अदालतों के पुराने स्टांप पेपर पर उकेरी जा रही कला, दिल्ली हाट में जयपुर के महेश प्रजापति की पेंटिंग्स बिखेर रही हैं जादूदीवाली पर बिना महंगे खर्च के दिखना है स्टाइलिश, तो अपनाएं ये 7 आसान फैशन टिप्सअमेज़न की गुलाबी डॉल्फिन से जुड़े हैरान करने वाले रहस्यधनतेरस 2026: जानिए इस दिन कितने दीपक जलाना होता है सबसे फलदायी और क्या है सही समयEdifier W800BT Pro रिव्यू: बजट मूल्य में मिलने वाले दमदार एक्टिव नॉइज कैंसिलिंग वायरलेस ओवर-इयर हेडफोनमकर राशिफल 7 नवंबर 2026: मार्गी गुरु निजी आर्थिक मामलों को सामने लाएगानिमाड़ में दिवाली की रौनक, घर पर ऐसे बनाएं पारंपरिक मावे वाली गुजियाउर्दा ट्रेन हादसे के बाद स्पेनिश रेलवे अधिकारियों पर यूरोपीय संघ की धोखाधड़ी की जांच शुरूअमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप पर महाभियोग लाने की तैयारी, मिडटर्म चुनाव में हार के बाद बढ़ीं मुश्किलेंमीनाक्षी शेषाद्रि ने तमिल गाने पर किया शानदार डांस, गुलाबी साड़ी में बिखेरा जलवा
पराली जलाने और प्रदूषण का टूटेगा चक्र, धान के अवशेष में आलू की खेती से किसानों की होगी बंपर कमाईहरियाणा
17 सित॰ 2026, 10:06 am (51 दिन पहले)· 6

पराली जलाने और प्रदूषण का टूटेगा चक्र, धान के अवशेष में आलू की खेती से किसानों की होगी बंपर कमाई

धान कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या से निपटने का नया रास्ता निकल आया है। वैज्ञानिक तकनीक के जरिए अब किसान पराली के बीच आलू की बंपर फसल उगा सकेंगे, जिससे प्रदूषण कम होने के साथ पानी की भी भारी बचत होगी।

हर साल धान की कटाई के बाद पंजाब और हरियाणा के खेतों में पराली जलाई जाती है, जिसके कारण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है। इस धुएं से पूरे क्षेत्र में जहरीली धुंध की चादर छा जाती है और लोगों को सांस लेने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। हालांकि इस गंभीर समस्या से निजात पाने के लिए एक वैज्ञानिक समाधान सामने आ चुका है। इस नई कृषि तकनीक से न केवल पराली जलाने की मजबूरी खत्म होगी, बल्कि किसानों के खेतों में आलू की फसल भी बंपर रूप से लहलहाएगी।

पराली में आलू उगाने का अनूठा तरीका और फायदे

पंजाब और हरियाणा के अन्नदाताओं के लिए यह एक बेहद राहत भरी खबर है कि वे अब धान के अवशेषों में आग लगाने के बजाय सीधे उनमें आलू की खेती कर सकते हैं। इस अनोखी विधि से बिना मिट्टी के संपर्क में आए पराली के अंदर ही आलू उगते हैं, जिससे खेती में लगने वाले पानी की खपत में 50 प्रतिशत तक की भारी बचत होती है। इसके अलावा पारंपरिक खेती की तुलना में आलू की कुल पैदावार में भी 25 से 50 फीसदी तक की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जाती है, जिससे किसानों की आय में इजाफा होगा।

ये भी पढ़ें

बिना किसी स्प्रे के महीनों सुरक्षित रहेगा उत्पाद

भुवनेश्वर स्थित केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान की विशेषज्ञ डॉक्टर सुकांता कुमार षडंगी का दावा है कि इस विशेष तकनीक के तहत पराली में उगाए गए आलू पर किसी भी तरह के हानिकारक रासायनिक स्प्रे की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसके बावजूद यह आलू बिना खराब हुए 4 से 6 महीने तक पूरी तरह सुरक्षित बना रहता है। आने वाले समय में पंजाब और हरियाणा के किसानों के लिए पराली कोई सिरदर्द या मजबूरी नहीं, बल्कि अतिरिक्त कमाई का एक शानदार और मुनाफे का सौदा साबित होने जा रही है।

शोध और संस्थान की भूमिका

यह महत्वपूर्ण कृषि खोज भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत आने वाले सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर वूमेन इन एग्रीकल्चर भुवनेश्वर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर सुकांता कुमार षडंगी द्वारा की गई है। डॉक्टर सुकांता इस संस्थान के महिलाओं के लिए कृषि प्रौद्योगिकी विभाग के हेड डिवीजन में प्रिंसिपल साइंटिस्ट के पद पर कार्यरत हैं। पराली के इस सफल और उपयोगी उपयोग से जुड़ी जानकारी उन्होंने भुवनेश्वर में आयोजित पीआईबी चंडीगढ़ के मीडिया एक्सचेंज कार्यक्रम के दौरान साझा की। उन्होंने बताया कि इस अभिनव शोध के लिए देश के विभिन्न राज्यों में जमीनी स्तर पर कार्य किया गया है, जिसके परिणाम बेहद सकारात्मक और उत्साहजनक रहे हैं।

पर्यावरण संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता

इस आधुनिक तकनीक को अपनाने से न केवल पर्यावरण को जहरीले प्रदूषण से मुक्त करने में मदद मिलती है, बल्कि इससे खेतों की मिट्टी की उपजाऊ क्षमता में भी सुधार देखने को मिल रहा है। भुवनेश्वर स्थित केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान देश का इकलौता ऐसा प्रमुख संस्थान है जो कृषि क्षेत्र में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की दिशा में लगातार कार्य कर रहा है। देश भर में महिलाओं की कृषि में सहभागिता को मजबूत करने के लिए इस संस्थान के कुल 12 राज्यों में 13 शोध केंद्र सुचारू रूप से संचालित किए जा रहे हैं। पंजाब के लुधियाना में स्थित पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में भी इनका एक केंद्र स्थापित है, जहां धान की कटाई के तुरंत बाद आलू उगाने के सफल प्रयोग किए जा रहे हैं।

सवाल-जवाब

पराली में आलू उगाने की यह खोज किसने की है?
यह खोज डॉक्टर सुकांता कुमार षडंगी ने की है, जो भुवनेश्वर स्थित केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान में प्रिंसिपल साइंटिस्ट हैं।
पराली में आलू उगाने से पानी की कितनी बचत होती है?
इस तकनीक से खेती करने पर पानी की खपत में 50 प्रतिशत तक की कमी आती है।
पराली में उगे आलू की पैदावार पर क्या असर पड़ता है?
पारंपरिक खेती की तुलना में इस विधि से आलू की पैदावार 25 से 50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
पराली में उगाया गया आलू बिना स्प्रे के कितने समय तक सुरक्षित रहता है?
यह आलू बिना किसी रासायनिक स्प्रे के 4 से 6 महीने तक खराब नहीं होता है।
इस तकनीक का परीक्षण किन राज्यों या केंद्रों पर किया गया है?
इस शोध के लिए विभिन्न राज्यों में काम किया गया है और पंजाब की लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में भी इसका सेंटर काम कर रहा है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·50 दिन पहले

कृषि अवशेष और वायु प्रदूषण का मुद्दा केवल एक तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि राज्यों के बीच अंतर-सरकारी समन्वय और जन-नीति का संवेदनशील विषय है। ICAR का यह नवाचार निस्संदेह सराहनीय है, लेकिन इसे प्रयोगशाला से निकालकर पंजाब और हरियाणा के किसानों तक व्यापक स्तर पर पहुँचाना सरकार की प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगा। यदि नीति निर्माण के स्तर पर किसानों को इस विधि को अपनाने के लिए उचित प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता दी जाए, तो यह न केवल दिल्ली-NCR के प्रदूषण संकट को हल कर सकता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में एक बड़ा नीतिगत कदम साबित होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·50 दिन पहले

अर्जुन की बात आगे बढ़ाते हुए, आर्थिक और बाज़ार के दृष्टिकोण से यह तकनीक कृषि लागत घटाने और ग्रामीण आय बढ़ाने का एक बड़ा अवसर है। बिना रसायनों के 4 से 6 महीने की शेल्फ लाइफ मिलना खाद्य प्रसंस्करण और रिटेल सप्लाई चेन के लिए काफी आकर्षक है। हालांकि, इसे व्यावसायिक स्तर पर सफल बनाने के लिए एग्री-स्टार्टअप्स, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग कंपनियों के साथ सीधा बाज़ार जुड़ाव स्थापित करना होगा। यदि किसानों को इस उपज का सही बाज़ार मूल्य और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट मिलता है, तो यह नवाचार भारत के एग्री-टेक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ढांचा बदल सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·50 दिन पहले

यह तकनीकी समाधान केवल दिल्ली-एनसीआर की सर्दियों की आबोहवा सुधारने तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों जैसे गौतम बुद्ध नगर और बुलंदशहर के किसानों के लिए भी एक व्यावहारिक मॉडल बन सकता है, जहाँ हर साल धान कटाई के बाद प्रशासनिक सख्ती और मुकदमों का सामना करना पड़ता है। यदि राज्य सरकारें इस मॉडल को जमीनी स्तर पर कृषि मेलों और स्थानीय प्रसार शिक्षा के माध्यम से किसानों तक पहुँचाएँ, तो पराली प्रबंधन पर होने वाले भारी प्रशासनिक खर्च को टिकाऊ आजीविका में बदला जा सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·50 दिन पहले

यह वैज्ञानिक नवाचार केवल कृषि विज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आपराधिक न्याय और प्रवर्तन एजेंसियों के काम से है। हर साल पराली जलाने के मामलों में किसानों पर दर्ज होने वाली एफआईआर, दंडात्मक कार्रवाई और अदालतों में लंबित कानूनी विवादों पर इससे विराम लग सकता है। जब किसानों को कचरा जलाने की मजबूरी के बजाय आर्थिक लाभ मिलने लगेगा, तो स्वतः ही कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधरेगी और पुलिस-प्रशासन का बल अनावश्यक मुकदमों की बजाय वास्तविक अपराध रोकने में लगेगा।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp