वैज्ञानिक अनुसंधान और चिकित्सा परीक्षणों में जीवों के इस्तेमाल को लेकर तैयार किए गए नए नियमों के मसौदे पर विवाद गहरा गया है। प्रयोगशालाओं में शोध कार्यों की गति तेज करने के उद्देश्य से पेश किए गए इस नए कानूनी ढांचे को लेकर पशु कल्याण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने गहरी चिंता जताई है। उनका मानना है कि प्रस्तावित व्यवस्था से न केवल अनुसंधान परिसरों में मौजूद सुरक्षा मानक कमजोर पड़ेंगे, बल्कि परीक्षण के दौरान बेजुबानों को अत्यधिक यातनाओं का सामना भी करना पड़ सकता है।
पुराने कानूनों की जगह लेने की तैयारी और प्रतिक्रिया की मियाद
अक्टूबर के महीने में केंद्र सरकार की ओर से पशु क्रूरता निवारण के तहत प्रयोगशाला जानवरों के नियंत्रण, पर्यवेक्षण, प्रजनन और व्यापार से संबंधित 2026 के मसौदा नियमों को सार्वजनिक किया गया था। इस नए दस्तावेज का मुख्य मकसद 1968 और 1998 से प्रभावी मौजूदा कानूनी दिशा-निर्देशों को पूरी तरह प्रतिस्थापित करना है। सरकारी पक्ष का मानना है कि पुराने कायदे-कानूनों में बदलाव करके वैज्ञानिक परीक्षणों की रफ्तार को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। इस मसौदे पर सार्वजनिक राय, आपत्तियां और सुझाव दर्ज कराने के लिए 5 नवंबर तक का समय तय किया गया है।
खुले बाजार से खरीद की अनुमति पर विशेषज्ञों का कड़ा ऐतराज
ह्यूमन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स से जुड़ी सीनियर प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. सूरत पर्वतम ने इन प्रस्तावित बदलावों के वैज्ञानिक और नैतिक दोनों पहलुओं पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आगाह किया कि नए दिशा-निर्देशों के तहत यदि पंजीकृत केंद्रों से जीव उपलब्ध नहीं होते हैं, तो वैज्ञानिकों को अपंजीकृत प्रजनकों या खुले बाजारों से भी पशु हासिल करने की छूट मिल सकती है। ऐसी ढील के कारण सड़कों पर घूमने वाले आवारा और वन्यजीव संरक्षण कानून के दायरे में आने वाले जीवों को भी पकड़कर अनुसंधान के लिए इस्तेमाल किए जाने का गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस बदलाव को बेहद जोखिम भरा बताते हुए डॉ. सूरत पर्वतम ने स्पष्ट किया कि प्रयोगशाला परीक्षणों में इस्तेमाल किए जाने वाले खास नस्ल के जीवों का संपूर्ण मेडिकल इतिहास और आनुवंशिक रिकॉर्ड पहले से मौजूद रहता है। इससे अनुसंधान के दौरान आवश्यक एकरूपता बनी रहती है और प्राप्त नतीजों की प्रमाणिकता पर कोई संदेह नहीं रहता। यदि किसी अनजाने स्रोत, खुले बाजार या सड़क से उठाए गए पशु पर कोई परीक्षण किया जाएगा, तो उसकी जेनेटिक पृष्ठभूमि और पिछली बीमारियों की कोई जानकारी नहीं होगी। डॉ. सूरत ने कहा, "अनुसंधान की वैज्ञानिक विश्वसनीयता बहुत महत्वपूर्ण होती है।"
वैकल्पिक परीक्षण विधियों की प्राथमिकता हटाने से बढ़ा असंतोष
मौजूदा कानूनी व्यवस्था और नए मसौदे के बीच की तुलना करते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि पुराने नियमों में शोधकर्ताओं के लिए यह अनिवार्य शर्त रखी गई थी कि वे जीवित पशुओं को कष्ट देने से पहले आधुनिक गैर-पशु परीक्षण तरीकों को प्राथमिकता दें। अगर कोई वैज्ञानिक उन आधुनिक तरीकों का उपयोग नहीं करता था, तो उसे नियामक संस्थाओं के सामने इसका ठोस और संतोषजनक कारण स्पष्ट करना होता था। प्रस्तावित 2026 के मसौदे में से इस अनिवार्य शर्त को हटा दिया गया है, जिसे शोध की नैतिकता के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
इस कदम को देश के आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विपरीत बताते हुए विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने नई दवाओं और क्लिनिकल ट्रायल नियमों में कुछ अहम सुधारों का प्रस्ताव रखा था। उन सुधारों का मुख्य ध्येय दवा परीक्षणों के दौरान जीवों पर इंसानों की निर्भरता को घटाना और अत्याधुनिक वैज्ञानिक विकल्पों को अपनाना था।
आधुनिक अनुसंधान से पीछे हटने की आशंका और पुनर्विचार की मांग
उस समय आधुनिक तकनीकों जैसे मानव कोशिकाओं से विकसित ऑर्गेनॉइड्स, ऑर्गन-ऑन-चिप सिस्टम और अन्य उन्नत मानव-आधारित परीक्षण मॉडल को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई गई थी। ये उन्नत प्रणालियां मानव शरीर की जटिल जैविक क्रियाओं को अधिक सटीक ढंग से समझने और नई औषधियों के प्रभावों का सटीक विश्लेषण करने में सक्षम हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 2026 का यह नया मसौदा देश को इन आधुनिक प्रगतिशील कदमों से पीछे की तरफ ले जाने जैसा प्रतीत होता है।
डॉ. सूरत पर्वतम ने इस मसौदे की समीक्षा करने की अपील करते हुए जोर दिया कि अनुसंधान की गति बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए पशुओं के प्रति मानवीय संवेदनशीलता, उनकी बुनियादी सुरक्षा और वैज्ञानिक आंकड़ों की निष्पक्षता को ताक पर नहीं रखा जा सकता। आम नागरिक और संबंधित हितधारक इस प्रस्तावित मसौदे पर अपनी टिप्पणियां और सुझाव 5 नवंबर तक ईमेल के जरिए [email protected] पर भेज सकते हैं।



















