मानव शरीर के भीतर रक्त संचार का संचालन करने वाला हृदय जब अपनी गति खो बैठता है, तब जिंदगी का सफर भी अचानक थम जाता है। आज के दौर की भागदौड़ और बदलती दिनचर्या ने इस महत्वपूर्ण अंग पर अभूतपूर्व दबाव पैदा कर दिया है। आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में प्रतिवर्ष तकरीबन 30 लाख व्यक्ति हृदय संबंधी विकारों के चलते दम तोड़ देते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष 50 से 60 लाख नए लोग इन गंभीर व्याधियों की चपेट में आ रहे हैं, जबकि मौजूदा समय में लगभग साढ़े 5 से 6 करोड़ नागरिक किसी न किसी हृदय रोग से जूझ रहे हैं। यह भयावह स्थिति सोचने पर विवश करती है कि आखिर वे कौन से प्रमुख कारक हैं जो रक्त नलिकाओं को इस कदर खोखला कर देते हैं।
रक्त नलिकाओं का सबसे घातक संहारक है तंबाकू
फोर्टिस अस्पताल, नई दिल्ली में कार्डिएक साइंस के डॉक्टर नित्यानंद त्रिपाठी के मुताबिक हृदय की सेहत को चौपट करने के पीछे कई वजहें सम्मिलित रूप से सक्रिय रहती हैं, जिनमें स्मोकिंग सबसे शीर्ष पर है। बीड़ी, सिगरेट, गुटखा अथवा खैनी के रूप में तंबाकू का सेवन धमनियों में एंडोथेलियल डिसफंक्शन उत्पन्न कर देता है। सामान्य स्थिति में जिस नलिका के जरिए दिल तक खून का बहाव होता है, उसकी दीवारें अत्यधिक मजबूत और लचीली बनी रहती हैं। हालांकि धुएं में उपस्थित जहरीले रसायन एवं निकोटिन धमनियों के सबसे आंतरिक संवेदनशील हिस्से एंडोथेलियम पर गंभीर चोट पहुंचाते हैं।
इस खुरदुरी सतह पर मोम जैसा चिपचिपा फैट और बैड कोलेस्ट्रॉल एकत्रित होने लगता है। वहां चलने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के चलते फोम सेल्स तैयार होती हैं, जो धीरे-धीरे सख्त पट्टिका अथवा प्लाक का स्वरूप धारण कर लेती हैं। जब यह सख्त पट्टिका फटती है, तो तत्काल दिल का दौरा पड़ता है। यदि किसी धमनी के भीतर बहुत बड़ा जमाव न भी हुआ हो, तब भी धूम्रपान रक्त वाहिकाओं की कार्यप्रणाली को पूरी तरह बिगाड़ देता है। सूजन और रासायनिक खिंचाव से खून का गाढ़ापन बढ़ जाता है तथा नाजुक परत पर दरारें उभर आती हैं। इसी वजह से 25 से 40 वर्ष के उन युवाओं में भी अचानक मैसिव हार्ट अटैक सामने आता है, जिनकी नलिकाओं में पहले से कोई उल्लेखनीय रुकावट मौजूद नहीं थी।
मानसिक दबाव और अनियंत्रित वजन का दोहरा प्रहार
धूम्रपान के घातक असर के उपरांत मानसिक दबाव, मोटापा, अनुवांशिकी, असंतुलित खान-पान, बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल मिलकर संकट को और गहरा बना देते हैं। अत्यधिक चिंता तथा बेचैनी हमारे हार्मोनल और संवहनी तंत्र पर प्रतिकूल असर डालते हैं। जब कोई व्यक्ति लगातार मानसिक तनाव की स्थिति में रहता है, तब शरीर में एड्रेनालाईन एवं कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स का स्तर काफी बढ़ जाता है। इन हार्मोन्स के प्रभाव से नब्ज तेज भागने लगती है और रक्तचाप में अचानक उछाल आता है।
रक्त के इस तेज दबाव के कारण धमनियों की आंतरिक दीवार में भारी सूजन पैदा हो जाती है, जो ठीक उसी प्रकार का नुकसान करती है जैसा धूम्रपान से होता है। दूसरी तरफ कमर तथा पेट के इर्द-गिर्द जमने वाली अतिरिक्त चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस, मेटाबॉलिक सिंड्रोम और हानिकारक कोलेस्ट्रॉल को न्योता देती है। वसा का यह जमाव रक्त नलिकाओं में प्लाक बनने की गति को कई गुना तेज कर देता है। जब मानसिक तनाव और शारीरिक स्थूलता एक साथ मिलते हैं, तब हृदय की मांसपेशियों को निरंतर अतिरिक्त दबाव में रक्त पंप करना पड़ता है। इसका सीधा परिणाम कम उम्र के भीतर हाई ब्लड प्रेशर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज और खतरनाक ब्लड क्लॉटिंग के रूप में सामने आता है।
डायबिटीज का प्रकोप और साइलेंट अटैक का खतरा
भारत में 10 करोड़ से अधिक आबादी डायबिटीज की समस्या से ग्रसित है, जो दिल के लिए एक अन्य बेहद खतरनाक दुश्मन साबित हो रही है। खून में मौजूद अनियंत्रित ग्लूकोज रक्त वाहिकाओं की आंतरिक परत एंडोथेलियम को लगातार क्षति पहुंचाता रहता है। इस निरंतर नुकसान के चलते नलिकाओं में वसा का संचय और सूजन तेज हो जाती है, जिससे एथेरोस्क्लेरोसिस की संभावना व्यापक रूप से बढ़ जाती है।
लगातार हाई ब्लड शुगर बने रहने के कारण रक्त नलिकाएं अपनी संवेदनशीलता खोकर सख्त और बेहद संकरी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में पूरे शरीर में रक्त पहुंचाने के लिए दिल को सामान्य से कहीं अधिक ताकत लगानी पड़ती है। नतीजतन दिल के दौरे, हाई बीपी और कोरोनरी आर्टरी डिजीज का खतरा दो से चार गुना तक बढ़ जाता है। इसके साथ ही डायबिटिक न्यूरोपैथी के शिकार मरीजों में नसों की संवेदनशीलता घट जाती है, जिससे उन्हें बिना किसी सीने के दर्द के साइलेंट हार्ट अटैक आने का भयंकर जोखिम बना रहता है।
पारिवारिक इतिहास और निष्क्रिय दिनचर्या की मार
यदि किसी व्यक्ति के निकट संबंधियों जैसे माता-पिता, नाना-नानी अथवा दादा-दादी को कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां रही हैं, तो अगली पीढ़ी में यह समस्या स्थानांतरित होने का अंदेशा बना रहता है। यह आनुवंशिक म्यूटेशन और एक जैसे रहन-सहन के माध्यम से बच्चों तक पहुंचती है। माता-पिता से मिलने वाले कुछ विशिष्ट जीन लिवर के भीतर कोलेस्ट्रॉल मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, जिससे बहुत कम आयु में ही रक्त में बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर अनियंत्रित हो सकता है। इसी तरह उच्च रक्तचाप और शुगर की प्रवृत्ति भी विरासत के रूप में अगली पीढ़ी की नलिकाओं को खोखला करती है।
इसके अलावा दिनभर बिना किसी शारीरिक हरकत के एक ही जगह जमे रहना हृदय प्रणाली को कमजोर बना देता है। यदि कोई इंसान दिनभर कुर्सी पर बैठा रहे, किसी प्रकार की शारीरिक मशक्कत न करे और बुनियादी व्यायाम से पूरी तरह दूर रहे, तो उसका शारीरिक स्टेमिना पूरी तरह गिर जाता है। यह शिथिल और सुस्त लाइफस्टाइल दिल की प्राकृतिक कार्यक्षमता को दीमक की तरह चाट जाती है।



















