कर्नाटक में धतूरे के फलों और बीजों की ऑनलाइन खरीद-फरोख्त पर आधिकारिक तौर पर रोक लगा दी गई है। कर्नाटक फूड सेफ्टी एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने अमेज़न, स्विगी और इंस्टामार्ट जैसे प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर धतूरे की ऑनलाइन बिक्री के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए उनके फूड लाइसेंस को आगामी आदेश तक निरस्त कर दिया है। विभाग का स्पष्ट तर्क है कि धतूरे के फल और बीज इंसानों की सेहत के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं, इसलिए इन्हें किसी भी खाद्य मंच पर उपलब्ध कराना अत्यधिक खतरनाक है।
ग्रामीण इलाकों में बढ़ रहा है डर का माहौल
पश्चिम चम्पारण जिले के वन क्षेत्रों और गांवों में धतूरा भारी मात्रा में उगता है। यहां इसकी एक या दो नहीं बल्कि कुल चार प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनका उपयोग स्थानीय निवासी पारंपरिक औषधि के रूप में करते आए हैं। लेकिन कर्नाटक सरकार द्वारा इसे जहरीला घोषित कर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंधित किए जाने के बाद से आम जनता के मन में भय पैदा हो गया है। लोग इसके प्रयोग से दूरी बना रहे हैं और अपने घरों के आसपास उगने वाले धतूरे के पौधों को जड़ से उखाड़कर फेंक रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय और धतूरे के जहरीले तत्व
इस पूरी स्थिति को ध्यान में रखते हुए बेतिया के जड़ी-बूटियों के जानकार वैद्य वासुदेव मुखिया, जो पिछले लगभग 20 वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं, और करीब 40 वर्षों से आयुर्वेदाचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे भुवनेश पांडे से बातचीत की गई। उनका कहना है कि धतूरा अपनी प्रकृति में एक जहरीली वनस्पति है। इसका केवल कांटेदार फल ही नहीं, बल्कि पौधे का हर एक हिस्सा अत्यधिक विषाक्त होता है। यदि कोई मनुष्य अनजाने में भी इसे खा ले, तो उसकी शारीरिक स्थिति बेहद बिगड़ सकती है.
धतूरे के पौधे के भीतर एट्रोपीन, हायोसिन और हायोसायमाइन जैसे खतरनाक रासायनिक तत्व मौजूद होते हैं। इनके संपर्क में आने या सेवन करने से इंसानों में मतिभ्रम, यादाश्त कमजोर होना या खो जाना, उल्टी होना, दिल की धड़कन तेज हो जाना और मुंह का सूखना जैसी तमाम गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। बहरहाल, यदि इसका प्रयोग पूरी तरह से आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार किया जाए, तो यह शरीर के लिए बेहद लाभकारी भी सिद्ध हो सकता है।
आयुर्वेद में क्या है इस्तेमाल करने का सही तरीका
आयुर्वेदाचार्य भुवनेश बताते हैं कि आयुर्वेद कभी भी धतूरे को प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तौर पर खाने की अनुमति नहीं देता है। इसके बजाय इसके बीजों, फूलों या फिर पत्तियों के रस को सरसों के तेल या तिल के तेल के साथ मिलाकर एक विशेष औषधि तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। इस तैयार औषधि के नियमित या सही उपयोग से गठिया, सायटिका, कान के दर्द, पैरों में सूजन या भारीपन और विशेष रूप से सर्दियों के मौसम में होने वाले बदन दर्द जैसी तकलीफों से राहत मिलती है।
इसी तरह की बात वैद्य वासुदेव भी साझा करते हैं। उन्होंने धतूरे के बीज, पत्तियों और फूलों से नई आयुर्वेदिक दवा तैयार करने की पूरी प्रक्रिया समझाई है। उनका कहना है कि सबसे पहले धतूरे के फलों से बीजों को अलग कर लेना चाहिए। इसके बाद उन बीजों को सरसों के तेल में लहसुन, हींग और काली हल्दी के साथ अच्छी तरह से पकाना चाहिए। जब बीजों और अन्य जड़ी-बूटियों का सत यानी अर्क पूरी तरह से तेल में घुल मिल जाए, तब जाकर इस तेल को बाहरी इस्तेमाल के लिए उपयोग में लाया जाता है।



















