसाले इस्तेमाल होते हैं?
इसमें हल्दी, धनिया और लाल मिर्च के साथ जाखिया, जंबू और पहाड़ी लहसुन जैसे स्थानीय मसालों का इस्तेमाल किया जाता है।
पोटा-कलेजी को किसके साथ खाया जाता है?
इसे आमतौर पर मंडुवे की रोटी, गेहूं की रोटी या झंगोरे के भात के साथ परोसा जाता है, और कई लोग इसके साथ पहाड़ी मूली व भांग की चटनी भी खाते हैं।
क्या पोटा-कलेजी सेहत के लिए फायदेमंद है?
इसमें प्रोटीन, आयरन और विटामिन बी-12 पाया जाता है, जो ऊर्जा और मांसपेशियों के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन इसे संतुलित मात्रा में ही खाना चाहिए।
किन लोगों को पोटा-कलेजी खाने में सावधानी बरतनी चाहिए?
डॉ ऐजल पटेल के मुताबिक, कोलेस्ट्रॉल, दिल से जुड़ी समस्याएं या खास चिकित्सीय स्थितियां रखने वाले लोगों को कलेजी सीमित मात्रा में ही खानी चाहिए।
लोहे की कढ़ाई की देखभाल कैसे करें?
पकाने के बाद कढ़ाई को हल्के गर्म पानी से साफ कर सुखाना चाहिए और हल्का सरसों का तेल लगाकर रखना चाहिए, ताकि उसमें जंग न लगे।

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