त्वचा पर उभरने वाले तिलों, मस्यों या दाग-धब्बों को अक्सर लोग सामान्य मानकर अनदेखा कर देते हैं। आमतौर पर त्वचा के मामूली निशानों से शरीर को कोई बड़ा नुकसान नहीं होता, लेकिन यदि किसी चकत्ते, तिल या मस्से का रंग और आकार बदलने लगे, तो यह किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या की ओर इशारा हो सकता है। इसी तरह गर्दन के पिछले हिस्से पर पड़ने वाली काली और मोटी परत भी शरीर के भीतर पनप रही बीमारी की दस्तक हो सकती है। हालांकि, गर्दन की इस काली पट्टी को देखकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से घबराने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह कैंसर का लक्षण नहीं है। इसके बावजूद इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि यह डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारी का एक स्पष्ट और शुरुआती संकेत है। डायबिटीज की पहचान अक्सर शुरुआती चरणों में आसानी से नहीं हो पाती और लोगों को काफी समय बाद इसका पता चलता है।
गर्दन पर काली और मोटी परत बनने की मुख्य वजह
चिकित्सा विज्ञान में गर्दन के पीछे बनने वाली इस काली और मोटी परत को एकांथोसिस निग्रिकेंस कहा जाता है। यह स्थिति केवल गर्दन के पिछले भाग तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि बगल, जांघों के जोड़ों और उंगलियों के जोड़ों पर भी दिखाई दे सकती है। इन प्रभावित हिस्सों की त्वचा सामान्य से अधिक मोटी हो जाती है तथा उसका रंग भूरा या मटमैला दिखाई देने लगता है। त्वचा में इस तरह के बदलाव के पीछे कई कारक जिम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन इंसुलिन रेजिस्टेंस इसका सबसे प्रमुख और मजबूत कारण माना जाता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस का सीधा अर्थ यह है कि शरीर में इंसुलिन का निर्माण तो पर्याप्त मात्रा में हो रहा है, लेकिन शरीर की कोशिकाएं उसका सही तरीके से उपयोग नहीं कर पा रही हैं। जब इंसुलिन सही ढंग से काम नहीं करता, तो भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट का अवशोषण प्रभावित होता है, जिससे भविष्य में डायबिटीज होने की आशंका बढ़ जाती है।
शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस और IGF-1 रिसेप्टर्स की प्रक्रिया
गुरुग्राम स्थित सी के बिड़ला अस्पताल में डायबिटीज, ओब्सिटी एंड मेटाबोलिक क्लीनिक के डायरेक्टर डॉ. पारस अग्रवाल के अनुसार, जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति प्रतिरोधी या रेजिस्टेंट हो जाती हैं, तो स्थिति को संभालने के लिए अग्न्याशय यानी पैनक्रियाज अधिक मात्रा में इंसुलिन बनाने लगता है। पैनक्रियाज ऐसा इसलिए करता है ताकि खून में मौजूद शुगर को पचाया जा सके। जब अधिक मात्रा में बना यह इंसुलिन रक्तप्रवाह के जरिए शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचता है, तो वहां मौजूद IGF-1 नामक रिसेप्टर्स सक्रिय हो जाते हैं। जब इंसुलिन और ये रिसेप्टर्स आपस में मिलते हैं, तो कोशिकाओं के विभाजन और उनके विकास की गति अचानक बहुत तेज हो जाती है। इसी तीव्र कोशिकीय वृद्धि के कारण गर्दन के पीछे की त्वचा मोटी होने लगती है और वहां एक काली परत जम जाती है।
डायबिटीज के शुरुआती लक्षण, त्वचा की रंगत और स्किन टैग का प्रभाव
रक्त में इंसुलिन का स्तर बढ़ते ही शरीर पर इसके प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। कई मरीजों में डायबिटीज का पूर्ण रूप से पता चलने से पहले ही गर्दन पर यह काली पट्टी उभर आती है। डॉ. पारस अग्रवाल स्पष्ट करते हैं कि यह लक्षण शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस और प्री-डायबिटीज की स्थिति का एक अत्यंत स्पष्ट और शुरुआती शारीरिक मार्कर है। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हर डायबिटीज रोगी में बीमारी से पहले यह लक्षण दिखाई ही दे। इसके अलावा, कुछ विशेष स्थितियों में यह निशान बिल्कुल नहीं उभरता
- टाइप 1 डायबिटीज के मरीज: जिन लोगों को टाइप 1 डायबिटीज होती है, उनकी गर्दन पर यह निशान नहीं बनता क्योंकि उनके शरीर में इंसुलिन का निर्माण नहीं होता।
- कम इंसुलिन उत्पादन: जिन व्यक्तियों के शरीर में इंसुलिन का उत्पादन बहुत कम या शून्य होता है, उनमें भी एकांथोसिस निग्रिकेंस के लक्षण देखने को नहीं मिलते।
- त्वचा का रंग: इंसुलिन रेजिस्टेंस होने के बावजूद गोरी या हल्की रंगत वाली त्वचा वाले लोगों में यह काली परत बहुत हल्की होती है या बिल्कुल नजर नहीं आती। इसके विपरीत, सांवली या गहरी रंगत वाली त्वचा पर यह निशान बहुत तेजी से और स्पष्ट रूप से उभरता है।
- स्किन टैग की मौजूदगी: यदि गर्दन या बगल में काले निशान के साथ-साथ छोटे मस्से यानी स्किन टैग भी दिखाई दें, तो डायबिटीज होने की पुष्टि की संभावना काफी अधिक हो जाती है।
समय पर डॉक्टर से परामर्श और बचाव के फायदे
यदि आपकी गर्दन के पीछे या शरीर के अन्य जोड़ों पर इस तरह की काली पट्टी दिखाई देने लगे, तो इसे केवल गंदगी या स्किन प्रॉब्लम समझने की भूल न करें। यह स्थिति दर्शाती है कि व्यक्ति प्री-डायबिटीज की अवस्था में है और उसे डायबिटीज होने का जोखिम काफी अधिक है। डॉ. पारस अग्रवाल का कहना है कि यदि प्री-डायबिटीज के स्तर पर ही डॉक्टर से संपर्क कर लिया जाए और उचित चिकित्सीय सलाह ली जाए, तो प्री-डायबिटीज को पूर्ण डायबिटीज में बदलने से रोका जा सकता है। सही समय पर जीवनशैली में सुधार और इलाज की मदद से ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे आगे चलकर जीवन में डायबिटीज और उससे जुड़ी अन्य स्वास्थ्य जटिलताओं का खतरा बहुत कम हो जाता है।



















