हरियाणा के फरीदाबाद जिले में ग्रामीण अंचल के विद्यार्थियों को सुलभ और उच्च गुणवत्ता वाली नर्सिंग शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से शासन स्तर पर दो बड़े संस्थानों का निर्माण कराया गया था। दयालपुर और अरुआ गांवों में स्थापित इन दोनों सरकारी नर्सिंग कॉलेजों की इमारतें पूरी तरह बनकर तैयार हैं और इनका उद्घाटन भी किया जा चुका है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इन परिसरों में आज तक कक्षाओं का संचालन शुरू नहीं हो सका है। भारी भरकम बजट खर्च होने के बाद भी ताले लटके रहने के कारण क्षेत्र के युवाओं को आज भी नर्सिंग की पढ़ाई के लिए अन्य दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित संस्थानों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों में गहरी निराशा का माहौल बना हुआ है।
लगभग 93 करोड़ रुपये की लागत और बुनियादी ढांचा
दयालपुर और अरुआ दोनों गांवों में तैयार किए गए इन सरकारी नर्सिंग कॉलेजों के निर्माण पर कुल मिलाकर लगभग 93 करोड़ रुपये की राशि खर्च की गई है। वित्तीय विवरणों के अनुसार दयालपुर गांव में निर्मित नर्सिंग कॉलेज के भवन पर लगभग 45 करोड़ रुपये की लागत आई है। इस परिसर के भीतर करीब 48 कमरों और छह अलग-अलग भवनों का निर्माण किया गया है। इसके अलावा विद्यार्थियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए यहां लगभग 208 छात्रों के रहने के लिए सुसज्जित हॉस्टल की व्यवस्था भी तैयार की गई है। वहीं दूसरी ओर अरुआ गांव में बने नर्सिंग कॉलेज के निर्माण पर लगभग 47.44 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इन दोनों परिसरों में आधुनिक बुनियादी ढांचा और शिक्षण कार्य से जुड़ी तमाम भौतिक सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद शैक्षणिक गतिविधियां पूरी तरह ठप पड़ी हैं।
ग्रामीणों का गुस्सा और प्रशासनिक नाकामी पर सवाल
स्थानीय निवासियों का कहना है कि सरकार की मंशा और नीति ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को आगे बढ़ाने की थी, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती और अधिकारियों की लापरवाही के कारण इस योजना का जमीनी लाभ छात्रों तक नहीं पहुंच पा रहा है। दयालपुर गांव के निवासी पदम सिंह का कहना है कि सरकार ने ग्रामीण बच्चों के विकास के लिए यह शानदार कदम उठाया था जिससे आसपास के करीब 25 गांवों के युवाओं को सीधा फायदा मिल सकता था। कॉलेज के निर्माण और उद्घाटन को लगभग एक साल बीत चुका है, लेकिन इसके बाद भी कक्षाएं शुरू न होना पूरी तरह से अधिकारियों की नाकामी को दर्शाता है। जब इमारतें पूरी तरह तैयार हैं और उद्घाटन भी संपन्न हो चुका है, तब सत्र शुरू करने में हो रही यह लंबी देरी समझ से परे है। पदम सिंह ने मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से इस मामले में हस्तक्षेप करने और दयालपुर कॉलेज को अविलंब शुरू कराने की अपील की है ताकि विद्यार्थियों का बहुमूल्य समय खराब होने से बचाया जा सके।
स्थानीय बच्चों के लिए आरक्षण और प्राथमिकता की मांग
दयालपुर गांव के एक अन्य निवासी मनोज कुमार ने भी कॉलेज के बंद पड़े रहने पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। उनका मानना है कि इस संस्थान को बिना किसी और विलंब के तुरंत संचालित किया जाना चाहिए। चूंकि कॉलेज के निर्माण के लिए ग्राम पंचायत और स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी जमीन दी थी, इसलिए गांव के लोगों की यह प्रबल उम्मीद है कि संस्थान के शुरू होने पर स्थानीय युवाओं को इसका पूरा लाभ मिलना चाहिए। ग्रामीणों ने मांग की है कि जिस तरह गांव की जमीन इस शैक्षणिक संस्थान के लिए ली गई है, उसी प्रकार यहां के बच्चों के लिए स्थानीय कोटा या आरक्षण जैसी कोई व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके साथ ही कॉलेज संचालन से जुड़े रोजगार के अवसरों और स्थानीय बच्चों की पढ़ाई में प्राथमिक अधिकार की भी मांग उठाई गई है, ताकि जिन परिवारों ने अपनी जमीनें सौंपी हैं, उनके बच्चे दूर-दराज के महंगे कॉलेजों में धक्के खाने को मजबूर न हों।
वर्ष 2018 की मंजूरी से लेकर वर्तमान स्थिति तक का सफर
इस पूरे प्रोजेक्ट की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए दयालपुर के निवासी पवन ने बताया कि हरियाणा सरकार ने वर्ष 2018 में इस महत्वपूर्ण नर्सिंग कॉलेज के निर्माण को अपनी मंजूरी दी थी। इसके पश्चात वर्ष 2019 में इस संस्थान की नींव रखी गई और लंबी निर्माण प्रक्रिया के बाद वर्ष 2025 तक कॉलेज की इमारत पूरी तरह बनकर तैयार हो गई। जब सरकार ने विकास कार्यों पर करोड़ों रुपये का भारी भरकम बजट खर्च किया है और स्थानीय स्तर पर ग्रामीणों की जमीन का अधिग्रहण किया गया है, तब इस प्रकार की रुकावटें व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान लगाती हैं। जिन विद्यार्थियों को आज से दो साल पहले ही अपनी पढ़ाई शुरू कर देनी चाहिए थी, उनका भविष्य अंधकार में जा रहा है। यदि इन संस्थानों को शुरू होने में अभी और कुछ वर्ष लग गए, तो सरकारी कॉलेजों के भरोसे बैठे इन मेधावी बच्चों का शैक्षणिक करियर गंभीर संकट में पड़ जाएगा।
विभागों के बीच फंसी टेकओवर की प्रक्रिया
इन तमाम परिसरों के तैयार होने के बावजूद शैक्षणिक कार्य शुरू न होने की मुख्य वजह प्रशासनिक और विभागीय स्तर पर टेकओवर की प्रक्रिया का अधूरा रहना है। राज्य मंत्री राजेश नागर का इस विषय पर कहना है कि यह संस्थान किस स्तर पर लंबित चल रहा है, इसकी पूरी जानकारी जुटाई जा रही है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि इस मामले में मुख्यमंत्री से उच्च स्तर पर बातचीत करके दोनों संस्थानों में यथाशीघ्र कक्षाएं शुरू कराने के प्रयास किए जाएंगे। दूसरी ओर ग्रामीणों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि यदि सरकार और संबंधित विभाग थोड़ा सा भी गंभीर रुख अपनाएं और समय रहते आवश्यक कागजी व प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी कर लें, तो इन करोड़ों की लागत से तैयार भवनों का उपयोग तुरंत शुरू हो सकता है।
आसपास के दर्जनों गांवों के विद्यार्थियों को मिलेगा लाभ
दयालपुर और अरुआ के इन सरकारी नर्सिंग कॉलेजों के शुरू होने से न केवल इन दोनों गांवों बल्कि आसपास के दर्जनों ग्रामीण इलाकों के विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खुल जाएंगे। अरुआ कॉलेज के संचालन से मुख्य रूप से साहूपुरा, फैजपुर खादर, शाहजहांपुर, चांदपुर, इमामुद्दीनपुर, मोठूका, कोराली और छायंसा जैसे तमाम गांवों के बच्चों को आवागमन की सुविधा के साथ सस्ती और बेहतर नर्सिंग शिक्षा का लाभ मिल सकेगा। ग्रामीण युवाओं का भविष्य संवारने के उद्देश्य से खड़े किए गए इन भवनों को अब प्रशासनिक लालफीताशाही से मुक्त कराने की पुरजोर मांग उठ रही है ताकि सरकारी संसाधनों का सदुपयोग सही समय पर हो सके।





















