दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आसपास हर साल दिवाली के मौसम में धान की कटाई के साथ ही पराली जलाने और वायु प्रदूषण की बहस छिड़ जाती है। फरीदाबाद की मंडियों में इस समय नए धान की आवक शुरू हो गई है और आने वाले दिनों में फसल कटाई की रफ्तार और तेज होने वाली है। जब चारों तरफ खेतों में धुआं उठने की चिंताएं बढ़ रही हैं, तब हरियाणा के फरीदाबाद जिले में कई किसान पारंपरिक ढर्रे से अलग राह चुनकर पराली प्रबंधन की एक मिसाल पेश कर रहे हैं। ये किसान फसल अवशेष को समस्या या कचरा मानने के बजाय उससे अतिरिक्त आय पैदा कर रहे हैं और खेत की उर्वरता भी मजबूत कर रहे हैं।
हाथ से कटाई का तरीका और चारे से सीधी कमाई
फरीदाबाद के डीग गांव में बड़े पैमाने पर खेती करने वाले किसान कुंवरपाल पिछले कई वर्षों से अपने खेतों में पराली में आग लगाने से पूरी तरह परहेज कर रहे हैं। धान की फसल की कटाई वे मशीनों के स्थान पर अधिकांशतः मजदूरों से हाथ से करवाते हैं। हाथ से कटाई करवाने की इस प्रक्रिया में धान का डंठल और पुआल सुरक्षित बच जाता है, जो दुधारू पशुओं के लिए बेहतरीन सूखा चारा बनता है। कुंवरपाल का स्पष्ट मानना है कि जिस कृषि अवशेष को बेचकर किसान नकद आमदनी हासिल कर सकता है, उसे जलाकर राख कर देना पर्यावरण और किसान की जेब दोनों के लिए भारी नुकसान का सौदा है।
बाजार में धान के इस सूखे चारे की काफी अच्छी मांग रहती है। कुंवरपाल बताते हैं कि हाथ से कटाई के बाद बचने वाला धान का चारा करीब 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से आसानी से बिक जाता है। जो किसान पराली को बोझ समझकर माचिस दिखा देते हैं, वे इस चारे को संभालकर और डेयरी पालकों को बेचकर एक नई कमाई का जरिया बना सकते हैं। इस प्रकार बिना किसी प्रदूषण के किसान के हाथ में लागत निकालने के बाद भी सीधा मुनाफा पहुंचता है और पशुपालकों को पौष्टिक आहार मिल जाता है।
शुगर फ्री नीले आलू की पैदावार और प्राकृतिक खाद
कुंवरपाल केवल सामान्य फसलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इस क्षेत्र में शुगर फ्री नीले आलू की व्यावसायिक खेती के लिए भी जाने जाते हैं। वे कई वर्षों से इस किस्म के आलू की बुआई कर रहे हैं, जहां पराली उनके लिए खाद का काम करती है। धान की कटाई के बाद जमीन पर जो थोड़ा बहुत फसल अवशेष बचता है, उसे खेत की जुताई के दौरान मिट्टी में ही दबा दिया जाता है। यह अवशेष मिट्टी में मिलकर प्राकृतिक कंपोस्ट खाद की तरह काम करता है, जिससे अगली फसल के रूप में बोए जाने वाले शुगर फ्री नीले आलू की गुणवत्ता और पैदावार दोनों में भारी इजाफा होता है।
मिट्टी को मिलते हैं पोटाश और कैल्शियम के पोषक तत्व
फसल अवशेष को मिट्टी में मिलाने से खेत की भौतिक और रासायनिक संरचना में सकारात्मक सुधार आता है। जब धान के डंठल सड़कर मिट्टी में समाते हैं, तो खेत की मिट्टी को पोटाश और कैल्शियम जैसे जरूरी पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में प्राप्त होते हैं। इससे खेत की जुताई आसान हो जाती है और मिट्टी की जल धारण क्षमता भी बेहतर होती है। रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाने के साथ-साथ यह प्रक्रिया जमीन की जैविक सेहत को टिकाऊ बनाए रखती है। कुंवरपाल के अनुसार पराली में आग लगाने से खेत की उपजाऊ मिट्टी के मित्र कीट और पोषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते हैं, जिससे जमीन बंजर होने की ओर बढ़ती है।
खेत, पशु और किसान तीनों के लिए तिहरा लाभ
पराली का यह वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रबंधन तीन स्तरों पर फायदा पहुंचाता है। पहला लाभ जमीन को मिलता है, जिसे बिना रासायनिक खर्च के पोटाश और कैल्शियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व मिल जाते हैं। दूसरा लाभ दुधारू पशुओं को मिलता है, जिन्हें साल भर के लिए सस्ता और सुपाच्य सूखा चारा प्राप्त होता है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण फायदा खुद किसान को मिलता है, जो प्रति क्विंटल 400 से 500 रुपये की सीधी कमाई करने के साथ-साथ अगली फसल की बेहतर उपज से मुनाफा कमाता है। प्रदूषण फैलाने के आरोपों के बीच डीग गांव के किसान का यह तरीका अन्य किसानों को भी पराली जलाने से रोकने की व्यावहारिक प्रेरणा दे रहा है।



















