गुरुग्राम के सेक्टर-65 स्थित अति-प्रतिष्ठित ट्रंप टावर्स में करोड़ों रुपये निवेश कर आशियाना खरीदने वाले एक परिवार को बुनियादी सुविधाओं के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी। एविएशन कारोबार से जुड़े 42 वर्षीय वरुण सुहाग ने इस लग्जरी आवासीय परियोजना के टॉवर सी में साल 2018 के दौरान 6.68 करोड़ रुपये की लागत से एक फ्लैट बुक कराया था। खरीदार ने मध्य 2025 तक फ्लैट की पूरी रकम भी अदा कर दी थी। इसके बावजूद जब परिवार अक्टूबर 2026 में अपने नए घर में रहने पहुंचा, तो उन्हें ऐसी अव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का सामना करना पड़ा जिसने प्रोजेक्ट के रखरखाव प्रबंधन और बिल्डर एम3एम के बड़े-बड़े दावों पर सवाल खड़े कर दिए।
लिफ्ट का बटन बंद और परिसर में आवाजाही पर पहरा
वरुण सुहाग ने 27 अगस्त को 36वीं मंजिल पर मौजूद अपने अपार्टमेंट का कब्जा हासिल किया था। उन्हें उम्मीद थी कि इतने महंगे प्रोजेक्ट में जीवन बेहद सुगम और सुखद रहेगा, लेकिन कब्जा मिलने के बाद के दो महीने केवल मेंटेनेंस प्रबंधन और बिल्डर के दफ्तरों के चक्कर काटते हुए बीते। फ्लैट मालिक का आरोप है कि उनकी 36वीं मंजिल पर लिफ्ट का कॉल बटन ही पूरी तरह डीएक्टिवेट कर दिया गया था। उस पूरे टॉवर में कुल दो लिफ्ट थीं, जिनमें एक सर्विस लिफ्ट भी शामिल थी। दोनों लिफ्ट केवल सुरक्षा गार्ड के जरिए ही संचालित की जा रही थीं और परिवार अपने फ्लोर से सीधे लिफ्ट को बुलाने में असमर्थ था।
इस असहज स्थिति से परेशान होकर उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि उन्हें बिल्डर और प्रबंधन द्वारा नजरबंद जैसी स्थिति में रखा गया है। वरुण सुहाग की इस ऑनलाइन शिकायत को 19 लाख से अधिक बार देखा गया। सोशल मीडिया पर मामला गरमाने और तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने के बाद आखिरकार प्रबंधन हरकत में आया और लिफ्ट सेवा को बहाल किया गया।
डेढ़ साल की देरी, अतिरिक्त खर्च और शिफ्टिंग का विवाद
यह पूरा प्रोजेक्ट निर्धारित समय से लगभग डेढ़ साल की देरी से बनकर तैयार हुआ था। निर्माण में हुई इस लंबी देरी के खिलाफ वरुण सुहाग ने पहले ही रेरा (RERA) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। जब फ्लैट का कब्जा सौंपा गया, तो वह सामान्य रूप से रहने लायक स्थिति में नहीं था। अपार्टमेंट के भीतर फॉल्स सीलिंग तक नहीं बनाई गई थी, जिसके चलते खरीदार को अपनी जेब से 10 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च करके घर को रहने योग्य बनाना पड़ा।
वरुण का कहना है कि जब उन्होंने इन अधूरी सुविधाओं और कमियों के बारे में बिल्डर से बात की, तो उन्हें बेहद गैर-जिम्मेदाराना लहजे में जवाब दिया गया कि फ्लैट लेना है तो लो, वरना छोड़ दो। शिफ्टिंग के दिन भी परिवार को भारी मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा। उनके सोफे और अन्य फर्नीचर से लदे ट्रक को आवासीय सोसाइटी के मुख्य द्वार से अंदर दाखिल होने की अनुमति नहीं दी गई। सुरक्षाकर्मियों द्वारा सामान अंदर न ले जाने देने की वजह से पूरे परिवार को अपने ही नए घर में सोफे पर लेटकर पूरी रात बितानी पड़ी।
विशाल खिड़कियों से निजता का संकट और पर्दों पर रोक
इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला पहलू फ्लैट की निजता से जुड़ा हुआ था। 36वीं मंजिल पर स्थित इस फ्लैट में बड़े आकार की कांच की खिड़कियां लगी हुई हैं। बाहर से फ्लैट के अंदरूनी हिस्से साफ दिखाई देते हैं, लेकिन सोसाइटी प्रबंधन ने मजदूरों को अंदर जाकर पर्दे लगाने की इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया। प्रबंधन के इस अड़ियल रुख के कारण फ्लैट के कमरों में पर्दे नहीं लग पाए।
वरुण ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए बताया कि पर्दा लगाने वाले कारीगर को भीतर न आने देने की वजह से उनके बेडरूम और बाथरूम बाहर से पूरी दुनिया को दिखाई दे रहे हैं। बगल वाले टॉवर में रहने वाले लोग उनके नहाने तक के दृश्य देख सकते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह समस्या केवल उनके साथ ही नहीं है, बल्कि उनकी बहन जो ठीक उनकी ऊपरी मंजिल पर स्थित फ्लैट की मालकिन हैं, वह भी इसी तरह की प्रशासनिक मनमानी और अव्यवस्था का सामना कर रही हैं।



















