देशभर में दीपावली के पावन पर्व पर धन की देवी मां लक्ष्मी की आराधना की जाती है, परंतु राजस्थान के बीकानेर में इस पूजा का रंग कुछ अलग और बेहद अनूठा नजर आता है। बीकानेर के घरों में लक्ष्मी पूजन की थाली और वेदी पर मतीरा अनिवार्य रूप से नजर आता है। यहां महिलाएं दीपावली पर मतीरे की विशेष विधि-विधान से पूजा करती हैं और इसे प्रमुख मौसमी फल यानी ऋतुफल मानकर देवी-देवताओं को सादर अर्पित करती हैं। थार के तपते रेतीले धोरों के बीच पैदा होने वाला यह फल आज सिर्फ खाने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह बीकानेर की ऐतिहासिक संस्कृति, लोक विरासत और धार्मिक आस्था का एक अटूट पहचान-चिह्न बन चुका है।
दीपावली के आगमन के साथ गांवों से बाजारों तक मतीरे की धूम
दीपावली के पर्व के समय बीकानेर के ग्रामीण अंचलों में मतीरे की बंपर पैदावार तैयार होती है। यही मुख्य कारण है कि त्योहार आते ही स्थानीय फल मंडियों और चौराहों पर मतीरे के बड़े-बड़े ढेर लग जाते हैं और इनकी आवक बहुत तेजी से बढ़ती है। पुराने समय की जीवनशैली को साझा करते हुए स्थानीय निवासियों का कहना है कि दशकों पहले इस मौसमी बदलाव के दौरान रेगिस्तानी इलाकों में अन्य फल सरलता से उपलब्ध नहीं हो पाते थे। बाहरी राज्यों या दूर-दराज के शहरों से फलों की आपूर्ति न के बराबर होती थी। ऐसी भौगोलिक परिस्थिति में स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाला मतीरा ही पूजन के लिए एकमात्र और सबसे सहज उपलब्ध फल था। लिहाजा लोगों ने इसे ऋतुफल के रूप में पूजा में शामिल करना शुरू किया। धीरे-धीरे इस व्यावहारिक जरूरत ने एक पवित्र धार्मिक परंपरा का रूप ले लिया, जिसे आज की पीढ़ी भी निष्ठापूर्वक आगे बढ़ा रही है।
चंद्रमा से जुड़ाव और अमृत तत्व की पौराणिक मान्यता
स्थानीय जानकार किशन नाथ ने इस अनोखी परंपरा के पीछे जुड़ी मान्यताओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि दीपावली पर मतीरे की विशेष खरीदारी और उसकी पूजा करने की जड़ें पुरानी लोक आस्थाओं में गहरी जमी हुई हैं। प्राचीन काल से ही इस ऋतु में बीकानेर की धरती पर मतीरा ही सबसे प्रमुख और ताजी उपज के रूप में सामने आता रहा है। धार्मिक व ज्योतिषीय दृष्टिकोण से मतीरे को चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है। लोक विश्वास के अनुसार मतीरे के भीतर अमृत तत्व को ग्रहण करने और उसे संजोए रखने की विशिष्ट प्राकृतिक क्षमता होती है। यही वजह है कि दीपावली की रात्रि को होने वाले विशेष महालक्ष्मी पूजन में मतीरे को अत्यंत प्रतिष्ठित स्थान प्रदान किया गया है।
राजासर समेत ग्रामीण इलाकों में खेती और फसल की किस्में
किशन नाथ के अनुसार, बीकानेर जिले के राजासर समेत कई ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर किसान मतीरे की पारंपरिक खेती करते हैं। यहां के किसान मतीरे के बीजों को अपने खेतों में अकेली फसल के बजाय अन्य खरीफ फसलों के साथ मिलाकर बोते हैं। इस मौसम में बीकानेर की रेतीली जमीन पर मतीरे की बहुत शानदार पैदावार देखने को मिलती है। खेतों में तैयार होने वाले इन रसीले मतीरों की आपूर्ति केवल बीकानेर के स्थानीय बाजारों तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि इन्हें आसपास के कई कस्बों और अन्य बड़े शहरों की मंडियों में भी व्यापार के लिए भेजा जाता है। इस बार भी बाजारों में मतीरे की अलग-अलग बेहतरीन किस्में बिकने के लिए पहुंच चुकी हैं।
फसल संयोजन से तय होती है मिठास, दो माह तक बना रहता है बाजार
मतीरे का स्वाद और उसकी प्राकृतिक मिठास इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे खेत में किस फसल के साथ उगाया गया है। स्थानीय काश्तकारों का अनुभव बताता है कि जब मतीरे को मोठ और बाजरे की फसलों के साथ सह-फसल के रूप में उगाया जाता है, तो वह ग्वार की फसल के साथ उगाए गए मतीरे की तुलना में कहीं अधिक मीठा और स्वादिष्ट होता है। इसी वजह से मोठ और बाजरे के खेतों से निकलने वाले मतीरों की मांग ग्राहकों के बीच सबसे ज्यादा रहती है। दीपावली के दिनों में इनकी बिक्री चरम पर पहुंच जाती है। पर्व के बाद भी लगभग दो महीने तक बाजारों में मतीरे की नियमित उपलब्धता बनी रहती है और लोग बड़े चाव से इसका आनंद लेते हैं।
षोडशोपचार पूजन पद्धति और मतीरे का अटूट धार्मिक महत्व
सनातन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी-देवताओं की उपासना में षोडशोपचार पूजा पद्धति का विशेष महत्व माना गया है। इस पारम्परिक पद्धति में सोलह विशिष्ट सामग्रियों के जरिए देवताओं का विधिवत सत्कार व पूजन किया जाता है। इस अनुष्ठान में भगवान को अर्पित किए जाने वाले नैवेद्य के साथ-साथ वर्तमान ऋतु में पैदा होने वाले ताजे फलों को चढ़ाने का स्पष्ट शास्त्रीय विधान है। बीकानेर क्षेत्र में मतीरे को इसी शास्त्रोक्त व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा मानकर पूजा जाता है। इसी पावन संयोजन के कारण दीपावली के पावन अवसर पर मतीरा बीकानेर में केवल एक साधारण फल न रहकर जनमानस की आस्था, लोक जीवन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग बन चुका है।



















