पूरे दिन की भागदौड़ के बाद जब बदन पूरी तरह टूट रहा होता है और आंखें भारी लगने लगती हैं, तब भी बिस्तर पर लेटते ही कई लोगों की नींद अचानक उड़ जाती है। करवटें बदलते हुए घंटों छत को ताकना एक बेहद आम अनुभव बन चुका है। आमतौर पर लोग इसे केवल दिनभर की मानसिक थकान या तनाव मान लेते हैं, लेकिन इसके पीछे इंसानी दिमाग और शरीर का एक गहरा जैविक विज्ञान छिपा होता है। शरीर में स्लीप प्रेशर, सर्केडियन रिदम और दिमाग की अत्यधिक सक्रियता का आपस में तालमेल बिगड़ने पर यह स्थिति पैदा होती है।
स्लीप प्रेशर और दिमाग के केमिकल का गणित
नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, इंसानी जिस्म में नींद के पूरे चक्र को मुख्य रूप से दो तंत्र संचालित करते हैं। इनमें से पहला तंत्र स्लीप प्रेशर कहलाता है। हम दिनभर जितनी देर तक जागते रहते हैं, दिमाग में यह स्लीप प्रेशर उतना ही गहरा होता जाता है। इस प्रक्रिया में दिमाग के भीतर बनने वाला एक खास केमिकल एडेनोसिन सबसे अहम भूमिका अदा करता है। जैसे-जैसे जागने के घंटे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे एडेनोसिन का स्तर बढ़ता चला जाता है, जो दिमाग को लगातार यह संदेश देता है कि अब शरीर को आराम और गहरी नींद की सख्त जरूरत है।
सर्केडियन रिदम और बॉडी क्लॉक का असर
नींद को संचालित करने वाला दूसरा प्रमुख सिस्टम सर्केडियन रिदम है। यह मानव शरीर की लगभग 24 घंटे की एक आंतरिक प्राकृतिक घड़ी होती है। यह घड़ी इस बात का नियमन करती है कि हमें कब पूरी तरह चौकन्ना और सक्रिय रहना है तथा कब हमें सुस्ती या नींद का अहसास होना चाहिए। यही कारण है कि केवल मांसपेशियों या जिस्म की थकान गहरी नींद लाने के लिए काफी नहीं होती। यदि आपकी आंतरिक बॉडी क्लॉक के मुताबिक आपके सोने का तय चक्र अभी नहीं बना है, तो भारी शारीरिक थकान के बावजूद आपका दिमाग जागता रहेगा और नींद आने में काफी वक्त लग सकता है।
स्क्रीन की कृत्रिम रोशनी और मेलाटोनिन चक्र
रात के समय स्मार्टफोन, टैबलेट या टीवी स्क्रीन का इस्तेमाल करने की आदत इस परेशानी को और अधिक गंभीर बना देती है। शाम ढलने के बाद वातावरण में मौजूद तेज आर्टिफिशियल लाइट शरीर के प्राकृतिक स्लीप-वेक चक्र में दखल देती है। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, शाम और रात के वक्त अत्यधिक रोशनी दिमाग से निकलने वाले मेलाटोनिन हार्मोन के सामान्य रिसाव को बाधित कर देती है। मेलाटोनिन नींद को प्रेरित करने वाला कुदरती हार्मोन है, और स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी की वजह से इसका स्तर प्रभावित होने पर इंसान को सोने में भारी कठिनाई होती है।
चिंता, कैफीन और क्रॉनिक इंसोम्निया के लक्षण
यदि शरीर थकावट महसूस कर रहा हो लेकिन मन लगातार विचारों में उलझा रहे, तो सोने की कोशिश नाकाम हो सकती है। करियर, रिश्तों, आर्थिक स्थिति या भविष्य से जुड़ा तनाव इंसोम्निया के खतरे को काफी बढ़ा देता है। यहां तक कि इस बात को लेकर बार-बार परेशान होना कि आज रात नींद आएगी या नहीं, समस्या को और पेचीदा बना देता है। इसके अतिरिक्त, देर शाम चाय या कॉफी पीने से उसमें मौजूद कैफीन दिमाग में एडेनोसिन के असर को ब्लॉक कर देता है, जिससे शरीर को सही समय पर स्लीप प्रेशर का अहसास नहीं हो पाता। रोजाना अलग-अलग समय पर बिस्तर पर जाना, दिन के समय लंबी झपकी लेना और देर रात तक गैजेट्स चलाना भी इस दिक्कत को बढ़ाता है। अगर ऐसा कभी-कभार होता है तो यह सामान्य है, लेकिन अगर हफ्ते में कम से कम 3 रातें सोने में दिक्कत हो और यह स्थिति लगातार 3 महीने या उससे अधिक समय तक बनी रहे, तो इसे क्रॉनिक इंसोम्निया माना जाता है और ऐसी स्थिति में चिकित्सीय परामर्श लेना जरूरी होता है।



















