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गोबर से दीये और धूपबत्ती बनाकर फरीदाबाद की गौशाला ने शुरू की कमाई, घायल गायों की देखभाल के साथ मिला रोजगारहरियाणा
3 नव॰ 2026, 4:01 pm (7 मिनट पहले)· 0

गोबर से दीये और धूपबत्ती बनाकर फरीदाबाद की गौशाला ने शुरू की कमाई, घायल गायों की देखभाल के साथ मिला रोजगार

फरीदाबाद के लढ़ौली गांव में एक गौशाला सड़क हादसों में घायल और बेसहारा गायों का इलाज करने के साथ गोबर से दीये और धूपबत्ती बनाकर स्थानीय लोगों को रोजगार दे रही है।

त्योहारी सीजन में पूजा पाठ और दीपोत्सव को लेकर बाजार में गाय के गोबर से तैयार पूजन सामग्री की मांग तेजी से बढ़ रही है। फरीदाबाद जिले के लढ़ौली गांव में संचालित एक स्थानीय गौशाला ने इसी मांग को एक आत्मनिर्भर मॉडल में बदल दिया है। यहां सड़क हादसों का शिकार हुईं और बेसहारा गायों की देखरेख करने के साथ उनके गोबर से दीये, धूपबत्ती और हवन सामग्री तैयार की जा रही है। इस पहल की सबसे खास बात यह है कि उत्पादन के लिए बिजली पर निर्भर रहने के बजाय पूरी तरह मैनुअल यानी हाथों से चलने वाली मशीनों का प्रयोग किया जाता है, जिससे चार से पांच स्थानीय कामगारों को नियमित आजीविका भी मिल रही है।

बिना बिजली के मैनुअल मशीनों से उत्पादन

गौशाला परिसर में पूजन सामग्री तैयार करने के लिए विशेष सांचे और हाथ से चलने वाले उपकरण स्थापित किए गए हैं। तीन वर्षों से इस कार्य से जुड़े कामगार जगत के अनुसार, इन मशीनों के संचालन में किसी तरह की बिजली की आवश्यकता नहीं पड़ती। हाथों से संचालित होने के कारण बिजली बिल का खर्च पूरी तरह शून्य रहता है और कारीगरों को काम करने में किसी तकनीकी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता। इसके अलावा गौशाला में शुद्ध गाय का घी भी तैयार किया जाता है, जिससे पूरी उत्पादन प्रक्रिया एक ही परिसर के भीतर पूरी हो जाती है।

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दिल्ली के बाजारों से आ रहे ऑर्डर

दीवाली पर्व नजदीक आते ही लढ़ौली की इस गौशाला में बने उत्पादों की मांग फरीदाबाद की सीमाओं को पार कर चुकी है। राजधानी दिल्ली तक के खरीदार और व्यापारी यहां से धूपबत्ती, दीये और हवन सामग्री खरीदने के लिए थोक ऑर्डर दे रहे हैं। गोबर से बने इन पारंपरिक उत्पादों को पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है, जिसके चलते त्योहारी दिनों में इनकी बिक्री सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना बढ़ जाती है।

40 से 50 हजार रुपये के निवेश से शुरू हो सकता है स्वरोजगार

पशुपालकों के लिए इस मॉडल को एक अतिरिक्त आय का साधन बताते हुए जगत ने बताया कि इस पूरे सेटअप को शुरू करने के लिए भारी भरकम पूंजी की जरूरत नहीं होती। लगभग 40 से 50 हजार रुपये के शुरुआती खर्च में आवश्यक सांचे, हाथ से चलने वाली मशीनें और बुनियादी कच्चा माल जुटाकर कोई भी व्यक्ति यह कुटीर उद्योग शुरू कर सकता है। फरीदाबाद और आसपास के ग्रामीण इलाकों में ऐसे कई परिवार मौजूद हैं, जिनके पास 50 से 60 गायें हैं। इन पशुओं से रोजाना भारी मात्रा में गोबर निकलता है, जिसे अक्सर अनुपयोगी मानकर फेंक दिया जाता है या यूं ही छोड़ दिया जाता है। यदि ग्रामीण पशुपालक अपने घरों में छोटी मैनुअल यूनिट्स लगाएं, तो वे गोबर से मूल्यवान उत्पाद बनाकर स्थानीय बाजारों में बेच सकते हैं और अपने परिवार के लिए कमाई का नया रास्ता खोल सकते हैं।

घायल और लावारिस गायों को मिला आश्रय

इस उद्यम का मानवीय पहलू गायों के पुनर्वास और उपचार से जुड़ा है। वर्तमान में इस गौशाला में 8 से 9 गायों की देखभाल की जा रही है। इनमें से अधिकांश वे गायें हैं, जो दूध देना बंद करने के बाद मालिकों द्वारा छोड़ दी गई थीं और सड़कों पर भटकते हुए वाहनों की चपेट में आकर गंभीर रूप से जख्मी हो गई थीं। गौशाला में ऐसी असहाय गायों को सुरक्षित शरण देकर उनका नियमित इलाज, चारा और पानी सुनिश्चित किया जाता है। सेवा और स्वरोजगार के इस अनूठे संगम से बेसहारा पशुओं की सुरक्षा भी हो रही है और स्थानीय स्तर पर काम के अवसर भी बन रहे हैं।

सवाल-जवाब

फरीदाबाद के लढ़ौली गांव की गौशाला में गोबर से क्या-क्या उत्पाद बनाए जा रहे हैं?
इस गौशाला में गाय के गोबर से दीये, धूपबत्ती और हवन सामग्री बनाई जाती है, साथ ही यहां गाय का शुद्ध घी भी तैयार किया जाता है।
इन उत्पादों को तैयार करने के लिए किस प्रकार की मशीनों का इस्तेमाल होता है?
यहां बिजली की मशीनों के बजाय हाथ से चलने वाली मैनुअल मशीनों और सांचों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे बिजली का कोई खर्च नहीं आता।
इस तरह का कुटीर उद्योग शुरू करने में कितनी लागत आती है?
हाथ से चलने वाली जरूरी मशीनें और सांचे खरीदकर इस काम को लगभग 40,000 से 50,000 रुपये के खर्च में शुरू किया जा सकता है।
इस गौशाला में वर्तमान में कितनी गायें हैं और वे किस स्थिति में लाई गई थीं?
गौशाला में फिलहाल 8 से 9 गायें हैं, जिनमें से ज्यादातर वे हैं जो सड़कों पर हादसों का शिकार होकर घायल अवस्था में यहां लाई गई थीं।
तैयार सामान के लिए मुख्य रूप से कहां से ऑर्डर मिल रहे हैं?
दीवाली के त्योहारी सीजन के चलते फरीदाबाद के स्थानीय बाजारों के अलावा राजधानी दिल्ली से भी इन उत्पादों के थोक ऑर्डर आ रहे हैं।
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