फरीदाबाद के कृषि क्षेत्रों में इन दिनों धान की कटाई का दौर जोरों पर है। मौजूदा दौर में जहां अधिकांश किसान समय बचाने और मजदूरी की लागत घटाने के उद्देश्य से कंबाइन हार्वेस्टर जैसी अत्याधुनिक मशीनों पर निर्भर हो चुके हैं, वहीं डीग गांव के किसान कुंवरपाल ने एक बिल्कुल अलग राह चुनी है। कुंवरपाल इस मौसम में लगभग 25 एकड़ रकबे में धान की खेती संभाल रहे हैं। व्यापक स्तर पर खेती होने के बावजूद वे मशीनों का उपयोग करने के बजाय पारंपरिक तरीके से हाथ से कटाई को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके लिए उन्होंने विशेष रूप से बिहार से खेतिहर मजदूरों को बुलाया है, जो खेतों में दरांती से बालियों को काटकर पारंपरिक अंदाज में पटक-पटककर दाना अलग करने में जुटे हुए हैं।
मशीनी रफ्तार के सामने पारंपरिक कटाई का फैसला
आधुनिक दौर में मशीनी उपकरणों से कटाई बेहद सुगम और तीव्र गति से पूरी हो जाती है। एक स्वचालित कंबाइन मशीन लगभग आधे घंटे से एक घंटे के भीतर एक एकड़ खेत की फसल काटकर समेट देती है। इसके विपरीत, इंसानी हाथों से एक एकड़ खेत काटने में कई मजदूरों की जरूरत पड़ती है और काम पूरा होने में काफी अधिक समय लगता है। इसके अतिरिक्त, हाथ से फसल कटवाने का आर्थिक खर्च भी मशीनी कटाई के मुकाबले लगभग दोगुने से अधिक बैठता है। इन सब चुनौतियों और खर्चों के बाद भी कुंवरपाल हर साल हाथ से ही धान कटवाने की परिपाटी पर अडिग रहते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि यह निर्णय केवल किसी पुरानी रवायत को निभाने भर का नहीं है, बल्कि इसके पीछे अनाज की गुणवत्ता, दानों का स्वास्थ्य और कटाई के तुरंत बाद खेत की दशा जैसे बेहद व्यावहारिक और आर्थिक कारण जुड़े हुए हैं।
हाथ और मशीन की लागत का वास्तविक अंतर
दोनों पद्धतियों के बीच लागत का अंतर काफी बड़ा है। कुंवरपाल के अनुसार, यदि एक एकड़ खेत में मजदूरों से हाथ से कटाई करवाई जाए, तो प्रति एकड़ लगभग 7 हजार से 8 हजार रुपये तक का खर्च बैठता है। दूसरी तरफ, आधुनिक हार्वेस्टर मशीन से वही एक एकड़ फसल महज 3 हजार रुपये के आसपास में कटकर तैयार हो जाती है। इस प्रकार सतही तौर पर देखने पर मशीन से कटाई कराने पर प्रति एकड़ 4 हजार से 5 हजार रुपये की सीधी बचत नजर आती है और कीमती समय भी बचता है। लेकिन कुंवरपाल इस शुरुआती बचत को अंतिम मुनाफा नहीं मानते। उनका अनुभव बताता है कि फसल कटाई के तौर-तरीके का सीधा असर पैदावार की शुद्धता और उसकी बाजार कीमत पर पड़ता है।
मशीन में हरे दाने का नुकसान और हाथ से कटाई के फायदे
कुंवरपाल के अनुभव के मुताबिक, हार्वेस्टर मशीन खेत में खड़ी फसल को एक सिरे से अंधाधुंध गति से काटती चली जाती है। इस तेज रफ्तार प्रक्रिया में पौधों के निचले हिस्से में मौजूद कच्चे अथवा हरे दाने भी पक चुकी फसल के साथ ही कटकर मिल जाते हैं, जिससे उपज में नमी और हरेपन की मात्रा बढ़ जाती है। वहीं जब मजदूर हाथों से कटाई करते हैं, तो वे फसल की परिपक्वता को देखकर बारीकी से कटाई करते हैं। हाथ से काटी गई फसल को खेत में व्यवस्थित तरीके से सूखने और पूरी तरह पकने का पर्याप्त अवसर मिलता है। जब फसल का डंठल और बाली भली-भांति सूख जाती है, तब मजदूर उसे लकड़ी के फट्टे या जमीन पर पटककर झाड़ते हैं। इस प्रक्रिया से केवल पूरी तरह विकसित और पुष्ट दाना ही अलग होता है, जिससे अनाज की चमक और वजन दोनों बेहतर बने रहते हैं और टूट-फूट का नुकसान बेहद कम होता है।
मंडी में 200 रुपये तक अधिक भाव से भरपाई
प्रति एकड़ 4 हजार रुपये तक अतिरिक्त मजदूरी चुकाने के बावजूद यह सौदा किसान के लिए घाटे का नहीं रहता। कुंवरपाल स्पष्ट करते हैं कि हाथ से काटे और झाड़े गए धान में न तो टूटे दाने होते हैं और न ही अवांछित हरापन। जब यह साफ-सुथरा और उच्च गुणवत्ता वाला धान अनाज मंडी में पहुंचता है, तो व्यापारियों और खरीदारों से इसे हाथों-हाथ प्राथमिकता मिलती है। मंडी में इस उम्दा क्वालिटी के धान पर मशीन से कटे धान के मुकाबले लगभग 200 रुपये प्रति क्विंटल तक का अधिक भाव आसानी से मिल जाता है। प्रति क्विंटल मिलने वाला यह प्रीमियम और दानों की कम बर्बादी मिलकर कटाई पर हुए अतिरिक्त खर्च की पूरी भरपाई कर देते हैं और किसान को अंततः बेहतर शुद्ध मुनाफा दिलाते हैं।
पशुओं के लिए पौष्टिक चारा और अगली बुवाई की आसान तैयारी
गुणवत्ता और मंडी भाव के अलावा खेत के प्रबंधन के लिहाज से भी हाथ की कटाई के दूरगामी फायदे हैं। हाथ से कटाई के दौरान फसल को जमीन की सतह के बेहद करीब से काटा जाता है। इससे अवशेष के रूप में बचने वाला पुआल या पराली पूरी लंबाई में सुरक्षित रहता है, जो मवेशियों के लिए बेहतरीन सूखे चारे का काम करता है। किसान को चारे के लिए अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ता। इसके साथ ही खेत में ठूंठ बहुत छोटे रह जाते हैं, जिससे रबी सीजन की अगली फसल के लिए जमीन तैयार करना काफी आसान हो जाता है। जुताई के दौरान खेत में रुकावटें नहीं आतीं और जमीन अगली बुवाई के लिए बिना किसी अतिरिक्त मशक्कत के तुरंत तैयार हो जाती है। यही वजह है कि 25 एकड़ जैसे बड़े रकबे पर भी कुंवरपाल मशीनों के बजाय इंसानी मेहनत और गुणवत्ता पर अपना पूरा भरोसा बनाए हुए हैं।



















