पारंपरिक फसलों के मुकाबले बागवानी और फल उत्पादन किसानों के लिए कमाई का एक बेहतर जरिया बनकर उभर रहा है। झारखंड के देवघर जिले के किसान अंबिका ने फल उत्पादन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा करते हुए बताया कि पपीते की आधुनिक खेती किसानों की आमदनी बढ़ाने में काफी मददगार साबित हो सकती है। सही किस्म के चयन और समय पर देखरेख से किसान सीमित जमीन में भी काफी अच्छा मुनाफा हासिल कर सकते हैं।
कम ऊंचाई में फल देने वाली किस्में
अंबिका के अनुसार जो किसान पपीता उगाने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए वीएनआर और ईस्ट वेस्ट किस्में बेहद उपयुक्त विकल्प हैं। इन दोनों किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनके पौधे बहुत ज्यादा ऊंचे नहीं होते हैं। आमतौर पर कई पारंपरिक किस्मों में पेड़ के काफी बड़े होने पर फल लगते हैं, लेकिन इन किस्मों में जड़ से लगभग दो बित्ता ऊंचाई होते ही तने पर फल आना शुरू हो जाता है। इस वजह से उत्पादकों को लंबे समय तक पौधे के विशाल होने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती और पैदावार चक्र तेजी से शुरू हो जाता है।
लागत और मुनाफे का गणित
व्यावसायिक स्तर पर खेती की योजना को लेकर अंबिका ने स्पष्ट किया कि यदि कोई किसान एक एकड़ खेत में पपीते के पौधे लगाता है, तो शुरुआती दौर से लेकर तैयार होने तक लगभग 1 से 1.5 लाख रुपये तक का कुल खर्च आता है। यदि खेत में नियमित सिंचाई, खाद और कीट प्रबंधन जैसे सभी कृषि कार्य समय पर किए जाएं और फसल का उत्पादन मजबूत रहे, तो किसान को 6 से 7 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा मिल सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अंतिम कमाई सीधे तौर पर फसल की कुल पैदावार, उत्पादन लागत और उस समय मंडी में मिलने वाले बाजार भाव पर टिकी होती है। बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से किसान के वास्तविक लाभ में बदलाव आ सकता है।
बुवाई का सही समय और जरूरी सावधानियां
पपीते की पौध लगाने के उपयुक्त मौसम के बारे में अंबिका ने बताया कि अक्टूबर का महीना इस काम की शुरुआत के लिए सबसे मुफीद माना जाता है। किसान दुर्गा पूजा के तुरंत बाद खेत की तैयारी कर रोपाई का काम शुरू कर सकते हैं। पपीते की व्यावसायिक खेती में कदम रखने से पहले किसानों को वीएनआर और ईस्ट वेस्ट किस्मों की वैज्ञानिक जानकारी जुटा लेनी चाहिए। इसके साथ ही अपने क्षेत्र की मिट्टी की जांच कराने और मौसम की अनुकूलता समझने के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से परामर्श लेना फसलों की सुरक्षा और बेहतर पैदावार के लिए बेहद फायदेमंद रहता है।



















