प्रयोगशालाओं में गंभीर मानवीय बीमारियों की दवाएं तलाशने के लिए एक नन्हीं जलीय प्रजाति अनुसंधानकर्ताओं की पहली पसंद बन चुकी है। मीठे जल स्रोतों में पाई जाने वाली जेब्राफिश का उपयोग मौजूदा समय में हृदय रोग, कैंसर और जन्मजात आनुवंशिक गड़बड़ियों के उपचार से जुड़ी दवाओं के वैज्ञानिक अध्ययनों में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। शारीरिक संरचना में रीढ़ की हड्डी होने के कारण यह जीव मानव शरीर के कई जरूरी तंत्रों को समझने में बेहद मददगार साबित होता है।
तेजी से होता है भ्रूण का विकास
इस प्रजाति की शारीरिक वृद्धि की रफ्तार बेहद अनोखी है। निषेचन के बाद सिंगल सेल से शुरू हुआ जीवन चक्र इतना तेज होता है कि सिर्फ 16 घंटे के भीतर नन्हे भ्रूण में दिल धड़कना शुरू हो जाता है। शुरुआती विकास के दौरान यह पूरी तरह पारदर्शी रहती है, जिससे प्रयोगशाला में इसके आंतरिक अंगों के बनने की प्रक्रिया को वैज्ञानिक बिना किसी चीर-फाड़ के सीधे और साफ देख पाते हैं। पूरे विकास की निगरानी करने में वैज्ञानिकों को केवल दो दिन का समय लगता है।
अंडे के भीतर मौजूद अवस्था को भ्रूण कहा जाता है, जिसके चारों तरफ कोरियन नामक आवरण मौजूद रहता है। यह कोरियन परत ठीक उसी तरह सुरक्षात्मक ढाल का काम करती है जैसे मानव गर्भ में प्लेसेंटा काम करता है। बाहरी वातावरण के अवांछित तत्व सीधे भ्रूण तक नहीं पहुंच पाते, बल्कि जरूरी पोषक तत्व ही छनकर भीतर जाते हैं। निषेचन के 48 घंटे पूरे होते ही अंडा हैच हो जाता है और लार्वा बाहर आ जाता है।
डीएनए सीक्वेंसिंग और वर्टिब्रेट संरचना का लाभ
सागर स्थित डॉक्टर हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में सीनियर साइंटिस्ट एवं असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ योगेश भार्गव बताते हैं कि जेब्राफिश का पूरा डीएनए सीक्वेंस तैयार किया जा चुका है। आनुवंशिकी का पूरा नक्शा उपलब्ध होने के कारण ही इसे शोध जीव के रूप में सबसे उपयोगी माना जाता है।
प्रयोगशालाओं में अकसर बिना रीढ़ की हड्डी वाले जीवों पर परीक्षण किए जाते रहे हैं, लेकिन स्तनधारियों जैसी जटिल संरचना का अध्ययन करने के लिए वर्टिब्रेट मॉडल की दरकार होती है। रीढ़ की हड्डी वाले जीवों की श्रेणी में जेब्राफिश एक ऐसा न्यूनतम वर्टिब्रेट मॉडल है जिस पर आसानी से, कम समय में और सटीक नतीजे हासिल करने के लिए शोध किया जा सकता है।
गंगा के किनारों से प्रयोगशाला तक की उपलब्धता
जेब्राफिश मूल रूप से गंगा नदी के मैदानी व तटीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से मिलती है। इसका प्राकृतिक वास भारत के अलावा नेपाल और भूटान के मीठे पानी के जल स्रोतों में विस्तृत है। इस मछली का अधिकतम आकार तीन से चार सेंटीमीटर तक ही बढ़ता है।
कम लागत और आसान उपलब्धता इसकी सबसे बड़ी खूबी है। सामान्य बाजारों में यह 20 से 25 रुपये की किफायती कीमत में आसानी से मिल जाती है। वर्तमान में विशेष शोध कार्यों और आनुवंशिक अध्ययनों के लिए इसे जेनेटिकली मॉडिफाई भी किया जा चुका है, जिससे चिकित्सा विज्ञान में इसके अनुप्रयोग लगातार बढ़ रहे हैं।



















